भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

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अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २५९ अथ राज्ञामिन्द्रमहस्योपचारकल्पं व्याख्यास्यामः ॥१॥ प्रौष्ठपदे शुक्लपक्षे आश्वयुजे वाष्टम्यां प्रवेशः ॥२॥ श्रवणेनोत्थापनम् ॥ ३ ॥ संभृतेषु संभारेषु ब्रह्मा राजा चोभौ स्नातावहतवसनौ सुरभिणौ व्रतवन्तौ कर्मण्या- वुपवसतः ॥४॥ श्वो भूते शं नो देव्याः पादैरर्धर्चाभ्यामृचा षट्कृत्वोदकमाचामतः ॥५॥ अर्वाञ्चमिन्द्रं त्रातारमिन्द्रः सुत्रामेत्याज्यं हुत्वा ॥६॥ अथेन्द्रमुत्थापयन्ति ॥७॥ आ स्वाहार्षं ध्रुवा द्यौर्विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्त्विति सर्वतो- ऽप्रमत्ता धारयेरन् ॥८॥ अद्भुतं हि विमानोत्थितमुपति- ष्ठन्ते ॥ ६ ॥ अभिभूर्यज्ञ इत्येतैस्त्रिभिः सूक्तैरन्वारब्धे राजनि पूर्णहोमं जुहुयात् ॥१०॥ अथ पशूनामुपचारम् ॥११॥ इन्द्रदेवताः स्युः ॥१२॥ ये राज्ञो भृत्याः स्युः सर्वे दीक्षिता ब्रह्मचारिणः स्युः ॥१३॥ इन्द्रं चोपसद्य यजेरंस्त्रि- रात्रं पञ्चरात्रं वा ॥१४॥ त्रिरयनमहासुपतिष्ठन्ते हविषा च अब राजाओं के इन्द्र महोत्सव का आचार कल्प को कहेंगे ॥१॥ भादो मास के शुक्लपक्ष में या आश्विन के अष्टमी को प्रवेश करे ॥२॥ और श्रावण मास में उत्थापन करे ॥३॥ सामग्रियों के जुट जाने पर ब्रह्मा और राजा दोनों, स्नान करके अखण्ड नये वस्त्र पहिने हुए, सुगन्धि से युक्त, व्रती, कर्म में उपवास रहते हुए ॥४॥ प्रातःकाल “शन्नो देव्या०” इत्यादि के पादों, आधी ऋचाओं से छः बार जल से आचमन करते हुए ॥५॥ “अर्वाञ्चमिन्द्रं ०” से आज्य की आहुति करके ॥६॥ अब इन्द्र को उत्थापन करे ॥७॥ “आ त्वा हार्षं०” इत्यादि से सब ओर अप्रमत्त हो धारण करे ॥८॥ क्योंकि आश्चर्य है उठाये हुए विमान का उपस्थान करना ॥९॥ “अभिभूर्यज्ञ०” इन तीन ऋचाओं के सूक्तों से अन्वारब्ध करके राजा पूर्ण होम करे ॥१०॥ अब पशु के उपचार को कहते हैं ॥११॥ इन्द्र देवता होवें ॥१२॥ जो राजा के नौकर होवें वे सब दीक्षित ब्रह्मचारी होवें ॥ १३ ॥ इन्द्र के पास पहुँच कर तीन रात्रि या पाँच