कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २६३ उभे सन्ध्ये ॥३७॥ अप्सु श्मशाने शय्यायामभिशस्ते खिलेषु च ॥ अन्तःशवे रथ्यायां ग्रामे चाण्डालसंयुते ॥३८॥ दुर्गन्धे शूद्रसंश्रावे पैङ्गे शब्दे भये रुते । वैधृते नगरेषु च ॥३९॥ अनिक्तेन च वाससा चरितं येन मैथु- नम् । शयानः प्रौढपादो चाग्रतोपस्थान्तिके गुरोः ॥४०॥ विरम्य मारुते शीघ्रे प्रत्यारम्भो विभाषितः ॥ सर्वेणा- पररात्रेण विरम्य प्रत्यारम्भो न विद्यते ॥ ४१ ॥ पौषी प्रमाणमभ्रेष्वापर्तु चेदधीयानाम् ॥४२॥ वर्षे विद्युत्स्त- नयित्नुर्वा विपद्यते ॥४३॥ त्रिरात्रं स्थानासनं ब्रह्मचर्यम- रसाशं चोपेयुः ॥ ४४ ॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥४५॥५॥१४१॥ इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे चतुर्दशोऽध्यायः समाप्तः ॥१४॥ ॥ इति कौशिकसूत्रं समाप्तम् ॥ श्मशान में, बिछावन (शयन स्थान में) पर, जिस स्थान में शव हो, गली में, जिस ग्राम में चाण्डाल रहता हो, दुर्गन्ध स्थान में, शूद्र के संश्राव में, पैङ्ग के शब्द होने में, भय में, जानवरों के बोलने पर, वैधृत्य में, नगरों में न पढ़े ॥३७॥ ३८॥ ३९॥ जिस वस्त्र से मैथुन किया है उसको जल से प्रक्षालन किया और उसी को पहने हुआ हो, सोता हुआ, प्रौढ़ पैरों से गुरु के पास बैठकर न पढ़े ॥४०॥ वायु शीघ्र गति से बहती समय पढ़ना बन्द कर देवे और आधी रात्र के पश्चात् पढ़ना बन्द कर देवे ॥४१॥ पौष में यदि बादल लग जावे और अपर्तु हो तो न पढ़े ॥४२॥ वृष्टि, बिजुली, बादल इनसे विपद् ग्रस्त हो तो न पढ़े ॥४३॥ तीन रात, स्थान, आसन, ब्रह्मचर्य, रसरहित भोजन करके नियमित रहे ॥४४॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है। यह उसकी प्रायश्चित्ति है॥४५॥५॥१४१॥ यह एकसौ एकतालीसवी कण्डिका खतम हुई । यह अथर्ववेद के कौशिक सूत्र के ठा० उदयनारायण सिंह मधुरापुर, जिला मुजफ्फरपुर कृत भाषानुवाद का चौदहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥१४॥ और कौशिक सूत्र भी समाप्त हुआ ।