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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २५९ अथ राज्ञामिन्द्रमहस्योपचारकल्पं व्याख्यास्यामः ॥१॥ प्रौष्ठपदे शुक्लपक्षे आश्वयुजे वाष्टम्यां प्रवेशः ॥२॥ श्रवणेनोत्थापनम् ॥ ३ ॥ संभृतेषु संभारेषु ब्रह्मा राजा चोभौ स्नातावहतवसनौ सुरभिणौ व्रतवन्तौ कर्मण्या- वुपवसतः ॥४॥ श्वो भूते शं नो देव्याः पादैरर्धर्चाभ्यामृचा षट्कृत्वोदकमाचामतः ॥५॥ अर्वाञ्चमिन्द्रं त्रातारमिन्द्रः सुत्रामेत्याज्यं हुत्वा ॥६॥ अथेन्द्रमुत्थापयन्ति ॥७॥ आ स्वाहार्षं ध्रुवा द्यौर्विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्त्विति सर्वतो- ऽप्रमत्ता धारयेरन् ॥८॥ अद्भुतं हि विमानोत्थितमुपति- ष्ठन्ते ॥ ६ ॥ अभिभूर्यज्ञ इत्येतैस्त्रिभिः सूक्तैरन्वारब्धे राजनि पूर्णहोमं जुहुयात् ॥१०॥ अथ पशूनामुपचारम् ॥११॥ इन्द्रदेवताः स्युः ॥१२॥ ये राज्ञो भृत्याः स्युः सर्वे दीक्षिता ब्रह्मचारिणः स्युः ॥१३॥ इन्द्रं चोपसद्य यजेरंस्त्रि- रात्रं पञ्चरात्रं वा ॥१४॥ त्रिरयनमहासुपतिष्ठन्ते हविषा च अब राजाओं के इन्द्र महोत्सव का आचार कल्प को कहेंगे ॥१॥ भादो मास के शुक्लपक्ष में या आश्विन के अष्टमी को प्रवेश करे ॥२॥ और श्रावण मास में उत्थापन करे ॥३॥ सामग्रियों के जुट जाने पर ब्रह्मा और राजा दोनों, स्नान करके अखण्ड नये वस्त्र पहिने हुए, सुगन्धि से युक्त, व्रती, कर्म में उपवास रहते हुए ॥४॥ प्रातःकाल “शन्नो देव्या०” इत्यादि के पादों, आधी ऋचाओं से छः बार जल से आचमन करते हुए ॥५॥ “अर्वाञ्चमिन्द्रं ०” से आज्य की आहुति करके ॥६॥ अब इन्द्र को उत्थापन करे ॥७॥ “आ त्वा हार्षं०” इत्यादि से सब ओर अप्रमत्त हो धारण करे ॥८॥ क्योंकि आश्चर्य है उठाये हुए विमान का उपस्थान करना ॥९॥ “अभिभूर्यज्ञ०” इन तीन ऋचाओं के सूक्तों से अन्वारब्ध करके राजा पूर्ण होम करे ॥१०॥ अब पशु के उपचार को कहते हैं ॥११॥ इन्द्र देवता होवें ॥१२॥ जो राजा के नौकर होवें वे सब दीक्षित ब्रह्मचारी होवें ॥ १३ ॥ इन्द्र के पास पहुँच कर तीन रात्रि या पाँच

२६० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । यजन्ते॥१५॥ आवृत इन्द्रमहमिति ॥१६॥ इन्द्र क्षत्रमिति हविषो हुत्वा ब्राह्मणान् परिचरेयुः ॥१७॥ न संस्थितहो- माञ्जुहुयादित्याहुराचार्याः ॥१८॥ इन्द्रस्यावभृथादिन्द्र- मवभृथाय व्रजन्ति ॥१९॥ अपां सूक्तैराप्लुत्य प्रदक्षिण- मावृत्याप उपस्पृश्यानवेक्षमाणाः प्रत्युदाव्रजन्ति ॥२०॥ ब्राह्मणान् भक्तेनोपेप्सन्ति ॥२१॥ श्वःश्वोऽस्य राष्ट्रं ज्यायो भवत्येकोऽस्यां पृथिव्यां राजा भवति न पुरा जरसः प्रमीयते य एवं वेद यश्चैवं विद्वानिन्द्रमहेण चरति ॥ २२॥४॥१४०॥ अथ वेदस्याध्ययनविधिं वक्ष्यामः ॥१॥ श्रावण्यां प्रौष्ठपद्यां वोपाकृत्यार्धपञ्चमान्मासानधीयीरन् ॥ २ ॥ एवं छन्दांसि ॥३॥ लोम्नां चानिवर्तनम् ॥४॥ अर्धमासं चोपाकृत्य क्षपेरंस्त्र्यहमुत्सृज्य । आरम्भः श्रावण्या- रात पूजा करे ॥ १४ ॥ तीन अयन दिनों का उपस्थान करें आहुतियों से यज्ञ करे ॥ १५ ॥ इन्द्र को घेर, “इन्द्रमहं०” से आहुति करे । “इन्द्र क्षत्रं०” से हवियों की आहुति करके, ब्राह्मणों की परिचर्या करें ॥१६॥१७॥ आचार्य्यगण कहते हैं कि संस्थित होर्मों को न करे ॥१८॥ इन्द्र के अवभृथ से इन्द्र के अवभृथ के लिये जावें ॥ १९ ॥ जल सूक्त से स्नान कर, प्रदक्षिण फेरे लगाकर, जल छूकर, नहीं देखते हुए, आवें ॥ २० ॥ ब्राह्मण चाहें उनको देकर उन्हें प्रसन्न करें ॥ २१ ॥ दिन २ इसका राष्ट्र बढ़े, पृथिवी का राजा होवे और बुढ़ापेसे पहिले इसकी मृत्यु न होवे। जो ऐसा जानता है और जो विद्वान् इन्द्र महोत्सव जैसा करता है ॥२२॥४॥१४०॥ यह एकसौ चालीसवी कण्डिका खतम हुई ॥ · अब वेद का अध्ययन विधि को कहेंगे ॥ १ ॥ श्रावण की पौर्णमासी या भाद्रपद की पौर्णमासी को वेद का उपाकृत्य ( आरम्भ ) कर साढ़े पाँच महीने पढ़ें ॥ २ ॥ इसी प्रकार छन्दों को पढ़ें ॥ ३ ॥ लोमों को न कटवावें ॥ ४ ॥ अर्ध मास तक आरम्भ करके तीन दिन पढ़ना बन्द

मुक्तः पौष्यामुत्सर्ग उच्यते ॥५॥ अथानध्यायान्वक्ष्यामः ॥६॥ ब्रह्मज्येषु निवर्तते ॥७॥ श्राद्धे ॥८॥ सूतकोत्थान- च्छर्द्दनेषु त्रिषु चरणम् ॥९॥ आचार्यास्तमिते वा येषां च मानुषी योनिः ॥१०॥ यथा श्राद्धं तथैव तेषु ॥११॥ सर्वे च श्राद्धिकं द्रव्यमदसाहव्यपेतं प्रतिगृह्यानध्यायः ॥१२॥ प्राणि चाप्राणि च ॥१३॥ दन्तधावने ॥१४॥ क्षुरसंस्पर्शे ॥१५॥ प्रादुष्कृतेष्वग्निषु ॥१६॥ विद्युताऽर्धरात्रे स्तनिते ॥१७॥ सप्तकृत्वो वर्षेण विरत आप्रातराशम् ॥१८॥ वृष्टे ॥१९॥ निर्घाते ॥२०॥ भूमिचलने ॥२१॥ ज्योतिषोपसर्जन ऋता- वप्याकालम् ॥ २२ ॥ विषमे न प्रवृत्तिः ॥ २३ ॥ अथ प्रमाणं वक्ष्यामः समानं विद्युदुल्कयोः। मार्गशीर्षपौषमा- घापरपक्षेषु तिस्रोऽष्टकाः ॥२४॥ अमावास्यायां च ॥२५॥ त्रीणि चानध्ययनानि ॥२६॥ जनने मरणे चैव दश-


