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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

२५२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । यथावितानं यज्ञवास्त्वध्यवसेत् ॥१॥ वेदिर्यज्ञस्या- ग्नेरुत्तरवेदिः॥२॥ उभे प्रागायते किञ्चित्प्रथीयस्यौ पश्चादु- द्यततरे ॥३॥ अपृथुसंमितां वेदिं विदध्यात् ॥४॥ षट्शमीं प्रागायतां चतुःशमीं श्रोण्याम् ॥५॥ त्रीन् मध्ये अधच- तुर्थानग्रतः ॥६॥ त्रयाणां पुरस्तादुत्तरवेदिं विदध्यात् ॥७॥ द्विशमीं प्रागायतामृज्वीमध्यर्धशमीं श्रोण्याम् ॥८॥ ग्रीष्मस्ते भूम इत्युपस्थाय ॥९॥ विमिमीष्व पयस्वतीमिति मिमानमनुमन्त्रयते ॥१०॥ बृहस्पते परिगृहाण वेदिं सुगा वो देवाः सदनानि सन्तु । अस्यां बर्हिः प्रथतां साध्वन्तर- हिंस्रा णः पृथिवी देव्यस्त्विति परिगृह्णाति ॥११॥ यत्ते भूम इति विखनति ॥१२॥ यत्त ऊनमिति संवपति ॥१३॥ त्वमस्यावपनी जनानामिति ततः पांसूनान्यतोदाहार्य ॥१४॥ बृहस्पते परिगृहाण वेदिमित्युत्तरवेदिमोप्यमानां परि- गृह्णाति ॥१५॥ असम्बाधं बध्यतो मानवानामिति प्रथ- यज्ञ के अनुसार (बड़े, छोटे आदि) यज्ञ गृह बनावे ॥१॥ अग्नि के उत्तर यज्ञवेदि बनावे। दोनों पूर्व-पश्चिम चौड़ा एवं कुछ मोटे हों उत्तर- दक्षिण लम्बी हो ॥ २ ॥ ३ ॥ अपृथु सम्मित वेदि बनावे ॥४॥ छः शमी पूर्वायत हों और चार शमी को श्रोणी में धरे ॥५॥ तीन को मध्य में, साढ़े चार शमी को आगे में ॥ ६ ॥ तीनों के पूर्व उत्तर वेदिको बनावे ॥ ७ ॥ दो शमी को पूर्वायता ऋज्वी हों और चौथाई शमी श्रोणी पर धरे ॥८॥ “ग्रीष्मस्ते भूम०” से उपस्थान करके ॥९॥ “विमिमीष्व पयस्वतीं०” से नापनेवाले को अनुमंत्रण करे ॥१०॥ “बृहस्पते परिगृहाण०” इत्यादि से परिग्रहण करे ॥११॥ “यत्ते भूम०” से भूमि को खनन करे ॥१२॥ “यत्त ऊनं०” से भर देवे ॥१३॥ “त्वमस्यावपनी०” इत्यादि से दूसरी जगह से धूलि को लाकरके ॥१४॥ “बृहस्पते परिगृहाण वेदिं०” इत्यादि से वेदि को भरते हुए को परिग्रहण करे ॥१५॥ “असंबाधं बध्यतो मान- बानां०” से वेदि को पूर्व को ढालुआ बनावे और बालु को उस पर

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २५३ यति ॥१६॥ यस्याश्चतस्रः प्रदिशः पृथिव्या इति चतुरस्रां करोति ॥१७॥ देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामादद इति लेखनमादाय यत्राग्निं निधा- स्यन्भवति तत्र लक्षणं करोति ॥१८॥ इन्द्रः सीतां निगृह्णात्विति दक्षिणत आरभ्योत्तरत आलिखति॥१९॥ प्राचीमावृत्य दक्षिणतः प्राचीम् ॥२०॥ अपरास्तिस्रो मध्ये ॥२१॥ तस्यां व्रीहियवावोष्य ॥२२॥ वर्षेण भूमिः पृथिवी वृतावृतेत्यद्भिः सम्प्रोक्ष्य ॥२३॥ यस्यामन्नं व्रीहि- यवाविति भूमिं नमस्कृत्य ॥२४॥ अथाग्निं प्रणयेत् । त्वामग्ने भृगवो नयन्तामङ्गिरसः सदनं श्रेय एहि । विश्वकर्मा पुर एतु प्रजानन्धिष्ण्यं पन्थामनु ते दिशा- मेति ॥२५॥ भद्रश्रेयःस्वस्त्या वा ॥२६॥ अग्ने प्रेहीति वा॥२७॥ विश्वम्भरा वसुधानी प्रतिष्ठेति लक्षणे प्रतिष्ठाप्य ॥२८॥ अथेध्ममुपसमादधाति ॥२९॥ अग्निर्भूम्यामोषधी- ष्वग्निर्दिव आ तपत्यग्निवासाः पृथिव्यसितजूरेतमिध्मं बिछावे ॥१६॥ “यस्याश्चतस्रः प्रदिशः पृथिव्या” इत्यादि से चौकोन वेदि बनावे ॥१७॥ “देवस्य त्वा०” इत्यादि से लेखन को लेकर, जहाँ अग्नि का आधान करना होगा, वहाँ रेखायें खैंचे ॥१८॥ “इन्द्रः सीतां निगृह्णातु०” से दक्षिण से आरम्भ कर उत्तर तक रेखा करे ॥१९॥ पूर्व से लेकर दक्षिण पश्चिम रेखा करे ॥२०॥ दूसरी तीन रेखायें मध्य भाग में करे ॥२१॥ उसमें व्रीहि, यव को डाले ॥२२॥ “वर्षेण भूमिः पृथिवी वृतावृता०” से जल से संप्रोक्षण करके ॥२३॥ “यस्यामन्नं व्रीहि- यवौ०” से भूमि को नमस्कार करके ॥२४॥ अब अग्नि को प्रणयन करे “त्वामग्ने भृगवो०” इत्यादि से ॥२५॥ या “भद्रश्रेयःस्वस्त्या०” से ॥२६॥ या “अग्ने प्रेह०” से आहुति करे ॥२७॥ “विश्वंभरावसुधानी०” इत्यादि से रेखाओं को प्रतिष्ठा करके ॥२८॥ अब इध्मों का आधान करे ॥ २९ ॥ “अग्निर्भूम्यामोषधी०” इत्यादि पाँच ऋचा से स्तरण करे

