कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंको विनाशार्थ पृष्णिपर्णी नामक वृक्ष को अनुरोध किया गया है। सुश्रुत ने गर्भस्राव रोग में दूध के साथ पृष्णिपर्णी की व्यवस्था कियी है। ३१ और ३२ सूक्त में पशु के कृमि का “गोः कृमिः”—केशव की टीका है। और पञ्चम काण्ड २३ सू० में शिशुओं (बच्चे) की कृमि के मंत्र हैं। इन तीन सूक्तों में अनेक प्रकार के कृमियों का वर्णन देख पड़ता है। सादा, काला, तीन मस्तक वाले, चतुर्मस्तक, नाना रंगों के कृमियों का वर्णन है। इन सब सूक्तों में किसी प्रकार के भेषज का वर्णन नहीं पाया गया। केवल मंत्रों की सहायता से कृमिनाश की व्यवस्था है। तीसरा काण्ड ५ म सूक्त में आर्थिक उन्नति लाभ के लिये पर्णवृक्ष का यंत्र। इस पर्णवृक्ष को परवर्त्ती काल में पलास ( Butin Fron dosa ) नाम से कहा गया है। ६ ठे० सू० में अश्वत्थ वृक्ष को शत्रु- नाश के लिये और हरिण शृङ्ग का यंत्र धारण करे। ( २ का०८ मसू० ) । ॥ चतुर्थ काण्ड ॥ ४ र्थ सू०। नष्टवीर्य ( Impotency ) उपद्धार के लिये कपित्थक ( Feronia Elephantum ) नामक वृक्ष का उद्देश्य के लिये मंत्र। ६।७ सू० विष झाड़ने का मंत्र किसी औषधि के नाम का उल्लेख नहीं। ९ वम सू० पाण्डु, यक्ष्मा, दोषस्थ ज्वर के लिये मलहम ( Oeintment ) कौशिक सूत्र में ( ५८।८ ) लिखा गया है कि विधि से उसमें मलहम का यंत्र बान्ध देना चाहिये। १० सू० इस सू० में दीर्घजीवन के लिये मुक्तायंत्र धारण की व्यवस्था की है। मुक्ता की उत्पत्ति के सम्बन्ध में हम लोगों में जो प्रवाद प्रचलित है कि स्वाती नक्षत्र का जल सीप में पड़ने से मुक्ता रूप से परिणत होता है, उसी प्रवाद की सूचना इस सूक्त में पाई जाती है॥ १५॥ १२ सू० में क्षत आरोग्य के लिये अरुन्धती नामक लता के उद्देश्य से यह सूक्त रचित हुआ है। इस सम्बन्ध में पञ्चम काण्ड ५म सू० में और भी एक मंत्र है। उस मंत्र में ( ५, ५, ५, ) कहा गया है—“हे अरुन्धति ! तू पलाश, अश्वत्थ, खदिर, धव प्रभृति वृक्ष के अवलम्ब से उठी है इस सू० में अरुन्धती को शिलादि और लाक्षा ( Lac ) कह 1—Born in the sky, ocean born, brought nether out of the river, this gold born shell farms a life protonging ammulet IV, 10, 4.