करके, श्रावणी में आरम्भ करना कहा गया और पौष की पौर्णमासी को पढ़ना छोड़ देवें ॥५॥ अब अनध्यायों को कहेंगे ॥ ६॥ ब्रह्मज्यों में छोड़े ॥ ९॥ आचार्य सूर्यास्त होने पर या जिनके घर में प्रसव होवे उनको सूतक तक न पढ़ना चाहिये ॥ १० ॥ जैसा श्राद्ध वैसा ही उनके लिये भी ॥ ११॥ सब ही श्राद्धिक दशाह तक प्रत्येक गृही को वर्ज्य है ॥१२॥ जीवधारी या अप्राणि हो ॥१३॥ दन्तधावन में, नापित के क्षुर के संसर्ग में, प्रादुष्कृत अग्नि में, आधी रात को बिजुली कड़कने में ॥१४॥१५॥१६॥१७॥ सात वार तक पढ़ने से विरत रहे जब तक प्रातःकालिक भोजन हो ॥१८॥ वर्षा होने में, उल्कापात में, भूमिकम्प में ॥१९॥२०॥२१॥ ज्योतिष ( प्रकाश का छिप जाना ) के उप- सर्जन में, ऋतु में भी जब तक काल हो ॥२२॥ संकट में प्रवृत्ति न करे ॥२३॥ अब प्रमाण को कहते हैं । बिजुली एवं उल्कापात में समान दोष है ॥२४॥ अग्रहण, पौष, माघ के अपर पक्षों में तीन अष्टकायें होती हैं ॥२४॥ और अमावास्या में भो ॥२५॥ और तीन ही अनध्याय हैं ॥२६॥

२६२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । रात्रो विधीयते ॥ आचार्ये दशरात्रं स्याह्सर्वेषु च स्व- योनिषु ॥२७॥ सूतके त्वेको नाधीयीत त्रिरात्रमुपाध्यायं वर्जयेत् ॥२८॥ आचार्यपुत्रभार्याश्च ॥२९॥ अथ शिष्यं सहाध्यायिनमप्रधानगुरुं चोपसन्नमहोरात्रं वर्जयेत्॥३०॥ तथा सब्रह्मचारिणं राजानं च ॥३१॥ अपर्तुदैवमाकालम् ॥३२॥ अविशेषर्तुकालेन सर्वे निर्घातादयः स्मृताः । यच्चान्यद्दैवमद्भुतं सर्वं निर्घातवद् भवेत् ॥३३॥ ऋतावध्या- यश्छान्दसः कल्प्य आपर्तुकः स्मृतः ॥ ऋतावूर्ध्वं प्रात- राशाद्यस्तु कश्चिदनध्यायः । सन्ध्यां प्राप्नोति पश्चिमाम् ॥३४॥ सर्वेण प्रदोषो लुप्यते ॥३५॥ निशि निगदायां च विचुति शिष्टं नाधीयीत ॥३६॥ अस्तमिते द्विसत्तायां त्रिसत्तायां च पाटवः । अथ तावत्कालं भुक्त्वा प्रदोष जन्म और मरण में दश रात्रि अशौच होता है, आचार्य के मरण में भी दश रात अशौच होता है, सब ही सगोत्री को अशौच होता है ॥२७॥ तक में एकही न पढ़े, तीन रात उपाध्याय के पास जाना बन्द कर देवे ॥२८॥ आचार्य, पुत्र, उनकी भार्या, इनके पास न जावे तीन रात तक ॥२९॥ अब शिष्य जो साथ पढ़ता है, और अप्रधान गुरु, जो पास रहते है उनके पास एक दिन रात न जावे ॥३०॥ उसी प्रकार साथ के ब्रह्मचारी और राजा के पास भी एक दिन रात न जावे ॥३१॥ अपर्तु- दैव अर्थात् ऋतु अस्वाभाविक हो एवं दैवी उपद्रव हो तो जब तक अच्छा समय न हो तब तक न पढ़े ॥३२॥ अविशेष ऋतुकाल में सबही को वज्रपात की भांति अपसमय जानना ॥ और भी जितने अद्भुत हैं सबही वज्रपात की भांति हैं ॥३३॥ ऋतु में छन्दों का पढ़ना भौर कल्प पढ़ना अपर्तु में। ऋतु के पश्चात् प्रातराश( तक जो कोई अनध्याय है । सायंकाल होने पर ( सायंकाल ) ॥३४॥ सबही के मत से प्रदोष काल ( रात्रि का आरम्भ ) दूषित है ॥ ३५॥ रात्रि में निगदा ( निःशब्द होने में ) काल में, बिजुली कड़कने में न पढ़े ॥३६॥ अस्तमित काल में, दो या तीन सन्धिकाल में न पढ़े ॥ प्रदोष, दोनों सन्ध्या, जल में,

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २६३ उभे सन्ध्ये ॥३७॥ अप्सु श्मशाने शय्यायामभिशस्ते खिलेषु च ॥ अन्तःशवे रथ्यायां ग्रामे चाण्डालसंयुते ॥३८॥ दुर्गन्धे शूद्रसंश्रावे पैङ्गे शब्दे भये रुते । वैधृते नगरेषु च ॥३९॥ अनिक्तेन च वाससा चरितं येन मैथु- नम् । शयानः प्रौढपादो चाग्रतोपस्थान्तिके गुरोः ॥४०॥ विरम्य मारुते शीघ्रे प्रत्यारम्भो विभाषितः ॥ सर्वेणा- पररात्रेण विरम्य प्रत्यारम्भो न विद्यते ॥ ४१ ॥ पौषी प्रमाणमभ्रेष्वापर्तु चेदधीयानाम् ॥४२॥ वर्षे विद्युत्स्त- नयित्नुर्वा विपद्यते ॥४३॥ त्रिरात्रं स्थानासनं ब्रह्मचर्यम- रसाशं चोपेयुः ॥ ४४ ॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४५॥५॥१४१॥ इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे चतुर्दशोऽध्यायः समाप्तः ॥१४॥ ॥ इति कौशिकसूत्रं समाप्तम् ॥ श्मशान में, बिछावन (शयन स्थान में) पर, जिस स्थान में शव हो, गली में, जिस ग्राम में चाण्डाल रहता हो, दुर्गन्ध स्थान में, शूद्र के संश्राव में, पैङ्ग के शब्द होने में, भय में, जानवरों के बोलने पर, वैधृत्य में, नगरों में न पढ़े ॥३७॥ ३८॥ ३९॥ जिस वस्त्र से मैथुन किया है उसको जल से प्रक्षालन किया और उसी को पहने हुआ हो, सोता हुआ, प्रौढ़ पैरों से गुरु के पास बैठकर न पढ़े ॥४०॥ वायु शीघ्र गति से बहती समय पढ़ना बन्द कर देवे और आधी रात्र के पश्चात् पढ़ना बन्द कर देवे ॥४१॥ पौष में यदि बादल लग जावे और अपर्तु हो तो न पढ़े ॥४२॥ वृष्टि, बिजुली, बादल इनसे विपद् ग्रस्त हो तो न पढ़े ॥४३॥ तीन रात, स्थान, आसन, ब्रह्मचर्य, रसरहित भोजन करके नियमित रहे ॥४४॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है। यह उसकी प्रायश्चित्ति है॥४५॥५॥१४१॥ यह एकसौ एकतालीसवी कण्डिका खतम हुई । यह अथर्ववेद के कौशिक सूत्र के ठा० उदयनारायण सिंह मधुरापुर, जिला मुजफ्फरपुर कृत भाषानुवाद का चौदहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥१४॥ और कौशिक सूत्र भी समाप्त हुआ ।