२५४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । समाहितं जुषाणोऽस्मै क्षत्राणि धारयन्तमग्न इति पञ्च- भिः स्तरणम् ॥३०॥ अत ऊर्ध्वं बर्हिषः ॥३१॥ त्वं भूमि- मह्येष्योजसेति दर्भान् सम्प्रोक्ष्य ॥३२॥ ऋषोणां प्रस्तरोऽ- सीति दक्षिणतोऽग्नेर्ब्रह्मासनं निदधाति ॥३३॥ पुरस्ता- दग्नेरुदक्संस्तृणाति ॥३४॥ तथा प्रत्यक् ॥३५॥ प्रदक्षिणं बर्हिषां मूलानि च्छादयन्तोत्तरस्या वे दिश्रोणेः पूर्वोत्तरतः संस्थाप्य ॥३६॥ अहे दैधिषव्योदतस्तिष्ठान्यस्य सदने सीद योऽस्मत्पाकतर इति ब्रह्मासनमन्वीक्षते ॥३७॥ निरस्तः पराग्वसुः सह पाप्मना निरस्तः सोऽस्तु योऽ- स्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्म इति दक्षिणा तृणं निर- स्यति ॥३८॥ तदन्वालभ्य जपतीदमहमर्वाग्वसोः सदने

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २५५ इति द्यावापृथिव्यौ समीक्षते ॥४१॥ सविता प्रसवाना- मिति कर्मणिकर्मण्यभितोऽभ्यातानैराज्यं जुहुयात्॥४२॥ व्याख्यातं सर्वपाकयज्ञियं तन्त्रम् ॥४३॥१॥१३७॥ अष्टकायामष्टकाहोमाञ्जुहुयात् ॥१॥ तस्या हवींषि धानाः करम्भः शाष्कुल्यः पुरोडाश उदौदनः क्षीरौदनस्ति- लौदनो यथोपपादिपशुः ॥२॥ सर्वेषां हविषां समुद्धृत्य ॥३॥ दर्व्या जुहुयात्प्रथमा ह व्युवास सेति पञ्चभिः ॥४॥ आयमागन्संवत्सर इति चतसृभिर्विज्ञायते ॥५॥ ऋतुभ्यस्त्वेति विग्राहमष्टौ ॥६॥ इन्द्रपुत्र इत्यष्टादशीम् ॥७॥ अहोरात्राभ्यामित्यूनविंशीम् ॥८॥ पशावुपपद्य- माने दक्षिणं बाहुं निर्लोमं सचर्म सखुरं प्रक्षाल्य ॥९॥ इडायास्पदमिति द्वाभ्यां विंशीम् ॥१०॥ अनुपपद्यमान आज्यं जुहुयात् ॥११॥ हविषां दर्वि पूरयित्वा पूर्णा दर्व ॥३९॥४०॥४१॥ “सविता प्रसवानां०” इत्यादि प्रत्येक कर्म में अभ्या- तान मंत्रों से आज्य की आहुतियाँ देवे ॥४२॥ सर्व पाकयज्ञिय तन्त्र का व्याख्यान हुआ ॥४३॥१॥१३७॥ यह एकसौ सैंतीसवी कण्डिका पूरी हुई ॥ अष्टकाओंमें अष्टकाहोमों की आहुतियाँ देवे ॥१॥ उसकी आहुति के लिये धाना, करम्भ, पूरियाँ, पुरोडाश, जल में पका भात, क्षीरौदन, तिलौ- दन यथोपपादि पशु ॥२॥ सब ही हवियों को निकालकर ॥३॥ दर्वी से आहुतियाँ देवे “प्रथमा ह व्युवास०” इन पाँच ऋ० से आहुतियाँ करे ॥४॥ “आयमागन्संवत्सर०” इन चार से आहुतियाँ देनी जान पड़ती है ॥५॥ “ऋतुभ्यस्त्वा०” से भी आठ आहुतियाँ ॥६॥ “इन्द्रपुत्र०” इत्यादि से अठारहवी ॥ ७ ॥ “अहोरात्राभ्यां०” से उन्नीसवी ॥ ८ ॥ यदि पशु मिल जावे तो दहिने बाहु को लोम रहित, चर्म सहित, खुर सहित को प्रक्षालन करके ॥ ९ ॥ “इडायास्पदं०” इन दो ऋ० से बीसवी आहुति ॥१०॥ यदि पशु न मिले तो आज्य की आहुति करे ॥११॥ हवियों में दर्वी को डाल कर भर लेवे “पूर्णा दर्व०” से दर्वी सहित आहुति देवे ।

२५६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । इति सदर्वीमेकविंशीम् ॥१२॥ एकविंशतिसंस्थो यज्ञो विज्ञायते ॥१३॥ सर्वा एव यज्ञतनूरवरुन्द्धे सर्वा एवास्य यज्ञतनूः पितरमुपजीवन्ति य एवमष्टकामुपैति ॥१४॥ न दर्विहोमे न हस्तहोमे न पूर्णहोमे तन्त्रं क्रियेतेत्येके ॥१५॥ अष्टकायां क्रियेतेतीषुफालिमाठरौ ॥१६॥२॥१३८॥ अभिजिति शिष्यानुपनीय श्वो भूते सम्भारान् सम्भरति ॥१॥ दधिसक्तून्पालाशं दण्डमहते वसने शुद्ध- माज्यं शान्ता ओषधीर्नवमुदकुम्भम् ॥२॥ बाह्यतः शान्त- वृक्षस्येध्मं प्राञ्चमुपसमाधाय ॥३॥ परिसमुह्य पर्युक्ष्य परिस्तीर्य बर्हिरुदपात्रमुपसाद्य परिचरणेनाज्यं परिचर्य ॥४॥ नित्यान् पुरस्ताद्धोमान् हुत्वाज्यभागौ च ॥५॥ पश्चादग्नेर्दधिसक्तूञ्जुहोत्यग्नये ब्रह्मप्रजापतिभ्यां भृग्व- ङ्गििरोभ्य उशनसे काव्याय ॥६॥ ततोऽभयैरपराजितैर्गण- यह इक्कीसवी हुई ॥१२॥ इक्कीस संस्थ यज्ञ है ऐसा जान पड़ता है ॥१३॥ सब ही यज्ञ तनू को रोक लेता है। सब ही इसके यज्ञतनू से पितर लोगों का उपजीवन होता है जो अष्टका को करता है ॥१४॥ न दर्वि होम में, न हस्त होम में, न पूर्ण होम में तन्त्र को करे—ऐसा बहुत से आचार्य्य कहते हैं ॥१५॥ “अष्टका में करे” यह इषुफालि एवं माठर कहते हैं ॥१६॥२॥१३८॥ यह एकसौ अड़तीसवी कण्डिका पूरी हुई ॥ अभिजित् नक्षत्र के साथ जब चन्द्रमा हों तो शिष्यों को पास बुलाकर प्रातःकाल सामग्रियों को एकत्र करे ॥१॥ दही, सत्तू, पलाश का दण्ड, अखण्ड नये दो वस्त्र, शुद्ध आज्य, शान्ता ओषधी, नये घड़े ॥२॥ बाहर से शान्त वृक्ष के इध्मों को पूर्व को आधान ,करे ॥३॥ परिसमू- हन, पर्युक्षण, परिस्तरण करके बर्हि कुश और जलपात्र लाकर यथाविधि परिचर्या करके ॥४॥ नित्य पुरस्तात् होम और आज्यभाग के दो होर्मों को करके ॥५॥ अग्नि के पश्चिम भाग में दही एवं सत्तू से “अग्नये ब्रह्मप्रजापतिभ्यां भृग्वङ्गिरोभ्य उशनसे काव्याय” की आहुति करके तब अभय गण, अपराजित गण, गणकर्म गण, विश्वकर्म गण, आयुष्य गण,

