भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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पृष्ठ 289

कर्मभिर्विश्वकर्मभिरायुष्यैः स्वस्त्ययनैराज्यं जुहुयात्॥७॥ मा नो देवा अहिर्वधीदरसस्य शर्कोटस्येन्द्रस्य प्रथमो रथो यस्ते सर्पो वृश्चिकस्तृष्टदंशमा नमस्ते अस्तु विद्युत आरेऽसावस्मदस्तु यस्ते पृथु स्तनयित्नुरिति संस्थाप्य होमान् ॥८॥ प्रतिष्ठाप्य स्रुवं दधिसक्तून्प्राश्याचम्योदक- मुपसमारभन्ते ॥९॥ अव्यचसञ्चेति जपित्वा सावित्रीं ब्रह्म जज्ञानमित्येकां त्रिपत्तीयं च पच्छो वाचयेत् ॥१०॥ शेषमनुवाकस्य जपन्ति ॥११॥ यो यो भोगः कर्त्तव्यो भवति तं तं कुर्वते ॥१२॥ स खल्वेतं पक्षमपक्षीयमाणः पक्षमनधीयान उपशाम्येतादर्शात् ॥१३॥ दृष्टे चन्द्रमसि फल्गुनीषु द्वयान्नसानुपसादयति ॥१४॥ विश्वे देवा अहं रुद्रेभिः सिंहे व्याघ्रे यशो हविर्यशसं मेन्द्रो गिराव- रागराटेषु यथा सोमः प्रातःसवने यच्च वर्चो अक्षेषु येन महानघ्न्या जघनं स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा ॥१५॥ रसेषु सम्पातानानीय संस्थाप्य होमान् ॥१६॥ तत एतान्प्राश- यति रसान्समधुघृताञ्छिष्यान् ॥१७॥ यो यो भोगः स्वस्त्ययन गण, इन सूक्तों के मंत्रों से आहुतियाँ देवे ॥७॥ “मा नो देवा०” इत्यादि से आहुतियाँ देवे और होमों को संस्थापन करके ॥८॥ स्रुव को धरकर, दधि सत्तू को प्राशन करके आचमन करके जल के पास जावे ॥९॥ “अव्यचसश्च०” इत्यादि का जप करके सावित्री को, “ब्रह्म जज्ञानं०” इस एक ऋचा को और त्रिपतीर्य को पद २ करके वाचें ॥१०॥ शेष अनुवाक का जप करे । जो २ भोग करना हो, उस २ को करे । वह अवश्य ही इस पक्ष को, अपक्षीयमाण पक्ष को नहीं पढ़ते हुए पर्व तक विश्राम करे ॥११॥१२॥१३॥ जब चन्द्रमा फल्गुनी नक्षत्र पर हों तो दो रसों को लाकर “विश्वे देवा०” इत्यादि से अग्नि में आहुति करके ॥१४॥१५॥ रसों में सम्पातों को लाकर होमों को संस्थापन करके ॥१६॥ इसके पश्चात् इन रसों को तीन शिष्यों को प्राशन करावे (मधु, रस, ३३