पुस्तक मिलने का पता-- ठाकुर उदयनारायण सिंह, शास्त्रप्रकाश भवन मु० मधुरापुर, पो० बिद्दूपुर बाजार जि० मुजफ्फरपुर ।

ॐ अथ ॐ पण्डित हारिलकेशवयोः संक्षिप्तटीका प्रकाश्यते । अथर्ववेदस्य संहिताविधेर्विवरणं क्रियते । तत्र अथर्ववेदस्य नव भेदा भवन्ति । तत्र चतसृषु शाखासु शौनकादिषु कौशिकोऽयं संहिताविधिः । स च गोपथब्राह्म- णादर्थवादादि परित्यज्य विधिमात्रं कल्पयित्वा विधेः कृतसूत्रयथोपयोगं टीका क्रियते संहिताविधेः । कण्डिका ॥ १ ॥ सू० १। —अथशब्द आनन्तर्यार्थः । संहिताप्ययनानन्तरं विधेरधिकारः । संहिताविधिं वक्ष्यामः । शान्तिकपौष्टिकाभिचारिकाद्भुतादीनि कर्माणि संहिताविधौ उक्तानि । त्रिविधानि कर्माणि विधिकर्माणि अविधिकर्माणि उच्छ्रयकर्माणि त्रिप्रमाणको विधिः प्रत्यक्षं अनुमानं शब्दं चेति । उपवर्षाचार्येणोक्तम् । मीमांसायां स्मृतिपादे कल्पसूत्राधिकरणे नक्षत्रकल्पो वितानकल्पस्तृतीयः संहितालल्पश्चतुर्थो अङ्गिरसां कल्पः शान्तिकल्पस्तु पञ्चमः । एते कल्पा वेदतुल्या हि इति भगवानुपवर्षा- चार्येण प्रतिपादितं अन्ये कल्पाः स्मृतितुल्याः । प्रागुदग्वा कर्मसमाप्तिर्दैवकर्मंसु दक्षिणा प्रत्यग्वा समाप्तिः पितृकर्मंसु केचित्प्रागुदगन्तराले समाप्तिः । —सू० १७ । यथा परिव्वाप्ने पुरं वयमिति त्रिः पर्य्यग्नि करोति । कौ० सू० २।१० । —सू० २६ । अग्निं पृष्ठतो नावसेत । —सू०२९।३० । सांख्यायनीये ब्राह्मणे उक्तं द्वे पौर्णमास्यौ द्वे अमावास्ये इति पौर्णमास्याः प्रतिपद्विति अमावास्यायां प्रतिपद्विति पूर्वा उपोष्या उत्तरा याज्या । कौ० । आ० ३।१ । —सू० ३१ । तिथिभेदे मुख्यपौर्णमासोभेदे या पूर्वा सा उपोष्या । उपवासं करोति । कण्डिका ॥ २ ॥ सायं प्रातर्होमवैश्वदेवपिण्डपितृयज्ञादि उद्धृतेऽग्नौ कार्याणि । सू०-१७ । ( केश- वोऽन्यदपि पठति ) ऊर्णास्रदं —सू० १८ । भूपत इति ब्रह्मवरणं तथा च गोभिल- ब्राह्मणम्—प्रत्यक्षं वा दर्भमयं वा आसनं वा उदककमण्डलुं वा ब्रह्मस्थापने वा कुर्यात् ।

२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रस्य- कण्डिका ॥ ३ ॥ सू० १। —युनज्मि त्वेत्येभिः पञ्चभिरिध्ममुपसमादधाति । द्वितीया कण्डिका। —सू० २। जागृमायनमुदपात्रं कांस्यपात्रमुपसाद्य । —सू० ४। जीवास्थेति सूक्तेन त्रिराचामति । सत्यं बृहदिति नवभिः शान्तिवेत्यृचा उदायुषेति द्वाभ्यामुत्तिष्ठति । (कौ० २४।३१) कण्डिका ॥ ४ ॥ सू० ९। —उदेनमुत्तरं नयति त्रिभिर्ऋग्भिः प्रजापते न त्वदिति (७।८०।३) चतस्रश्चर्वाहुतीर्जुहोति (कौ० ५।९) । त्वामग्न इत्यृचा (९।५९।१) चतस्र आज्या- हुतीर्जुहोति । कण्डिका ॥ ५ ॥ सू० १३। —स्वाहेष्टेभ्य इत्येवमादिभिरेकादशभिः सर्वप्रायश्चित्तीयाञ्जुहोति “यन्मे स्कन्नं पुनर्मैत्विन्द्रियमिति च द्वाभ्यामृग्भ्याम्”। कण्डिका ॥ ६ ॥ सू० १०।—केशवः पठति० निसितः। सू० १६। —अगन्म स्वरिति पर्याय- द्वयेन। सू० १७। —पत्न्याञ्जलौ। सू० २२। —तस्मान्नादक्षिणं हविःशब्देनाज्यतन्त्रं पाकतन्त्रं चोच्यते । कर्ममात्रमभिमन्त्रणाद्यदक्षिणं न कुर्यात् । पाकतन्त्रे पूर्णपात्रं माणकं सेतिका प्रस्थद्रोणाढकादि । पूर्णपात्रं यजमानशक्त्यपेक्षं “शक्त्या वा दक्षिणां दद्यान्नातिशक्तिर्विधीयते” इत्युक्तं नवमे । आज्यतन्त्रे धेनुः । सू० २६ । तथा च ब्राह्मणम् । सू० ३० । आज्यतन्त्रे पाकतन्त्रे दर्शपूर्णमासधर्मा भवन्ति पूर्वतन्त्रं च उत्तरतन्त्रं च सर्वेषु पाकतन्त्रेषु सर्वमाथर्वणं कर्म पाकयज्ञशब्देनोच्यते। सू० ३४।— अत्रापि गोपथब्राह्मणपठितौ श्लोकौ भवतः । सू० ३४ ।—केशवोऽपि पठति— देवतेति । सू० ३७। —त्वमग्ने व्रतपा असि तृचं सूक्तं कामस्तदग्र इति पञ्चर्चं सूक्तं एते चारणवैद्यानां पठ्यन्ते तस्मिन्नेव तन्त्रे आज्यं जुहोति शान्तसमिधो वा आदधाति सूक्तयोर्विकल्पः । दर्शपूर्णमासव्यतिक्रमे प्रायश्चित्तम् । सर्वत्र कर्मव्यतिक्रमे सर्व- प्रायश्चित्तीयान्होमाञ्जुहोति । तस्मिन्नेव तन्त्रे अन्यस्मिन्तन्त्रे वा तन्त्रमध्ये सर्वे होमा इति भद्रमतम् । अथ सर्वार्थाः परिभाषा विधिकर्मार्था अविधिकर्मार्था उच्छ्रय- कर्मार्था उच्यन्ते । मेधाजननादिपिण्डपितृयज्ञान्तं यावद्विधिकर्माणि । मधुपर्कादि इन्द्रमहान्तं यावदविधिकर्माणि । पाकयज्ञविधिकर्मंसूक्तेन विनियोगं कृत्वा पश्चादृचां विनियोगस्तान्युच्छ्रयकर्माणि । त्रिविधानि कर्माणि । उपदधातीत्यनादेशे आज्यं समित् पुरोडाशः पयः दध्योदनः पायसः व्रीहिः यवः तिलः धानाः करम्भः