कर्मभिर्विश्वकर्मभिरायुष्यैः स्वस्त्ययनैराज्यं जुहुयात्॥७॥ मा नो देवा अहिर्वधीदरसस्य शर्कोटस्येन्द्रस्य प्रथमो रथो यस्ते सर्पो वृश्चिकस्तृष्टदंशमा नमस्ते अस्तु विद्युत आरेऽसावस्मदस्तु यस्ते पृथु स्तनयित्नुरिति संस्थाप्य होमान् ॥८॥ प्रतिष्ठाप्य स्रुवं दधिसक्तून्प्राश्याचम्योदक- मुपसमारभन्ते ॥९॥ अव्यचसञ्चेति जपित्वा सावित्रीं ब्रह्म जज्ञानमित्येकां त्रिपत्तीयं च पच्छो वाचयेत् ॥१०॥ शेषमनुवाकस्य जपन्ति ॥११॥ यो यो भोगः कर्त्तव्यो भवति तं तं कुर्वते ॥१२॥ स खल्वेतं पक्षमपक्षीयमाणः पक्षमनधीयान उपशाम्येतादर्शात् ॥१३॥ दृष्टे चन्द्रमसि फल्गुनीषु द्वयान्नसानुपसादयति ॥१४॥ विश्वे देवा अहं रुद्रेभिः सिंहे व्याघ्रे यशो हविर्यशसं मेन्द्रो गिराव- रागराटेषु यथा सोमः प्रातःसवने यच्च वर्चो अक्षेषु येन महानघ्न्या जघनं स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा ॥१५॥ रसेषु सम्पातानानीय संस्थाप्य होमान् ॥१६॥ तत एतान्प्राश- यति रसान्समधुघृताञ्छिष्यान् ॥१७॥ यो यो भोगः स्वस्त्ययन गण, इन सूक्तों के मंत्रों से आहुतियाँ देवे ॥७॥ “मा नो देवा०” इत्यादि से आहुतियाँ देवे और होमों को संस्थापन करके ॥८॥ स्रुव को धरकर, दधि सत्तू को प्राशन करके आचमन करके जल के पास जावे ॥९॥ “अव्यचसश्च०” इत्यादि का जप करके सावित्री को, “ब्रह्म जज्ञानं०” इस एक ऋचा को और त्रिपतीर्य को पद २ करके वाचें ॥१०॥ शेष अनुवाक का जप करे । जो २ भोग करना हो, उस २ को करे । वह अवश्य ही इस पक्ष को, अपक्षीयमाण पक्ष को नहीं पढ़ते हुए पर्व तक विश्राम करे ॥११॥१२॥१३॥ जब चन्द्रमा फल्गुनी नक्षत्र पर हों तो दो रसों को लाकर “विश्वे देवा०” इत्यादि से अग्नि में आहुति करके ॥१४॥१५॥ रसों में सम्पातों को लाकर होमों को संस्थापन करके ॥१६॥ इसके पश्चात् इन रसों को तीन शिष्यों को प्राशन करावे (मधु, रस, ३३

२५८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । कर्तव्यो भवति तं तं कुर्वते ॥१८॥ नान्यत आगताञ्छि- ष्यान् परिगृह्णीयादपरसन्दीक्षितत्वात् ॥१९॥ त्रिरात्रोनां- श्चतुरो मासाञ्छिष्येभ्यः प्रब्रूयादर्धपञ्चमान् वा ॥२०॥ पादं पूर्वरात्रेऽधीयानः पादमपररात्रे मध्यरात्रे स्वपन्॥२१॥ अभुक्त्वा पूर्वरात्रेऽधीयान इत्येके ॥२२॥ यथाशक्त्यपर- रात्रे दुष्परिणामो ह पादः ॥२३॥ पौष्यस्यापरपक्षे त्रिरात्रं नाधीयीत ॥२४॥ तृतीयस्याः प्रातः समासं सन्दिश्य यस्मात्कोशादित्यन्तः ॥२५॥ यस्मात्कोशादुद्भराम वेदं तस्मिन्नन्तरवदध्म एनम् । अधीतमिष्टं ब्रह्मणो वीर्येण तेन मा देवास्तपसावतेहेति ॥२६॥ यो यो भोगः कर्तव्यो भवति तं तं कुर्वते ॥२७॥ ये परिमोक्षं कामयन्ते ते परि- मुच्यन्ते ॥२८॥३॥१३६॥


घृत, ) ॥१७॥ जो २ भोग करना हो, उस २ को भोग करे ॥१८॥ अन्य स्थानों से आये हुए शिष्यों को रसों को प्राशन न करावे क्योंकि उनकी दीक्षा दूसरे आचार्यों से मिली है ॥१९॥ तीन रात न्यून चार मास तक आचार्य्य शिष्यों को प्रवाचन करे या साढ़े पाँच महीने ॥२०॥ रात्रि के पूर्व भाग में एक पाद् और आधी रात्रि के पीछे एक पाद् पढ़े, रात्रि के मध्य भाग में शयन करे ॥२१॥ बिना भोजन किये हुए रात के पूर्व भाग में पढ़े ऐसा किन्हीं का मत है ॥२२॥ यथाशक्ति अपर रात्र में पढ़े, इस समय पाद् पढ़ने का परिणाम बुरा होता है क्योंकि पाद् दुष्प- रिणाम है ॥२३॥ पौष्य मास के अपर पक्ष में तीन रात्रि न पढ़े ॥२४॥ तृतीया के प्रातःकाल समास को आरम्भ कर “यस्मात् कोशात्” इस अन्त तक ॥२५॥ “यस्मात् कोशादुद्भराम वेदं तस्मिन्नन्तरवदध्म एनम् । अधीतमिष्टं ब्रह्मणो वीर्येण तेन मा देवास्तपसावतेहेति ॥२६॥ यो यो भोगः कर्तव्यो भवति तं तं कुर्वते ॥२७॥ ये परिमोक्षं कामयन्ते ते परिमुच्यन्ते” ॥२८॥३॥१३९॥ यह एकसौ उनतालीसवी कण्डिका पूरी हुई ॥

