कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । कर्तव्यो भवति तं तं कुर्वते ॥१८॥ नान्यत आगताञ्छि- ष्यान् परिगृह्णीयादपरसन्दीक्षितत्वात् ॥१९॥ त्रिरात्रोनां- श्चतुरो मासाञ्छिष्येभ्यः प्रब्रूयादर्धपञ्चमान् वा ॥२०॥ पादं पूर्वरात्रेऽधीयानः पादमपररात्रे मध्यरात्रे स्वपन्॥२१॥ अभुक्त्वा पूर्वरात्रेऽधीयान इत्येके ॥२२॥ यथाशक्त्यपर- रात्रे दुष्परिणामो ह पादः ॥२३॥ पौष्यस्यापरपक्षे त्रिरात्रं नाधीयीत ॥२४॥ तृतीयस्याः प्रातः समासं सन्दिश्य यस्मात्कोशादित्यन्तः ॥२५॥ यस्मात्कोशादुद्भराम वेदं तस्मिन्नन्तरवदध्म एनम् । अधीतमिष्टं ब्रह्मणो वीर्येण तेन मा देवास्तपसावतेहेति ॥२६॥ यो यो भोगः कर्तव्यो भवति तं तं कुर्वते ॥२७॥ ये परिमोक्षं कामयन्ते ते परि- मुच्यन्ते ॥२८॥३॥१३६॥
घृत, ) ॥१७॥ जो २ भोग करना हो, उस २ को भोग करे ॥१८॥ अन्य स्थानों से आये हुए शिष्यों को रसों को प्राशन न करावे क्योंकि उनकी दीक्षा दूसरे आचार्यों से मिली है ॥१९॥ तीन रात न्यून चार मास तक आचार्य्य शिष्यों को प्रवाचन करे या साढ़े पाँच महीने ॥२०॥ रात्रि के पूर्व भाग में एक पाद् और आधी रात्रि के पीछे एक पाद् पढ़े, रात्रि के मध्य भाग में शयन करे ॥२१॥ बिना भोजन किये हुए रात के पूर्व भाग में पढ़े ऐसा किन्हीं का मत है ॥२२॥ यथाशक्ति अपर रात्र में पढ़े, इस समय पाद् पढ़ने का परिणाम बुरा होता है क्योंकि पाद् दुष्प- रिणाम है ॥२३॥ पौष्य मास के अपर पक्ष में तीन रात्रि न पढ़े ॥२४॥ तृतीया के प्रातःकाल समास को आरम्भ कर “यस्मात् कोशात्” इस अन्त तक ॥२५॥ “यस्मात् कोशादुद्भराम वेदं तस्मिन्नन्तरवदध्म एनम् । अधीतमिष्टं ब्रह्मणो वीर्येण तेन मा देवास्तपसावतेहेति ॥२६॥ यो यो भोगः कर्तव्यो भवति तं तं कुर्वते ॥२७॥ ये परिमोक्षं कामयन्ते ते परिमुच्यन्ते” ॥२८॥३॥१३९॥ यह एकसौ उनतालीसवी कण्डिका पूरी हुई ॥