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४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रस्य— यवतिलादीन्याभ्याधेयादीनि यजमानं धूमं भक्षयति । सू० २९ । —कर्मसमाप्तौ शुचिना कर्मप्रयोगः । नित्यनैमित्तिककाम्यानि कर्माणि स्नानं कृत्वा प्रयुञ्जीत । कण्डिका ॥ ८ ॥ सू० १ । —सर्वकर्मार्था परिभाषा । अथ निशाकर्मपरिभाषा उच्यन्ते । येषु निशाकर्मंसु तन्त्रं तेषु अयं धर्मः । केचित् स्नातोऽहतवसनः प्रयुङ्क्ते इति सर्वार्था परिभाषा मन्यन्ते । ——सू० २ । अथ स्वस्त्ययनपरिभाषा उच्यन्ते । स्वस्त्ययनेषु चेज्यानो दिश्यान् बलीन् हरति प्रतिदिशमुपतिष्ठते । येऽस्यां स्थेति सूक्तेन प्रतिदिशं प्रत्यृचं बलिहरणं करोति । प्राचीदिगिति । प्रतिदिशमुपतिष्ठते । यथा उत्तमेन सारूपवत्सस्य रुद्राय त्रिर्जुहोति । ( कौ० ५०।१४ ) तत्र हविरुच्छिष्टेन बलिहरणं कुर्यात् । समाप्ता स्वस्त्ययनपरिभाषा । सू० ५ । —पुनः सर्वार्थाः परिभाषा उच्यन्ते । सर्वत्राधिकरणं कर्तुर्दक्षिणा । हविरुच्छिष्टं आज्यधानी उदपात्रं चर्ममण्डपदर्भसमिधः शान्त्युदकभाजनं स्रुक्स्रुवादीनि देयानि । नित्येषु नाधिकरणमस्ति परद्रव्येषु नाधि- करणमस्ति यथा नापितस्य क्षुरम् । ( कौ० ५५ । ) सू० ६ । —प्रोक्षणाचमनपर्यु- क्षणादि त्रिः कर्त्तव्यम् । सू० ८ । सर्वत्र शान्तिकेषु शान्तं संभारं दर्भसमिधादि । अभिचारे रौद्रं आङ्गिरसं संभारं (कौ० ४७।२।) सू० ९ । --स्रुक्स्रुवसमिधः काष्ठादि मणिद्रव्यकाष्ठाः कर्तव्यानि । प्रतीकं च द्रव्यञ्च । यथा कथं मह इति मादानक- शृतं क्षीरौदनमश्नाति । चमसे सरूपवत्सायाः दुग्धे ( कौ० १२।१।२ । ) चमसोऽपि मादानक एव । कथं मह इति उत्तरमपि अनेन सूक्तेन कर्म कुर्यात् । सू० १० विषये यथान्तरम् । मन्त्रद्रव्यसंशये संनिधानं गृहीतव्यं यथा लोमानि हस्तिरोमाणि यथा विद्मा शरस्येति प्रमेहाणं बध्नाति ( कौ० २५।१० ) सू० १२ । उलूखलमुसल- काष्ठम् । अन्यार्थं इन्धनार्थं काष्ठतक्षणं करोति । सू० १५ । —अथ शान्तवृक्षा उच्यन्ते । स्रग्मालवके प्रसिद्धः । बंधः कान्यकुब्जे प्रसिद्धः । शिरीषो भोजपुरे वाटिकायां प्रसिद्धः । शम्यस्तिलकः प्रसिद्धः । वरणो वरुणकः इति आनन्दपुरे प्रसिद्धः । जङ्गिडो वारा- णस्यां प्रसिद्धः । कुडको मालवके । गङ्गो हिमवति । गलावल्लस्तत्रैव प्रसिद्धः । स्यन्दनः हिमवति नर्मदायां प्रसिद्धः । अरणिका नर्मदातटे प्रसिद्धः । अश्मयोक्त अश्मन्तको भृगुकच्छे प्रसिद्धः । तुन्युस्तैन्दुका । पूतदारुर्देवदारुर्वैद्यके प्रसिद्धः । समाप्ताः शान्त- वृक्षाः । सू० १६ । अथ शान्त्यौषधय उच्यन्ते । चित्तिः प्रसिद्धा प्रायश्चित्तिः पर्वणि पर्वणि तस्याः त्रीणि त्रीणि पात्राणि भवन्ति । शमकानन्दपुरे विश्वामित्रो- वाप्याः समीपेऽस्ति । सवंशाघर्मोलिका साम्यवाका काकजंघासदृशा तलाशा वेतसी । वात्सक आटरूषकः ( कौ० ३९।६ ) सीसपात्रं ( शीशम ) प्रसिद्धम् । शाल्मलिः प्रसिद्धः सिपुत्रांकरी । आकृतिकोटः क्षेत्रमृत्तिका वल्मीकमृत्तिका । एताः सर्वाः

संक्षिप्तटीकासङ्ग्रहः । ५

शान्ता ओषधयः शान्त्युदकादौ प्रयोक्तव्याः एतासां समुच्चयः । एतासामलाभे यव- प्रतिनिधिः कार्यः इति पैठीनसिः । शान्त्यौषधिकल्पः समाप्तः । सू० १७ । प्रमन्दोशीरशलल्युपधानं शकधूमा जरन्तः । उपधानं विद्यागन्धुकं शकधूमः ब्राह्मणः एता जरन्तः जीर्णा ग्राह्याः । सू० १८ । — यत्र सीसानि तत्र एतानि सर्वाणि प्रत्येत्त- ब्यानि । नदीसीसं नदीफेनम् । सू० १९ । — रसकर्मणि एते रसाः प्रत्येत्तव्याः समु- च्चयेन । — सू० २० यवाकस्ति इन्द्रयव । प्रियङ्गुः कंगुणिका । सू० २१ । — ग्रहणं प्रतीकग्रहणं ग्रहणमनुग्रहणं तावदनुवर्तते यावत्प्रतीकग्रहणं द्वितीयम् । सू० २२ । — अनुषङ्गः यथार्थं सर्वत्र कर्तव्यः । यथा विद्मा शरस्य पितरं पर्जन्यं शत- वृष्ण्यमिति ( कौ० २५।१० ) वैदिकं लौकिकमिति भवति कृतयामं कंकतमव- सृजामीति ( कौ० ७६।५।६ ) अनुषङ्गः पुनरुक्तमित्यर्थः । सू० २४ । — अथ चतुर्गणो महाशान्त्याः पठ्यन्ते । सू० २५ । — अरायक्षयणमिति तिस्रः । १८।३।५