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २५९ अथ राज्ञामिन्द्रमहस्योपचारकल्पं व्याख्यास्यामः ॥१॥ प्रौष्ठपदे शुक्लपक्षे आश्वयुजे वाष्टम्यां प्रवेशः ॥२॥ श्रवणेनोत्थापनम् ॥ ३ ॥ संभृतेषु संभारेषु ब्रह्मा राजा चोभौ स्नातावहतवसनौ सुरभिणौ व्रतवन्तौ कर्मण्या- वुपवसतः ॥४॥ श्वो भूते शं नो देव्याः पादैरर्धर्चाभ्यामृचा षट्कृत्वोदकमाचामतः ॥५॥ अर्वाञ्चमिन्द्रं त्रातारमिन्द्रः सुत्रामेत्याज्यं हुत्वा ॥६॥ अथेन्द्रमुत्थापयन्ति ॥७॥ आ स्वाहार्षं ध्रुवा द्यौर्विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्त्विति सर्वतो- ऽप्रमत्ता धारयेरन् ॥८॥ अद्भुतं हि विमानोत्थितमुपति- ष्ठन्ते ॥ ६ ॥ अभिभूर्यज्ञ इत्येतैस्त्रिभिः सूक्तैरन्वारब्धे राजनि पूर्णहोमं जुहुयात् ॥१०॥ अथ पशूनामुपचारम् ॥११॥ इन्द्रदेवताः स्युः ॥१२॥ ये राज्ञो भृत्याः स्युः सर्वे दीक्षिता ब्रह्मचारिणः स्युः ॥१३॥ इन्द्रं चोपसद्य यजेरंस्त्रि- रात्रं पञ्चरात्रं वा ॥१४॥ त्रिरयनमहासुपतिष्ठन्ते हविषा च अब राजाओं के इन्द्र महोत्सव का आचार कल्प को कहेंगे ॥१॥ भादो मास के शुक्लपक्ष में या आश्विन के अष्टमी को प्रवेश करे ॥२॥ और श्रावण मास में उत्थापन करे ॥३॥ सामग्रियों के जुट जाने पर ब्रह्मा और राजा दोनों, स्नान करके अखण्ड नये वस्त्र पहिने हुए, सुगन्धि से युक्त, व्रती, कर्म में उपवास रहते हुए ॥४॥ प्रातःकाल “शन्नो देव्या०” इत्यादि के पादों, आधी ऋचाओं से छः बार जल से आचमन करते हुए ॥५॥ “अर्वाञ्चमिन्द्रं ०” से आज्य की आहुति करके ॥६॥ अब इन्द्र को उत्थापन करे ॥७॥ “आ त्वा हार्षं०” इत्यादि से सब ओर अप्रमत्त हो धारण करे ॥८॥ क्योंकि आश्चर्य है उठाये हुए विमान का उपस्थान करना ॥९॥ “अभिभूर्यज्ञ०” इन तीन ऋचाओं के सूक्तों से अन्वारब्ध करके राजा पूर्ण होम करे ॥१०॥ अब पशु के उपचार को कहते हैं ॥११॥ इन्द्र देवता होवें ॥१२॥ जो राजा के नौकर होवें वे सब दीक्षित ब्रह्मचारी होवें ॥ १३ ॥ इन्द्र के पास पहुँच कर तीन रात्रि या पाँच

२६० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । यजन्ते॥१५॥ आवृत इन्द्रमहमिति ॥१६॥ इन्द्र क्षत्रमिति हविषो हुत्वा ब्राह्मणान् परिचरेयुः ॥१७॥ न संस्थितहो- माञ्जुहुयादित्याहुराचार्याः ॥१८॥ इन्द्रस्यावभृथादिन्द्र- मवभृथाय व्रजन्ति ॥१९॥ अपां सूक्तैराप्लुत्य प्रदक्षिण- मावृत्याप उपस्पृश्यानवेक्षमाणाः प्रत्युदाव्रजन्ति ॥२०॥ ब्राह्मणान् भक्तेनोपेप्सन्ति ॥२१॥ श्वःश्वोऽस्य राष्ट्रं ज्यायो भवत्येकोऽस्यां पृथिव्यां राजा भवति न पुरा जरसः प्रमीयते य एवं वेद यश्चैवं विद्वानिन्द्रमहेण चरति ॥ २२॥४॥१४०॥ अथ वेदस्याध्ययनविधिं वक्ष्यामः ॥१॥ श्रावण्यां प्रौष्ठपद्यां वोपाकृत्यार्धपञ्चमान्मासानधीयीरन् ॥ २ ॥ एवं छन्दांसि ॥३॥ लोम्नां चानिवर्तनम् ॥४॥ अर्धमासं चोपाकृत्य क्षपेरंस्त्र्यहमुत्सृज्य । आरम्भः श्रावण्या- रात पूजा करे ॥ १४ ॥ तीन अयन दिनों का उपस्थान करें आहुतियों से यज्ञ करे ॥ १५ ॥ इन्द्र को घेर, “इन्द्रमहं०” से आहुति करे । “इन्द्र क्षत्रं०” से हवियों की आहुति करके, ब्राह्मणों की परिचर्या करें ॥१६॥१७॥ आचार्य्यगण कहते हैं कि संस्थित होर्मों को न करे ॥१८॥ इन्द्र के अवभृथ से इन्द्र के अवभृथ के लिये जावें ॥ १९ ॥ जल सूक्त से स्नान कर, प्रदक्षिण फेरे लगाकर, जल छूकर, नहीं देखते हुए, आवें ॥ २० ॥ ब्राह्मण चाहें उनको देकर उन्हें प्रसन्न करें ॥ २१ ॥ दिन २ इसका राष्ट्र बढ़े, पृथिवी का राजा होवे और बुढ़ापेसे पहिले इसकी मृत्यु न होवे। जो ऐसा जानता है और जो विद्वान् इन्द्र महोत्सव जैसा करता है ॥२२॥४॥१४०॥ यह एकसौ चालीसवी कण्डिका खतम हुई ॥ · अब वेद का अध्ययन विधि को कहेंगे ॥ १ ॥ श्रावण की पौर्णमासी या भाद्रपद की पौर्णमासी को वेद का उपाकृत्य ( आरम्भ ) कर साढ़े पाँच महीने पढ़ें ॥ २ ॥ इसी प्रकार छन्दों को पढ़ें ॥ ३ ॥ लोमों को न कटवावें ॥ ४ ॥ अर्ध मास तक आरम्भ करके तीन दिन पढ़ना बन्द

मुक्तः पौष्यामुत्सर्ग उच्यते ॥५॥ अथानध्यायान्वक्ष्यामः ॥६॥ ब्रह्मज्येषु निवर्तते ॥७॥ श्राद्धे ॥८॥ सूतकोत्थान- च्छर्द्दनेषु त्रिषु चरणम् ॥९॥ आचार्यास्तमिते वा येषां च मानुषी योनिः ॥१०॥ यथा श्राद्धं तथैव तेषु ॥११॥ सर्वे च श्राद्धिकं द्रव्यमदसाहव्यपेतं प्रतिगृह्यानध्यायः ॥१२॥ प्राणि चाप्राणि च ॥१३॥ दन्तधावने ॥१४॥ क्षुरसंस्पर्शे ॥१५॥ प्रादुष्कृतेष्वग्निषु ॥१६॥ विद्युताऽर्धरात्रे स्तनिते ॥१७॥ सप्तकृत्वो वर्षेण विरत आप्रातराशम् ॥१८॥ वृष्टे ॥१९॥ निर्घाते ॥२०॥ भूमिचलने ॥२१॥ ज्योतिषोपसर्जन ऋता- वप्याकालम् ॥ २२ ॥ विषमे न प्रवृत्तिः ॥ २३ ॥ अथ प्रमाणं वक्ष्यामः समानं विद्युदुल्कयोः। मार्गशीर्षपौषमा- घापरपक्षेषु तिस्रोऽष्टकाः ॥२४॥ अमावास्यायां च ॥२५॥ त्रीणि चानध्ययनानि ॥२६॥ जनने मरणे चैव दश-


