भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

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२६२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । रात्रो विधीयते ॥ आचार्ये दशरात्रं स्याह्सर्वेषु च स्व- योनिषु ॥२७॥ सूतके त्वेको नाधीयीत त्रिरात्रमुपाध्यायं वर्जयेत् ॥२८॥ आचार्यपुत्रभार्याश्च ॥२९॥ अथ शिष्यं सहाध्यायिनमप्रधानगुरुं चोपसन्नमहोरात्रं वर्जयेत्॥३०॥ तथा सब्रह्मचारिणं राजानं च ॥३१॥ अपर्तुदैवमाकालम् ॥३२॥ अविशेषर्तुकालेन सर्वे निर्घातादयः स्मृताः । यच्चान्यद्दैवमद्भुतं सर्वं निर्घातवद् भवेत् ॥३३॥ ऋतावध्या- यश्छान्दसः कल्प्य आपर्तुकः स्मृतः ॥ ऋतावूर्ध्वं प्रात- राशाद्यस्तु कश्चिदनध्यायः । सन्ध्यां प्राप्नोति पश्चिमाम् ॥३४॥ सर्वेण प्रदोषो लुप्यते ॥३५॥ निशि निगदायां च विचुति शिष्टं नाधीयीत ॥३६॥ अस्तमिते द्विसत्तायां त्रिसत्तायां च पाटवः । अथ तावत्कालं भुक्त्वा प्रदोष जन्म और मरण में दश रात्रि अशौच होता है, आचार्य के मरण में भी दश रात अशौच होता है, सब ही सगोत्री को अशौच होता है ॥२७॥ तक में एकही न पढ़े, तीन रात उपाध्याय के पास जाना बन्द कर देवे ॥२८॥ आचार्य, पुत्र, उनकी भार्या, इनके पास न जावे तीन रात तक ॥२९॥ अब शिष्य जो साथ पढ़ता है, और अप्रधान गुरु, जो पास रहते है उनके पास एक दिन रात न जावे ॥३०॥ उसी प्रकार साथ के ब्रह्मचारी और राजा के पास भी एक दिन रात न जावे ॥३१॥ अपर्तु- दैव अर्थात् ऋतु अस्वाभाविक हो एवं दैवी उपद्रव हो तो जब तक अच्छा समय न हो तब तक न पढ़े ॥३२॥ अविशेष ऋतुकाल में सबही को वज्रपात की भांति अपसमय जानना ॥ और भी जितने अद्भुत हैं सबही वज्रपात की भांति हैं ॥३३॥ ऋतु में छन्दों का पढ़ना भौर कल्प पढ़ना अपर्तु में। ऋतु के पश्चात् प्रातराश( तक जो कोई अनध्याय है । सायंकाल होने पर ( सायंकाल ) ॥३४॥ सबही के मत से प्रदोष काल ( रात्रि का आरम्भ ) दूषित है ॥ ३५॥ रात्रि में निगदा ( निःशब्द होने में ) काल में, बिजुली कड़कने में न पढ़े ॥३६॥ अस्तमित काल में, दो या तीन सन्धिकाल में न पढ़े ॥ प्रदोष, दोनों सन्ध्या, जल में,