कण्डिका ॥ ६ ॥

सू० १ — ये अग्नय इति सप्त ब्रह्मयज्ञानमित्येका । अग्नेर्मन्व इति सप्त सूगार सूक्तानि ग्रहीतव्यानि ॥ सू० २ । — प्रथमे द्वे उत्तमं वर्जयित्वा शं च नो मयश्च न इत्येका पुनर्मैत्विन्द्रियमित्येका शिवान इत्येका शं नो वातो वातु इत्येका शेषाणि सूक्तानि । अनेन शान्तिगणेन शान्त्युदकं कुर्यात् । सू० ३ । — यत्र शान्त्युदकं क्रियते तत्र पृथिव्यै श्रोत्रायेति त्रिभिऋग्भिः शान्त्युदकं शान्त्युदकमध्ये प्रक्षिपेत् । अनेनैव कारयिता प्रोक्षणाचमनादीनि प्रत्यृचं करोति । सू० ४ । — एष शान्ता- तीयो गणः । यत्र शान्तातीयेन प्रयोजनं तत्रायं सर्वत्र प्रयोक्तव्य इति । यथा शान्ता- तीयेन तिलाञ्जुहोति । — सू० ६ । शान्तिसूक्तानि । इह शान्त्युदके सर्वेषां सूक्तानां समुच्चयः । अन्यत्र सर्वत्र यथोक्तेन न्यायेन विकल्पः न सूक्तविकल्पः । सू० ७ । — उभयतः शान्तिगणस्य प्रारम्भे समाप्तौ च । सू० ८ । — अथ शान्त्युदकविधान- मुच्यते । सू० ९ । — अवकरं विसर्जयति । अनुज्ञातः शान्त्युदकं करोति शं नो देवीत्यृचा सावित्री च अम्बयो यन्ति गणेन च शान्त्युदकं करोति लघुगणेन बृहद्गणेन वा चतुर्गणैर्वा । सावित्री शन्नो देवी । ततः पृथिव्यै श्रोत्रायेति त्रिः प्रत्यासिञ्चति शान्त्यु- दके शान्त्युदकं प्रक्षिपति । सू० १० । — एते चतुर्गणेन बृहद्गणेनैकेन वा शान्त्यु- दकं कुर्वन्ति । शान्त्युदककर्मपरिभाषा समाप्ता । नवमी कण्डिका । तत्र भद्रश्लोकः ।

प्रमाणं पार्वणे चैव प्रकृतित्वात्परीक्षिते । परिभाषा च सर्वार्था प्रथमेऽध्याये संहिताविधौ ॥

इति प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

सू० २ । —सारिका जिह्वां बध्नाति । सारिका कंटारिका प्रसिद्धा । —सू० ३ । –कृशो भारद्वाजः ॥ सू० ४ । —कर्कन्धूः बृहद्वदरी । सू० ६ । —ये त्रि षप्ता० इति सूक्तेन क्षीरौदनं संपात्याभिमन्त्र्यभक्षयति । पुरोडाशं भक्षयति । रसान् भक्ष- यति । रसप्राशनं सर्वत्र त्वे क्रतुमित्यृचा कर्त्तव्यम् । (कौ० २।१२१) सू० ७ ।— ये त्रि षप्ता इति सूक्तेन उपनयनानन्तरं द्वादशरात्रम् । बहुभैक्ष्यमेकत्र कृत्वाभि- मन्त्र्य उपाध्यायो ददाति । सू० ८ ।— सुप्तस्योपाध्यायस्य कर्णमनुमन्त्रयते ब्रह्म- चारी । सू० ९ ।— यदा यदा उपाध्यायगृहं याति तदा तदा जपति ब्रह्मचारी ॥ सू० १५ ।— उपाध्यायाय । सू० १६ ।— शुक्लपुष्पहरितपुष्पे इति शंख- पुष्पिका अन्धपुष्पिका प्रसिद्धे । सू० १७ ।— सम्यक् वर्चस्कामो मेधाकामश्च

( कौ०-४-६; ११, १२,— १८ ) सू० ५ ।- सांमनस्याधिकार आवर्चस्येभ्यः कर्मभ्यो यावत् । जातपुत्रस्य सांमनस्यं क्रियते । यावज्जीवं संजातानां सगोत्राणां सांमनस्यं भवति । सू० ६ ।— उदकुम्भं सम्पातवन्तं कृत्वा ग्रामपार्श्वे आमयित्वा । सू० ८ । — शुक्त्यानि । अम्लेन रसेन सिक्तानि मांसानि ॥ सू० ९ ।— सह- दयमिति भक्तं सम्पात्याभिमन्त्र्याशयति । सुरां प्रयच्छति पुरुषेभ्यः त्रैवर्णिकेभ्यः प्रपोदकं प्रयच्छति । सांमनस्यानि समाप्तानि । सू० १० ।— अथ वर्चस्यविधिं वक्ष्यामः । ये त्रिषप्ता इति सूक्तेन औदुम्बरसमिध आदधाति । सर्वत्र वर्च- स्कामोऽनुवर्तते अराजकर्मभ्यो यावत् । ( कौ० १४।१ ) सू० १२ । अथ कुमारी- वर्चस्यमुच्यते । कुमारी रूपवती वर्चस्विनी भर्तृगृहे प्रधाना भवति । सू० १६ ।- वैश्यशूद्रानुलोमजाः ।