करके, श्रावणी में आरम्भ करना कहा गया और पौष की पौर्णमासी को पढ़ना छोड़ देवें ॥५॥ अब अनध्यायों को कहेंगे ॥ ६॥ ब्रह्मज्यों में छोड़े ॥ ९॥ आचार्य सूर्यास्त होने पर या जिनके घर में प्रसव होवे उनको सूतक तक न पढ़ना चाहिये ॥ १० ॥ जैसा श्राद्ध वैसा ही उनके लिये भी ॥ ११॥ सब ही श्राद्धिक दशाह तक प्रत्येक गृही को वर्ज्य है ॥१२॥ जीवधारी या अप्राणि हो ॥१३॥ दन्तधावन में, नापित के क्षुर के संसर्ग में, प्रादुष्कृत अग्नि में, आधी रात को बिजुली कड़कने में ॥१४॥१५॥१६॥१७॥ सात वार तक पढ़ने से विरत रहे जब तक प्रातःकालिक भोजन हो ॥१८॥ वर्षा होने में, उल्कापात में, भूमिकम्प में ॥१९॥२०॥२१॥ ज्योतिष ( प्रकाश का छिप जाना ) के उप- सर्जन में, ऋतु में भी जब तक काल हो ॥२२॥ संकट में प्रवृत्ति न करे ॥२३॥ अब प्रमाण को कहते हैं । बिजुली एवं उल्कापात में समान दोष है ॥२४॥ अग्रहण, पौष, माघ के अपर पक्षों में तीन अष्टकायें होती हैं ॥२४॥ और अमावास्या में भो ॥२५॥ और तीन ही अनध्याय हैं ॥२६॥

२६२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । रात्रो विधीयते ॥ आचार्ये दशरात्रं स्याह्सर्वेषु च स्व- योनिषु ॥२७॥ सूतके त्वेको नाधीयीत त्रिरात्रमुपाध्यायं वर्जयेत् ॥२८॥ आचार्यपुत्रभार्याश्च ॥२९॥ अथ शिष्यं सहाध्यायिनमप्रधानगुरुं चोपसन्नमहोरात्रं वर्जयेत्॥३०॥ तथा सब्रह्मचारिणं राजानं च ॥३१॥ अपर्तुदैवमाकालम् ॥३२॥ अविशेषर्तुकालेन सर्वे निर्घातादयः स्मृताः । यच्चान्यद्दैवमद्भुतं सर्वं निर्घातवद् भवेत् ॥३३॥ ऋतावध्या- यश्छान्दसः कल्प्य आपर्तुकः स्मृतः ॥ ऋतावूर्ध्वं प्रात- राशाद्यस्तु कश्चिदनध्यायः । सन्ध्यां प्राप्नोति पश्चिमाम् ॥३४॥ सर्वेण प्रदोषो लुप्यते ॥३५॥ निशि निगदायां च विचुति शिष्टं नाधीयीत ॥३६॥ अस्तमिते द्विसत्तायां त्रिसत्तायां च पाटवः । अथ तावत्कालं भुक्त्वा प्रदोष जन्म और मरण में दश रात्रि अशौच होता है, आचार्य के मरण में भी दश रात अशौच होता है, सब ही सगोत्री को अशौच होता है ॥२७॥ तक में एकही न पढ़े, तीन रात उपाध्याय के पास जाना बन्द कर देवे ॥२८॥ आचार्य, पुत्र, उनकी भार्या, इनके पास न जावे तीन रात तक ॥२९॥ अब शिष्य जो साथ पढ़ता है, और अप्रधान गुरु, जो पास रहते है उनके पास एक दिन रात न जावे ॥३०॥ उसी प्रकार साथ के ब्रह्मचारी और राजा के पास भी एक दिन रात न जावे ॥३१॥ अपर्तु- दैव अर्थात् ऋतु अस्वाभाविक हो एवं दैवी उपद्रव हो तो जब तक अच्छा समय न हो तब तक न पढ़े ॥३२॥ अविशेष ऋतुकाल में सबही को वज्रपात की भांति अपसमय जानना ॥ और भी जितने अद्भुत हैं सबही वज्रपात की भांति हैं ॥३३॥ ऋतु में छन्दों का पढ़ना भौर कल्प पढ़ना अपर्तु में। ऋतु के पश्चात् प्रातराश( तक जो कोई अनध्याय है । सायंकाल होने पर ( सायंकाल ) ॥३४॥ सबही के मत से प्रदोष काल ( रात्रि का आरम्भ ) दूषित है ॥ ३५॥ रात्रि में निगदा ( निःशब्द होने में ) काल में, बिजुली कड़कने में न पढ़े ॥३६॥ अस्तमित काल में, दो या तीन सन्धिकाल में न पढ़े ॥ प्रदोष, दोनों सन्ध्या, जल में,

