कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
पृष्ठ 288, कुल 361 में से
संदर्भ में पढ़ें२५६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । इति सदर्वीमेकविंशीम् ॥१२॥ एकविंशतिसंस्थो यज्ञो विज्ञायते ॥१३॥ सर्वा एव यज्ञतनूरवरुन्द्धे सर्वा एवास्य यज्ञतनूः पितरमुपजीवन्ति य एवमष्टकामुपैति ॥१४॥ न दर्विहोमे न हस्तहोमे न पूर्णहोमे तन्त्रं क्रियेतेत्येके ॥१५॥ अष्टकायां क्रियेतेतीषुफालिमाठरौ ॥१६॥२॥१३८॥ अभिजिति शिष्यानुपनीय श्वो भूते सम्भारान् सम्भरति ॥१॥ दधिसक्तून्पालाशं दण्डमहते वसने शुद्ध- माज्यं शान्ता ओषधीर्नवमुदकुम्भम् ॥२॥ बाह्यतः शान्त- वृक्षस्येध्मं प्राञ्चमुपसमाधाय ॥३॥ परिसमुह्य पर्युक्ष्य परिस्तीर्य बर्हिरुदपात्रमुपसाद्य परिचरणेनाज्यं परिचर्य ॥४॥ नित्यान् पुरस्ताद्धोमान् हुत्वाज्यभागौ च ॥५॥ पश्चादग्नेर्दधिसक्तूञ्जुहोत्यग्नये ब्रह्मप्रजापतिभ्यां भृग्व- ङ्गििरोभ्य उशनसे काव्याय ॥६॥ ततोऽभयैरपराजितैर्गण- यह इक्कीसवी हुई ॥१२॥ इक्कीस संस्थ यज्ञ है ऐसा जान पड़ता है ॥१३॥ सब ही यज्ञ तनू को रोक लेता है। सब ही इसके यज्ञतनू से पितर लोगों का उपजीवन होता है जो अष्टका को करता है ॥१४॥ न दर्वि होम में, न हस्त होम में, न पूर्ण होम में तन्त्र को करे—ऐसा बहुत से आचार्य्य कहते हैं ॥१५॥ “अष्टका में करे” यह इषुफालि एवं माठर कहते हैं ॥१६॥२॥१३८॥ यह एकसौ अड़तीसवी कण्डिका पूरी हुई ॥ अभिजित् नक्षत्र के साथ जब चन्द्रमा हों तो शिष्यों को पास बुलाकर प्रातःकाल सामग्रियों को एकत्र करे ॥१॥ दही, सत्तू, पलाश का दण्ड, अखण्ड नये दो वस्त्र, शुद्ध आज्य, शान्ता ओषधी, नये घड़े ॥२॥ बाहर से शान्त वृक्ष के इध्मों को पूर्व को आधान ,करे ॥३॥ परिसमू- हन, पर्युक्षण, परिस्तरण करके बर्हि कुश और जलपात्र लाकर यथाविधि परिचर्या करके ॥४॥ नित्य पुरस्तात् होम और आज्यभाग के दो होर्मों को करके ॥५॥ अग्नि के पश्चिम भाग में दही एवं सत्तू से “अग्नये ब्रह्मप्रजापतिभ्यां भृग्वङ्गिरोभ्य उशनसे काव्याय” की आहुति करके तब अभय गण, अपराजित गण, गणकर्म गण, विश्वकर्म गण, आयुष्य गण,