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१।—शत्रोहंस्तित्रासनानां कर्मणां विधिं वक्ष्यामः । सू० २ ।— तं हस्तिनं संप्रति मुखं रथमावर्तयति । सू० ६ ।— ये त्रिषप्ता इति सूक्तेन वेलुकामभिमन्त्र्य यत्र हस्तिनस्तत्राभिमुखो याति । समाप्तानि हस्तित्रासनानि । सू० ७ ।— जयकर्मा- ण्यनुवर्तन्ते । आराष्ट्रप्रवेशकर्मभ्यो यावत् । सू० ८ ।— इध्मसमाधानस्थाने धनुरिध्म आदधाति । धनुस्समिध आदधाति । सू० ९ ।— शरेध्मोपसमाधानं शरसमिधः प्रादेशमात्रीरादधाति । सू० ११ ।— विजयकर्माणि सांग्रामिकाणि समाप्तानि । संग्रामे अयुध्यमाने जयो भवति । एभिः कर्मभिः दृष्टमात्रतः शत्रवः पलायन्ते । सू० १२ ।— इषुनिवारणानि कर्माण्युच्यन्ते । अनेन कर्मणा पुरुष- शरीरे इषवो न पतन्ति पार्श्वतो गच्छन्ति । सू० १४ ।— सर्वशस्त्रनिवारणानां कर्मणां विधिं वक्ष्यामः । सू० १५ ।— जुहोति सेनाग्नौ । सू० १६ ।— आरेऽसा- विति सूक्तेन शत्रुं दृष्ट्वा जपति । सू० १७ ।— अथ मोहनकर्मणां विधिं वक्ष्यामः । परसेनामोहनानि । सू० १८ ।— ओदनेन फलीकरणं पिण्डीकृत्य । सू० १९ ।— ओदनेन सह कण्डिकां पिण्डीकृत्य । सू० २० ।— शर्कराशूर्पे कृत्वा निष्पुनाति । सू० २१ ।— अप्वा देवता चरुतन्त्रं आज्यभागान्तं कृत्वाग्निनंः शत्रूनग्निनोंदूत इति सूक्ताभ्यां (सू० १७) चरुं जुहुयात् । निर्वापे प्रोक्षणे बर्हिर्होमे विशेषः । अप्वा यै स्वा जुष्टं निर्वपामि । अप्वायै त्वा जुष्टं प्रोक्षामि । अप्वां गच्छतु हविः । सू० २२।२३ ।— उद्वेगकरकर्म उच्यते । अजां सितपदां शत्रुसेनां प्रति विसर्ज- यति । श्वेतेन पादेन अजा वा अविर्वा एणी वा । इत्युद्वेगकरं समाप्तम् । समाप्तानि परस्परोद्वेगकरणानि मोहनस्तम्भनमित्यर्थः । सू० २४ ।— पुनर्जयकर्मोच्यते । सू० २५ ।— स्वसेनारक्षार्थं कर्मोच्यते । स्वसेनां प्रति दिशमुपतिष्ठते । २६ ।— अथ स्वसेनाया उत्साहकरणं वक्ष्यामः । सू० २७ ।— सेनयोर्मध्ये स्थितो जपति निरीक्षमाणः । सू० २८ ।— परसेनायां प्रक्षिपति । उच्छूंसकः क्रुद्धः । सू० ३० ।— अथ जयपराजयविज्ञानमुच्यते । शरतृणानि । आङ्गिरसेनादीपयति । आङ्गिर- सोऽग्निः चाण्डालाग्निः सूतिकाग्निः । सू० ३१ ।— सेनयोर्मध्ये कृत्वा यान् धूमो- वतनोति ते जयन्ति यत्र धूमो गच्छति तत्र न जयः । कण्डिका ॥ १५ ॥ सू० १ ।— अथ सांग्रामिकं विधिं वक्ष्यामः । जयकर्माण्युच्यन्ते । सूक्ताभ्यामा- श्रुत्यां पात्र्यां त्रिवृत्तिगोमये परिचयेऽग्निं प्रज्वाल्य हस्तिपृष्ठे शत्रुमभिमुखो गच्छन्नाज्यं जुहोति । पुरुषशिरसि ००० तत्पात्रं प्रक्षिपति भूम्यां । सू० ४ ।— युद्धे मृतस्य पुरु- षस्येध्ममुपसमाधाय उपरि चक्रं धारयित्वा दीर्घदण्डेन स्रुवेण । सू० ५ ।— युद्धं योजयेत् । सू० ७ ।— वैश्याय संग्रामविधिं वक्ष्यामः । सू० ८ ।— सेनापतिजयकर्म०००

संक्षिप्तटीकासङ्ग्रहः । ९ दण्डनायकजयकर्म । स्वसेनाजयपराजयपुरुषवधशङ्कायां विज्ञानमुच्यते । उद- पात्रमभिमन्त्रयते ततो द्वौ द्वौ योद्धारौ अवेक्षयेद् राजा । सू० १०॥ - यं न पश्येत् तं न युध्येत योधयेत् । सू० ११॥ - अथ नवरथे घटिते संस्कार उच्यते । सू० १२॥ - अथारोग्यविधानमुच्यते । ब्रह्मयज्ञान मन्त्रांसेति । सू० १५॥ - अथ सांग्रा- मिकविधानमुच्यते । एका आत्मसेना रज्जुर्द्वितीया मध्ये मृत्युः तृतीया रज्जुः पर- सेना । एवं संकल्पः । तत अङ्गारेषु निघाय इष्यते यस्य उपरि मृत्युर्गच्छति तस्य सेनाया जयो भवति ॥ सू० १८॥ - आरोग्यविज्ञानकर्म । जयविजयपराजयविज्ञान- कर्म । एकरज्जुमुख्यमध्यमधरविज्ञानकर्म । एतानि त्रीणि कर्माणि भवन्ति । इषीका शरमया वा वीरिणमया वा कर्तव्या । कण्डिका ॥ १६ ॥ सू० १॥ - अथ त्रासनं परसेनाविद्वेषणमुच्यते । सू० ३॥ - सोमाङ्कुरमणिं बध्नाति । सू० ४॥-राजा त्रिः कण्टकं आमयति । सू० ६॥-जयकाम इदं कर्म कुर्यात् । जयकर्माणि अनुवर्तन्ते अस्मिन्वस्विति राष्ट्रावगमनं यावत् । (सू० २७) सू० ७॥- अभयकर्म उच्यते । सू० ८॥ - अभयं द्यावापृथिवी इति सूक्तेन - सप्तऋषीन्यजते प्रतिदिशं सेनायाः । प्रतिदिशं सेनाया उपतिष्ठते वा । श्येनोऽसि गायत्रेति सूक्तेन । सप्तऋषीन्यजते उपतिष्ठते वा सेनायाः प्रतिदिशम् । सू० ९ ॥-उक्तमग्निमन्थनमादौ इन्द्रो मन्थत्वित्यादि । अग्निं मन्यति । सू० १४ ॥ - अथ सपत्नक्षयणी कर्म उच्यते । अरण्ये न ग्राममध्ये कुर्यात् । (वधकः) कृमिमालकः । तिर्णिंसमिधः । सू० १६ ॥ --भाङ्गानि ज्वालानि । सेनाक्रमेषु वपति । सू० १७ ॥--सेनाक्रमेषु वपति । सू० १८॥-स्वाहैम्य इत्यमित्रेभ्यः । सू० २१॥--आवासानि जयकर्माण्युच्यन्ते । ये बाहव इत्यनुवाकं युद्धकाले जपति कर्ता । सू० २३ ॥--सर्वत्र पाशेषु अश्वत्थेषु कूटेषु भाङ्गेषु जालेषु वाधकदण्डेषु वज्ररूपेषु पात्रेषु चेङ्गिडालङ्करणे क्रुद्धानुमन्त्रणं कुर्यात् । सू० २४ ॥ - त्रिषन्ध्वीनि लोहमयानि ˙˙˙ वज्ररूपाणि लोहमयानि अर्बुदि- रूपाणि पृषदाज्येन संपात्याभिमन्त्र्य निवपति ˙˙˙ सू० २५॥-ये बाहव इत्यनुवाकेन शितिपदं आज्यं पृषदाज्येन सम्पात्याभिमन्त्र्य राज्ञो ( राज्ञा राजा वा ) दण्डे बध्नाति । सू० २६॥--द्वितीया शितिपदीं ˙˙˙ शत्रुसेनां प्रति क्षिपति । शितिपद्योर्द्वयोर- रण्ये कर्म । सू० २७॥-अथावश्यकं राष्ट्रप्रवेशककर्मविधिं वक्ष्यामः । स्वराष्ट्रे यो निष्क्रान्तः शत्रुversion: निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> निष्क्रान्तः शत्रुversion -> 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कण्डिका ॥ १७ ॥ सू० १ ।—अथ लघु अभिषेककर्मोच्यते । माण्डलिकस्य सामन्तस्य युवराजस्य सेनापतेरन्यस्य कस्यचिदभिषेकः । शान्त्युदकं करोति महानद्या उदकेन च पुष्कराणामुदकं देववृष्ट्युदकं दिव्यमुदकं च । उदकानां विकल्पः समुच्चयो वा । सू० २ ॥—दक्षिणतो वेद्याः ॥ सू० ३ ॥—खट्वायामार्षभे चर्म आस्तीर्य तत्र राजानमा- रोहयति । सू० ४।—उदपात्रमुभावव्यासिञ्चति । सू० ६ ।—राजा ब्रूते । सू० ७ ।— ब्रह्मा ब्रूयात् ।···सू० १० ।—अभिषेकादनन्तरं घृतावेक्षणमारार्त्रिकं राजकर्माणि पितृशक्त्यादीनि कर्माणि प्रत्यहं कर्तव्यानि ॥ सू० ११ ।—महाभिषेकविधिं वक्ष्यामः स सार्वभौमस्य भवति ॥ सू० १६ ।—राजकीयो महाशूद्रः । प्रक्षालनं ददाति । सू० १७ ।—राजा द्यूतक्रीडां करोति ॥ सू० १८ ।—वैश्यः राजानमुपतिष्ठते [