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २६३ उभे सन्ध्ये ॥३७॥ अप्सु श्मशाने शय्यायामभिशस्ते खिलेषु च ॥ अन्तःशवे रथ्यायां ग्रामे चाण्डालसंयुते ॥३८॥ दुर्गन्धे शूद्रसंश्रावे पैङ्गे शब्दे भये रुते । वैधृते नगरेषु च ॥३९॥ अनिक्तेन च वाससा चरितं येन मैथु- नम् । शयानः प्रौढपादो चाग्रतोपस्थान्तिके गुरोः ॥४०॥ विरम्य मारुते शीघ्रे प्रत्यारम्भो विभाषितः ॥ सर्वेणा- पररात्रेण विरम्य प्रत्यारम्भो न विद्यते ॥ ४१ ॥ पौषी प्रमाणमभ्रेष्वापर्तु चेदधीयानाम् ॥४२॥ वर्षे विद्युत्स्त- नयित्नुर्वा विपद्यते ॥४३॥ त्रिरात्रं स्थानासनं ब्रह्मचर्यम- रसाशं चोपेयुः ॥ ४४ ॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४५॥५॥१४१॥ इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे चतुर्दशोऽध्यायः समाप्तः ॥१४॥ ॥ इति कौशिकसूत्रं समाप्तम् ॥ श्मशान में, बिछावन (शयन स्थान में) पर, जिस स्थान में शव हो, गली में, जिस ग्राम में चाण्डाल रहता हो, दुर्गन्ध स्थान में, शूद्र के संश्राव में, पैङ्ग के शब्द होने में, भय में, जानवरों के बोलने पर, वैधृत्य में, नगरों में न पढ़े ॥३७॥ ३८॥ ३९॥ जिस वस्त्र से मैथुन किया है उसको जल से प्रक्षालन किया और उसी को पहने हुआ हो, सोता हुआ, प्रौढ़ पैरों से गुरु के पास बैठकर न पढ़े ॥४०॥ वायु शीघ्र गति से बहती समय पढ़ना बन्द कर देवे और आधी रात्र के पश्चात् पढ़ना बन्द कर देवे ॥४१॥ पौष में यदि बादल लग जावे और अपर्तु हो तो न पढ़े ॥४२॥ वृष्टि, बिजुली, बादल इनसे विपद् ग्रस्त हो तो न पढ़े ॥४३॥ तीन रात, स्थान, आसन, ब्रह्मचर्य, रसरहित भोजन करके नियमित रहे ॥४४॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है। यह उसकी प्रायश्चित्ति है॥४५॥५॥१४१॥ यह एकसौ एकतालीसवी कण्डिका खतम हुई । यह अथर्ववेद के कौशिक सूत्र के ठा० उदयनारायण सिंह मधुरापुर, जिला मुजफ्फरपुर कृत भाषानुवाद का चौदहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥१४॥ और कौशिक सूत्र भी समाप्त हुआ ।

पुस्तक मिलने का पता-- ठाकुर उदयनारायण सिंह, शास्त्रप्रकाश भवन मु० मधुरापुर, पो० बिद्दूपुर बाजार जि० मुजफ्फरपुर ।

ॐ अथ ॐ पण्डित हारिलकेशवयोः संक्षिप्तटीका प्रकाश्यते । अथर्ववेदस्य संहिताविधेर्विवरणं क्रियते । तत्र अथर्ववेदस्य नव भेदा भवन्ति । तत्र चतसृषु शाखासु शौनकादिषु कौशिकोऽयं संहिताविधिः । स च गोपथब्राह्म- णादर्थवादादि परित्यज्य विधिमात्रं कल्पयित्वा विधेः कृतसूत्रयथोपयोगं टीका क्रियते संहिताविधेः । कण्डिका ॥ १ ॥ सू० १। —अथशब्द आनन्तर्यार्थः । संहिताप्ययनानन्तरं विधेरधिकारः । संहिताविधिं वक्ष्यामः । शान्तिकपौष्टिकाभिचारिकाद्भुतादीनि कर्माणि संहिताविधौ उक्तानि । त्रिविधानि कर्माणि विधिकर्माणि अविधिकर्माणि उच्छ्रयकर्माणि त्रिप्रमाणको विधिः प्रत्यक्षं अनुमानं शब्दं चेति । उपवर्षाचार्येणोक्तम् । मीमांसायां स्मृतिपादे कल्पसूत्राधिकरणे नक्षत्रकल्पो वितानकल्पस्तृतीयः संहितालल्पश्चतुर्थो अङ्गिरसां कल्पः शान्तिकल्पस्तु पञ्चमः । एते कल्पा वेदतुल्या हि इति भगवानुपवर्षा- चार्येण प्रतिपादितं अन्ये कल्पाः स्मृतितुल्याः । प्रागुदग्वा कर्मसमाप्तिर्दैवकर्मंसु दक्षिणा प्रत्यग्वा समाप्तिः पितृकर्मंसु केचित्प्रागुदगन्तराले समाप्तिः । —सू० १७ । यथा परिव्वाप्ने पुरं वयमिति त्रिः पर्य्यग्नि करोति । कौ० सू० २।१० । —सू० २६ । अग्निं पृष्ठतो नावसेत । —सू०२९।३० । सांख्यायनीये ब्राह्मणे उक्तं द्वे पौर्णमास्यौ द्वे अमावास्ये इति पौर्णमास्याः प्रतिपद्विति अमावास्यायां प्रतिपद्विति पूर्वा उपोष्या उत्तरा याज्या । कौ० । आ० ३।१ । —सू० ३१ । तिथिभेदे मुख्यपौर्णमासोभेदे या पूर्वा सा उपोष्या । उपवासं करोति । कण्डिका ॥ २ ॥ सायं प्रातर्होमवैश्वदेवपिण्डपितृयज्ञादि उद्धृतेऽग्नौ कार्याणि । सू०-१७ । ( केश- वोऽन्यदपि पठति ) ऊर्णास्रदं —सू० १८ । भूपत इति ब्रह्मवरणं तथा च गोभिल- ब्राह्मणम्—प्रत्यक्षं वा दर्भमयं वा आसनं वा उदककमण्डलुं वा ब्रह्मस्थापने वा कुर्यात् ।

२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रस्य- कण्डिका ॥ ३ ॥ सू० १। —युनज्मि त्वेत्येभिः पञ्चभिरिध्ममुपसमादधाति । द्वितीया कण्डिका। —सू० २। जागृमायनमुदपात्रं कांस्यपात्रमुपसाद्य । —सू० ४। जीवास्थेति सूक्तेन त्रिराचामति । सत्यं बृहदिति नवभिः शान्तिवेत्यृचा उदायुषेति द्वाभ्यामुत्तिष्ठति । (कौ० २४।३१) कण्डिका ॥ ४ ॥ सू० ९। —उदेनमुत्तरं नयति त्रिभिर्ऋग्भिः प्रजापते न त्वदिति (७।८०।३) चतस्रश्चर्वाहुतीर्जुहोति (कौ० ५।९) । त्वामग्न इत्यृचा (९।५९।१) चतस्र आज्या- हुतीर्जुहोति । कण्डिका ॥ ५ ॥ सू० १३। —स्वाहेष्टेभ्य इत्येवमादिभिरेकादशभिः सर्वप्रायश्चित्तीयाञ्जुहोति “यन्मे स्कन्नं पुनर्मैत्विन्द्रियमिति च द्वाभ्यामृग्भ्याम्”। कण्डिका ॥ ६ ॥ सू० १०।—केशवः पठति० निसितः। सू० १६। —अगन्म स्वरिति पर्याय- द्वयेन। सू० १७। —पत्न्याञ्जलौ। सू० २२। —तस्मान्नादक्षिणं हविःशब्देनाज्यतन्त्रं पाकतन्त्रं चोच्यते । कर्ममात्रमभिमन्त्रणाद्यदक्षिणं न कुर्यात् । पाकतन्त्रे पूर्णपात्रं माणकं सेतिका प्रस्थद्रोणाढकादि । पूर्णपात्रं यजमानशक्त्यपेक्षं “शक्त्या वा दक्षिणां दद्यान्नातिशक्तिर्विधीयते” इत्युक्तं नवमे । आज्यतन्त्रे धेनुः । सू० २६ । तथा च ब्राह्मणम् । सू० ३० । आज्यतन्त्रे पाकतन्त्रे दर्शपूर्णमासधर्मा भवन्ति पूर्वतन्त्रं च उत्तरतन्त्रं च सर्वेषु पाकतन्त्रेषु सर्वमाथर्वणं कर्म पाकयज्ञशब्देनोच्यते। सू० ३४।— अत्रापि गोपथब्राह्मणपठितौ श्लोकौ भवतः । सू० ३४ ।—केशवोऽपि पठति— देवतेति । सू० ३७। —त्वमग्ने व्रतपा असि तृचं सूक्तं कामस्तदग्र इति पञ्चर्चं सूक्तं एते चारणवैद्यानां पठ्यन्ते तस्मिन्नेव तन्त्रे आज्यं जुहोति शान्तसमिधो वा आदधाति सूक्तयोर्विकल्पः । दर्शपूर्णमासव्यतिक्रमे प्रायश्चित्तम् । सर्वत्र कर्मव्यतिक्रमे सर्व- प्रायश्चित्तीयान्होमाञ्जुहोति । तस्मिन्नेव तन्त्रे अन्यस्मिन्तन्त्रे वा तन्त्रमध्ये सर्वे होमा इति भद्रमतम् । अथ सर्वार्थाः परिभाषा विधिकर्मार्था अविधिकर्मार्था उच्छ्रय- कर्मार्था उच्यन्ते । मेधाजननादिपिण्डपितृयज्ञान्तं यावद्विधिकर्माणि । मधुपर्कादि इन्द्रमहान्तं यावदविधिकर्माणि । पाकयज्ञविधिकर्मंसूक्तेन विनियोगं कृत्वा पश्चादृचां विनियोगस्तान्युच्छ्रयकर्माणि । त्रिविधानि कर्माणि । उपदधातीत्यनादेशे आज्यं समित् पुरोडाशः पयः दध्योदनः पायसः व्रीहिः यवः तिलः धानाः करम्भः

