कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
मृज्य ॥४॥ अथाग्निं जनयेत् ॥५॥ इत एव प्रथमं जज्ञे अग्निराभ्यो योनिभ्यो अधि जातवेदाः ॥ स गायत्र्या त्रिष्टुभा जगत्यानुष्टुभा देवो देवेभ्यो हव्यं वहतु प्रजानन्निति जनयित्वा ॥ ६ ॥ भवतं नः समनसौ समोकसाविह्येतेन सूक्तेन जुहुयात् ॥ ७ ॥ सा तत्र प्रायश्चित्तिः ॥८॥४१॥१३३॥ अथचेदागन्तुर्दहत्येवमेव कुर्यात् ॥१॥ सा तत्र प्रा- यश्चित्तिः ॥२॥४२॥१३४॥ अथ यत्रैतद्वंशः स्फोटति कपालेऽङ्गारा भवन्त्युदपात्रं बर्हिराज्यं तदादाय ॥१॥ शालायाः पृष्ठमुपसर्पति ॥२॥ तत्राङ्गारान्वा कपालं वोपनिदधात्या सन्तपनात् ॥ ३ ॥ प्राञ्चमिध्ममुपसमाधाय ॥४॥ परिसमूह्य पर्युक्ष्य परिस्तीर्य बर्हिरुदपात्रमुपसाद्य ॥५॥ परिचरणेनाज्यं परिचर्य ॥६॥ नित्यान्पुरस्ताद्धोमान्हुत्वाज्यभागौ च ॥७॥ अथ जुहोति
को मार्जन करके ॥४॥ अग्नि को उत्पादन करे ॥५॥ “इत एव प्रथमं०” इत्यादि मंत्रों से अग्नि उत्पादन करके “भवतं नः०” इत्यादि सूक्त से आहुति देवे ॥७॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥८॥४१॥१३३॥ यह एकसौ तैतीसवी कण्डिका खतम हुई ॥ अब जहां कोई आगन्तुक आकर आग लगा देवे तो ऐसा ही करे ॥१॥ यह उसकी प्रायश्चित्ति है ॥२॥४२॥१३४॥ यह एकसौ चौंतीसवी कण्डिका खतम हुई । अब जहां बांस स्फोट करे और कपाल में अङ्गारें हों । तो वहां जलपात्र को लाकर ॥१॥ शाला के पीठपर अङ्गारों या कपाल को आधान करे जब तक संतपन हो ॥२॥३॥ पूर्व भाग में इध्मों का आधान करके ॥४॥ परिसमूहन, पर्युक्षण, परिस्तरण करके बर्हिकुशों को लाकर ॥५॥ परिचरण करके आज्य तैयार करके ॥६॥ नित्य पुरस्तात् होमों को और आज्यभाग के दो होमों को करके ॥७॥ अब आहुति करे ॥८॥