प्रक्षिपति । सू० १८ ।—एकशतं लक्षम इत्यृचा रक्तवस्त्रं लोहखण्डेन सहाप्सु क्षिपति । एता एना इत्यृचा नीलं वासो लोहखण्डेन सहाप्सु क्षिपति । गृहे आग- च्छति । ततः कर्माणि कुर्यात् पौष्टिकानि साम्पदानि च । समाप्तानि निर्ऋतिकर्माणि । सू० १९ ।--पूर्वस्य चित्राकर्मादीनि पौष्टिकानि तान्युच्यन्ते आ भेषज्येभ्यः कर्मभ्यो यावत् । (कौ० २५) । एतत्कर्म चैत्र्यां पौर्णमास्यां कुर्यात् । अथवा चित्रानक्षत्रे कुर्यात् । नित्यं चैत्रीकर्म । सू० २२ ।—परशुवन्मुखेनाश्नाति न हस्तेन । सू० २६ ।—मन्थान्तानि कर्माणि । सू० २७ ।—अध्वानं गच्छता पुष्टिकर्माण्युच्यन्ते । सू० २८-२९ ।--यदा गच्छति तदा एतत्कर्म । यदा ग्रामं गच्छति तदा एतत्कर्म कुर्यात् । समाप्तं प्रस्थानकर्म । सू० ३०-३१ ।--यथार्थं याचते

१२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रस्य- समाप्ता मणिबन्धनशान्तिः। सू० २८।—अथ अष्टकाकर्म पुष्टिकामो वा नित्यं वा... कुर्यात्। माघाष्टकायां पूर्वाण्हे यज्ञोपवीती शालानिवेशनं समूहयति॥ उपवत्स्य- द्भक्तमशित्वा स्नातोऽहतवसनः प्रयुङ्क्ते रात्रौ वशातन्त्रं पाकयज्ञविधानं धानादीनां श्रपणं कृत्वा। तत आज्यभागान्तं कृत्वा ततः पुरस्तादग्नेः प्रतीचीं गां धारयन्ति। पश्चादग्नेः प्राङ्मुख उपविश्य अन्वारब्धाय शान्त्युदकं करोति। प्रथमा ह न्युवास सेति सर्वेण तिस्रः पश्चादाहुतीर्जुहोति। सू० २९।—ततः प्रथमा ह न्युवास सेति सूक्तेन सर्वेण स्थालीपाकं जुहोति। कण्डिका ॥ २० ॥ सू० १।—कृषिनिष्पत्तिकर्म वक्ष्यामः। क्षेत्रे गत्वा। सू० ४।—कालिको अन्यांश्चतुरो वृषभान्युक्ति षड्गवं हलमिति वचनात्। सू० ५।—लोहफालमभि- मन्त्र्य हले प्रतिकर्षति। सू० ७।—अपूपानभिमन्त्र्य हले फालमुखे ददाति। ततः कर्ता हलेन कृषति। सू० ८।—कालिकाय। सू० ९।—तिस्रः सीताः प्राचीर्कालिकः कृषति। सू० १४-१५।—उदपात्रे निदधाति। तेनोदकेन हलं सर्वमनक्ति। सू०-१६-१९।— यत्र सीता सम्पातिता तस्मात्स्थलात् मृत्तिकां पत्नी गृह्णाति हस्तेन। अतोऽन्यो मनुष्यः पृच्छति किमाहार्षीः?। ततः पत्नी ब्रूते वित्तं भूतमिति। सू० २०।— मृत्तिकां निदधाति पत्नी। सू० २१।—ततो लोहफालं घृतेनाभ्यज्य तत्रैव क्षेत्रे निदधाति। सू० २२।—सीताशिरः सूत्रेषु। सू० २३।— एकैकस्याः सीताया दक्षिणे चमसे रसान् प्रक्षिप्य मध्यमेषु विरूढं निदधाति पुरोडाशमुत्तरेषु निदधाति। सू० २४।— चमसोपरि दर्भाग्रान्निदधाति ततः चमसान् पांसुना प्रच्छादयति मृत्तिकां ददाति तत्र। ततः प्रभाते अवश्यं तस्मिन् क्षेत्रे द्वितीयेऽहनि कर्षितव्यम्। एतत्सर्वं एकं कर्म। कृषिभ्यः निष्पत्तिकर्म समाप्तम्। सू० २४।—अथ वृषभ- लाभकर्म उच्यते। सू० २५।—आनडुहसांपदकर्म समाप्तम्। कण्डिका ॥ २१ ॥ सू० १।—अथ स्फातिकरणकर्म उच्यते। सू० ५-६।—यदा यदा भक्तं राध्यते तदा तदा अभिमन्त्रयते। यदा दीयते कण्डेन। ...निष्पवने रन्धने परीक्षणे दाने च सर्वत्राभिमन्त्रणम्। सू० ७।—स्थिरधान्यमक्षयं भवति। समाप्तानि स्फाति- करणानि पुष्टिकर्माण्येव वर्तन्ते। सू० ८।—सन्ध्याकाले॥ सू० ९॥—यदा प्रथमं होममिच्छति तदा इदं कर्म करोति। सू० ११।—सूर्यस्य रश्मीनन्विति तिसृभिर्द्वादश नाम्न्यां बध्नाति। इह वत्सां निबध्नीम इति पादेन वत्सां बध्नाति। अयं घासं इति पादेन घासं ददाति गोभ्यो वा वत्सेभ्यश्च। समाप्ता गोशान्तिः। सू० १२।—वत्स- साम्पदानि कर्माण्युच्यन्ते। सू० १३।—सूत्रेण परिवेष्ट्य घृतेनाक्ता आदधाति।