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४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रस्य— यवतिलादीन्याभ्याधेयादीनि यजमानं धूमं भक्षयति । सू० २९ । —कर्मसमाप्तौ शुचिना कर्मप्रयोगः । नित्यनैमित्तिककाम्यानि कर्माणि स्नानं कृत्वा प्रयुञ्जीत । कण्डिका ॥ ८ ॥ सू० १ । —सर्वकर्मार्था परिभाषा । अथ निशाकर्मपरिभाषा उच्यन्ते । येषु निशाकर्मंसु तन्त्रं तेषु अयं धर्मः । केचित् स्नातोऽहतवसनः प्रयुङ्क्ते इति सर्वार्था परिभाषा मन्यन्ते । ——सू० २ । अथ स्वस्त्ययनपरिभाषा उच्यन्ते । स्वस्त्ययनेषु चेज्यानो दिश्यान् बलीन् हरति प्रतिदिशमुपतिष्ठते । येऽस्यां स्थेति सूक्तेन प्रतिदिशं प्रत्यृचं बलिहरणं करोति । प्राचीदिगिति । प्रतिदिशमुपतिष्ठते । यथा उत्तमेन सारूपवत्सस्य रुद्राय त्रिर्जुहोति । ( कौ० ५०।१४ ) तत्र हविरुच्छिष्टेन बलिहरणं कुर्यात् । समाप्ता स्वस्त्ययनपरिभाषा । सू० ५ । —पुनः सर्वार्थाः परिभाषा उच्यन्ते । सर्वत्राधिकरणं कर्तुर्दक्षिणा । हविरुच्छिष्टं आज्यधानी उदपात्रं चर्ममण्डपदर्भसमिधः शान्त्युदकभाजनं स्रुक्स्रुवादीनि देयानि । नित्येषु नाधिकरणमस्ति परद्रव्येषु नाधि- करणमस्ति यथा नापितस्य क्षुरम् । ( कौ० ५५ । ) सू० ६ । —प्रोक्षणाचमनपर्यु- क्षणादि त्रिः कर्त्तव्यम् । सू० ८ । सर्वत्र शान्तिकेषु शान्तं संभारं दर्भसमिधादि । अभिचारे रौद्रं आङ्गिरसं संभारं (कौ० ४७।२।) सू० ९ । --स्रुक्स्रुवसमिधः काष्ठादि मणिद्रव्यकाष्ठाः कर्तव्यानि । प्रतीकं च द्रव्यञ्च । यथा कथं मह इति मादानक- शृतं क्षीरौदनमश्नाति । चमसे सरूपवत्सायाः दुग्धे ( कौ० १२।१।२ । ) चमसोऽपि मादानक एव । कथं मह इति उत्तरमपि अनेन सूक्तेन कर्म कुर्यात् । सू० १० विषये यथान्तरम् । मन्त्रद्रव्यसंशये संनिधानं गृहीतव्यं यथा लोमानि हस्तिरोमाणि यथा विद्मा शरस्येति प्रमेहाणं बध्नाति ( कौ० २५।१० ) सू० १२ । उलूखलमुसल- काष्ठम् । अन्यार्थं इन्धनार्थं काष्ठतक्षणं करोति । सू० १५ । —अथ शान्तवृक्षा उच्यन्ते । स्रग्मालवके प्रसिद्धः । बंधः कान्यकुब्जे प्रसिद्धः । शिरीषो भोजपुरे वाटिकायां प्रसिद्धः । शम्यस्तिलकः प्रसिद्धः । वरणो वरुणकः इति आनन्दपुरे प्रसिद्धः । जङ्गिडो वारा- णस्यां प्रसिद्धः । कुडको मालवके । गङ्गो हिमवति । गलावल्लस्तत्रैव प्रसिद्धः । स्यन्दनः हिमवति नर्मदायां प्रसिद्धः । अरणिका नर्मदातटे प्रसिद्धः । अश्मयोक्त अश्मन्तको भृगुकच्छे प्रसिद्धः । तुन्युस्तैन्दुका । पूतदारुर्देवदारुर्वैद्यके प्रसिद्धः । समाप्ताः शान्त- वृक्षाः । सू० १६ । अथ शान्त्यौषधय उच्यन्ते । चित्तिः प्रसिद्धा प्रायश्चित्तिः पर्वणि पर्वणि तस्याः त्रीणि त्रीणि पात्राणि भवन्ति । शमकानन्दपुरे विश्वामित्रो- वाप्याः समीपेऽस्ति । सवंशाघर्मोलिका साम्यवाका काकजंघासदृशा तलाशा वेतसी । वात्सक आटरूषकः ( कौ० ३९।६ ) सीसपात्रं ( शीशम ) प्रसिद्धम् । शाल्मलिः प्रसिद्धः सिपुत्रांकरी । आकृतिकोटः क्षेत्रमृत्तिका वल्मीकमृत्तिका । एताः सर्वाः