संक्षिप्तटीकासङ्ग्रहः । १३ सू० १४ ।—इषीकाः तिस्रो मधुना चिक्सेन प्रलिप्ता आदधाति । सू० १५-१६ ।— ज्येष्ठेन पुत्रेण सह भागविधि वक्ष्यामः । उत पुत्र इत्यृचा गृहकाष्ठकाद्या अभिमन्त्र्य ततो गृहं कारयेत् पुष्टिकामः पुत्रो वा साम्पदं करोति पिता वा करोति । सू० १७ ।—आर्द्रपाणिर्भूत्वा शान्तशाखया ऋचं जपित्वा पुत्रं पिता पुत्रभागं प्रयच्छति । सू० १८-१९ । प्राग्भागमपाकॄत्य पुत्रस्य गृहे गोधनं बध्नाति । अग्निसंमुखं कुरुते । पुत्रस्य भागं क्रियते । सू० २० ।—आग्नेया अमावास्या भवि- ष्यति तस्यां पुत्राश्च भ्रातरोऽपि अनेन विधानेन भागं कुर्वन्ति । समाप्तं विभागकर्म । सू० २१।२३ ।—त्वे क्रतुमित्यृचा सर्वत्र रसप्राशनं परिभाषा सर्वस्मिन्नथर्ववेदे रस- कर्मसु पाक्यज्ञविधानेन प्रजापतये चरुं श्रपयित्वा । स्तुष्व वर्मन्निति ऋचा जुहोति पुष्टिकामः । अमावास्यायामस्तमिते रात्रौ वल्मीके दर्भानास्तीर्य तत्र दीपं ददाति । कण्डिका ॥ २२ ॥ सू० १ ।—पुनः पुष्टिकर्माण्युच्यन्ते । अष्टपिष्टं सक्तुम् । सू० ६ ।—क्षेत्रकामस्य कर्म उच्यते । यत्र क्षेत्रं कामयते तस्मिन् क्षेत्रे इदं कर्म कुर्यात् । सू० ७ ।—सप्त ग्रामलाभकर्म । सू० १० ।—अथ समृद्धिकर्म उच्यते । सू० १० ।—उदक्याम् । सू० १४ ।—अथ समुद्रकर्म उच्यते । शत्रुदेशे गत्वा गार्हपत्यदक्षिणाग्न्याहवनीयेषु कर्म कुर्यात् । ततो गार्हपत्ये अभ्यातानान्तं कृत्वा ममाग्ने वर्च इति सारूपवत्सं गार्हपत्यश्रुतं गार्हपत्ये प्रथमं संपात्य ततो दक्षिणाग्नितन्त्रं कृत्वा पूतीकैस्तरणम् । तत अभ्यातानान्तं कृत्वा तमेव सारूपवत्सं सम्पात्य तत आहवनीयभागस्तरणम् । ततस्तमेव सारूपवत्सं संपात्यानेनैव सूक्तेन ततः पश्चात्सकृदभिमन्त्रणं कृत्वा ततोऽ- श्नाति । गार्हपत्यप्रभृति उत्तरतन्त्रं कुर्यात् । अशनं गार्हपत्यदेशे करोति । उत्तर- तन्त्रम् । व्रतग्रहणादि करोति । दक्षिणाग्न्याहवनीयगार्हपत्येषु यथाक्रमं व्रतग्रहणादि । गार्हपत्यस्य दर्भैस्तरणं दक्षिणाग्नेः पूतिकैः । आहवनीयस्य भङ्गाभिः । समाप्तं समुद्रकर्म । कण्डिका ॥ २३ ॥ सू० १ ।—अथ नवे गृहे अग्निशालायां गोशालायां वा ग्रामे वा पुरे वा अन्य- श्रामित्तेषु वा कर्माणि । पाषाणमये वा काष्ठमये वा तृणमये वा इष्टकामये वा सर्वत्र नवे वासिते इदं कर्म । सू० ६ ।—तूष्णीमादौ वाग्यमनं कृतमिहैव स्तेति वाग्विसर्गः । सू० ७ ।—अग्नौ रविकां औदुम्बरं दत्वा आज्यं जुहोति । धूमं निय- च्छति । लेपं प्राश्नीयात् । सू० ९ ।—दायादेषु विभागकर्म वक्ष्यामः । सू० १२ ।— अथ चित्राकर्म चित्रानक्षत्रे उच्यते । संभारान् संपातयति । वृक्षशाखा । उदकम् । करम्बकम् । औदुम्बरशकलम् । ताम्रछुरिका । सू० १४ ।—वत्सकर्णं छिनत्ति ।

१४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रस्य— सू० १५।—कर्णलोहितम् । रसमिश्रितः अश्नापयति पुष्टिकामः । सू० १७।— अथ कृषिकर्म उच्यते । कण्डिका ॥ २४ ॥ सू० १-२।—बीजवापनं कर्म करोति । केदारे वा क्षेत्रे निवपति । त्रीन् मुष्टिबीजस्य । ततः पांसुभिराच्छादयति । सू० ३-६ ।—उच्चस्थाने गत्वा । ततः अभ्यातानान्तं कृत्वामित्यमिति चतुऋर्चेन सूक्तेनोदपात्रं सम्पात्य तदुदपात्रं सोमरसमिश्रं सारूपवत्सं ओदनं सम्पात्याभिमन्त्र्याश्नाति । तत उत्तरतन्त्रं प्राग्द्वारप्रत्यग्द्वारे मण्डपे एतत्कर्म । पश्चान्मण्डपमग्निना दहति । सू० ७।— एकवारप्रसूता गौर्गृष्टिः । गोदाममणिं बध्नाति पुष्ट्यर्थी । सू० ८।——अश्नाति पुष्ट्यर्थी । सू० ९।—इत्यृचा वपया वृषभस्येदं यजते वशाविधानेन (कौ० ४४) सू० १६।—अथ प्रवत्स्यत एकाग्निकस्य इदं कर्म कथ्यते । इहैव स्तेति गृहं मानुष्यांश्चावेक्षते । सू० १८ ।—अथ प्रवेशाय यजमानो यदा आगच्छति तदा इदं कर्मोच्यते । मौनं कृत्वा समिधमादाय गृहं दृष्ट्वा ऊर्जं बिभ्रदिति षडर्चं सूक्तं जपति । वामेन हस्तेन समिधः कृत्वा दक्षिणेन शालावलोकं संस्तभ्य जपति ऊर्जं बिभ्रदिति । ततः समिध आदधाति अग्नौ । सुमङ्गलीति कल्पजेन स्थूणे गृह्णात्युप- तिष्ठते । यद्बदामीत्यृचा वाग्विसर्गं करोति । गृहपत्न्यासाद् उपविश्योदपात्रं निनयति तूष्णीं दूर्वाग्राणि अञ्जुलिकायां कृत्वा पूर्वापरमिति षडर्चं सूक्तं जपति । अमावास्यायां केचिच्चन्द्रमसं दृष्ट्वा जपं कुर्वन्ति पुष्टिकामाः । सू० १९। —अथ वृषोत्सर्गविधि वक्ष्यामः । ऋषभं सम्पात्य विवाहवदग्निपरिणयनं कृत्वा सह वत्सरीभिः विसर्ज- यति । सू० २२।—अत एकादशाहे वृषभं करोति तदा शान्त्युदकं कृत्वा वृषोत्सर्गं करोति । वृषोत्सर्गः समाप्तः । वृषभपुच्छं गृहीत्वा देवपितृभिभ्योऽहं ददे ऋषभमुच्चारयति । सू० २४-२५।—अथाग्रहायणीकर्म उच्यते । रात्रौ अभ्या- तानान्तं कृत्वा त्रयश्चरवः श्रपयितव्याः । सत्यं बृहदित्यनुवाकेन पश्चादग्नेर्दर्भेषु खदायां भूमौ एकं चरुं सकृत् सर्वहुतं जुहोति । सू० ३१।—सत्यं बृहदिति नवभिः शान्ति द्वेति दशम्या । सू० ३६ ।—सत्यं बृहदित्यनुवाकेन कृषिकर्म आयोजनकर्म भवति । सू० ३७।—यस्यां सदो हविर्धाने इति तिसृभिराज्यं जुहोति । तत उत्तरतन्त्रम् । वरो म आगमिष्यतीति वरस्य प्रार्थितोऽभिलाषः उत्कृष्ट- पुत्रधनादि वा सर्वफलकामः । सू० ३८ ।—उपतिष्ठते पृथिवीं पुष्टिकामः । सू० ३९ । निधिं बिभ्रती