संक्षिप्तटीकासङ्ग्रहः । ५

शान्ता ओषधयः शान्त्युदकादौ प्रयोक्तव्याः एतासां समुच्चयः । एतासामलाभे यव- प्रतिनिधिः कार्यः इति पैठीनसिः । शान्त्यौषधिकल्पः समाप्तः । सू० १७ । प्रमन्दोशीरशलल्युपधानं शकधूमा जरन्तः । उपधानं विद्यागन्धुकं शकधूमः ब्राह्मणः एता जरन्तः जीर्णा ग्राह्याः । सू० १८ । — यत्र सीसानि तत्र एतानि सर्वाणि प्रत्येत्त- ब्यानि । नदीसीसं नदीफेनम् । सू० १९ । — रसकर्मणि एते रसाः प्रत्येत्तव्याः समु- च्चयेन । — सू० २० यवाकस्ति इन्द्रयव । प्रियङ्गुः कंगुणिका । सू० २१ । — ग्रहणं प्रतीकग्रहणं ग्रहणमनुग्रहणं तावदनुवर्तते यावत्प्रतीकग्रहणं द्वितीयम् । सू० २२ । — अनुषङ्गः यथार्थं सर्वत्र कर्तव्यः । यथा विद्मा शरस्य पितरं पर्जन्यं शत- वृष्ण्यमिति ( कौ० २५।१० ) वैदिकं लौकिकमिति भवति कृतयामं कंकतमव- सृजामीति ( कौ० ७६।५।६ ) अनुषङ्गः पुनरुक्तमित्यर्थः । सू० २४ । — अथ चतुर्गणो महाशान्त्याः पठ्यन्ते । सू० २५ । — अरायक्षयणमिति तिस्रः । १८।३।५

कण्डिका ॥ ६ ॥

सू० १ — ये अग्नय इति सप्त ब्रह्मयज्ञानमित्येका । अग्नेर्मन्व इति सप्त सूगार सूक्तानि ग्रहीतव्यानि ॥ सू० २ । — प्रथमे द्वे उत्तमं वर्जयित्वा शं च नो मयश्च न इत्येका पुनर्मैत्विन्द्रियमित्येका शिवान इत्येका शं नो वातो वातु इत्येका शेषाणि सूक्तानि । अनेन शान्तिगणेन शान्त्युदकं कुर्यात् । सू० ३ । — यत्र शान्त्युदकं क्रियते तत्र पृथिव्यै श्रोत्रायेति त्रिभिऋग्भिः शान्त्युदकं शान्त्युदकमध्ये प्रक्षिपेत् । अनेनैव कारयिता प्रोक्षणाचमनादीनि प्रत्यृचं करोति । सू० ४ । — एष शान्ता- तीयो गणः । यत्र शान्तातीयेन प्रयोजनं तत्रायं सर्वत्र प्रयोक्तव्य इति । यथा शान्ता- तीयेन तिलाञ्जुहोति । — सू० ६ । शान्तिसूक्तानि । इह शान्त्युदके सर्वेषां सूक्तानां समुच्चयः । अन्यत्र सर्वत्र यथोक्तेन न्यायेन विकल्पः न सूक्तविकल्पः । सू० ७ । — उभयतः शान्तिगणस्य प्रारम्भे समाप्तौ च । सू० ८ । — अथ शान्त्युदकविधान- मुच्यते । सू० ९ । — अवकरं विसर्जयति । अनुज्ञातः शान्त्युदकं करोति शं नो देवीत्यृचा सावित्री च अम्बयो यन्ति गणेन च शान्त्युदकं करोति लघुगणेन बृहद्गणेन वा चतुर्गणैर्वा । सावित्री शन्नो देवी । ततः पृथिव्यै श्रोत्रायेति त्रिः प्रत्यासिञ्चति शान्त्यु- दके शान्त्युदकं प्रक्षिपति । सू० १० । — एते चतुर्गणेन बृहद्गणेनैकेन वा शान्त्यु- दकं कुर्वन्ति । शान्त्युदककर्मपरिभाषा समाप्ता । नवमी कण्डिका । तत्र भद्रश्लोकः ।

प्रमाणं पार्वणे चैव प्रकृतित्वात्परीक्षिते । परिभाषा च सर्वार्था प्रथमेऽध्याये संहिताविधौ ॥

इति प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

सू० २ । —सारिका जिह्वां बध्नाति । सारिका कंटारिका प्रसिद्धा । —सू० ३ । –कृशो भारद्वाजः ॥ सू० ४ । —कर्कन्धूः बृहद्वदरी । सू० ६ । —ये त्रि षप्ता० इति सूक्तेन क्षीरौदनं संपात्याभिमन्त्र्यभक्षयति । पुरोडाशं भक्षयति । रसान् भक्ष- यति । रसप्राशनं सर्वत्र त्वे क्रतुमित्यृचा कर्त्तव्यम् । (कौ० २।१२१) सू० ७ ।— ये त्रि षप्ता इति सूक्तेन उपनयनानन्तरं द्वादशरात्रम् । बहुभैक्ष्यमेकत्र कृत्वाभि- मन्त्र्य उपाध्यायो ददाति । सू० ८ ।— सुप्तस्योपाध्यायस्य कर्णमनुमन्त्रयते ब्रह्म- चारी । सू० ९ ।— यदा यदा उपाध्यायगृहं याति तदा तदा जपति ब्रह्मचारी ॥ सू० १५ ।— उपाध्यायाय । सू० १६ ।— शुक्लपुष्पहरितपुष्पे इति शंख- पुष्पिका अन्धपुष्पिका प्रसिद्धे । सू० १७ ।— सम्यक् वर्चस्कामो मेधाकामश्च

( कौ०-४-६; ११, १२,— १८ ) सू० ५ ।- सांमनस्याधिकार आवर्चस्येभ्यः कर्मभ्यो यावत् । जातपुत्रस्य सांमनस्यं क्रियते । यावज्जीवं संजातानां सगोत्राणां सांमनस्यं भवति । सू० ६ ।— उदकुम्भं सम्पातवन्तं कृत्वा ग्रामपार्श्वे आमयित्वा । सू० ८ । — शुक्त्यानि । अम्लेन रसेन सिक्तानि मांसानि ॥ सू० ९ ।— सह- दयमिति भक्तं सम्पात्याभिमन्त्र्याशयति । सुरां प्रयच्छति पुरुषेभ्यः त्रैवर्णिकेभ्यः प्रपोदकं प्रयच्छति । सांमनस्यानि समाप्तानि । सू० १० ।— अथ वर्चस्यविधिं वक्ष्यामः । ये त्रिषप्ता इति सूक्तेन औदुम्बरसमिध आदधाति । सर्वत्र वर्च- स्कामोऽनुवर्तते अराजकर्मभ्यो यावत् । ( कौ० १४।१ ) सू० १२ । अथ कुमारी- वर्चस्यमुच्यते । कुमारी रूपवती वर्चस्विनी भर्तृगृहे प्रधाना भवति । सू० १६ ।- वैश्यशूद्रानुलोमजाः ।

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