कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर सम्बोधन किया गया है किसी २ ने कहा है कि अरुन्धती का स्वरूप नहीं मालूम होता है। अनेक लोगों ने लाक्षारूप होने से निर्देश किया है। दोनों सूक्तों में अरुन्धती क्षतरोग के आरोग्यता के लिये निर्दिष्ट हुई है । ६ ठा काण्ड १०९ सू० में पिप्पली ( Heppercam ) क्षत के आरोग्यार्थ स्तुत हुआ है। १७,१८, १९ सूक्त । ये तीन सूक्त अपामार्ग ( चिड़चिड़ी ) ( Achryranthes aspera ) नामक औषधि के उद्देश्य से रचित हुए हैं। इस अपामार्ग और इस का क्षार परवर्त्ती काल के आयुर्वेद ग्रन्थों में बहुत परिमाण से व्यवहृत हुआ है। इन तीन सूक्तों में अपामार्ग की बहुत प्रशंसा वर्णित है। प्रत्युत इसको भेषजों की राणती कह कर निर्दिष्ट की गयी है। यह भेषज सब प्रकार के दोष युक्त रोगों, दैत्य और पाप को दूर करने में समर्थ है। २० सू० इस सू० में छिंपी हुई भूत योनि आविष्कार करने के लिये मंत्र है। पहिले ही कहा गया है जो, भूत योनि को अनेक रोगों का कारण कहकर अथर्ववेद में निर्दिष्ट हुआ है। कौशिक सूत्र (२८।७) इस विषय में करणीय प्रक्रिया वर्णित है। दारिल अपनी टीका में प्रसङ्ग वश सद्- म्पुष्प व्यवहार के लिये उल्लेख किया है।
॥ पञ्चम काण्ड ॥ ४र्थ सू० “तक्षण” ( ज्वर ) ज्वर दूर करने के लिये कुष्ठ नामक वृक्ष को आह्वान किया गया है ( १म का० २५ सू० ) ५म सू०। क्षत आरोग्य कल्प में अरुन्धती की आराधना है। ४ का० १२ सू० । ) १३ सू० । सर्प विष का मंत्र षष्ठ काण्ड, १२, १३ सू० सूक्त में सर्प विष के और दो मंत्र हैं। अनेक प्रकार के सरीसृप का उल्लेख इन तीन सूक्तों में देखने में पाया जाया जाता है। जैसे—किरातन, धूसर वर्ण, कृष्णवर्ण, चाका चाग का दाग विशिष्ट इत्यादि । इस प्रसङ्ग में मधु का उल्लेख देखने में आता है। कौशिक सूत्र में ( २९।२८।२९ ) सर्प विषकी चिकित्सा में रोगी को शीघ्र मधुपान कराने की व्यवस्था दियी गयी है। २२ सू०। तक्षण—( १ म का०, २५ सू० । ) २३ सू० । शिशुओं के कृमि ( २ का०, ३१ सू० । )
॥ षष्ठ काण्ड ॥ तीसरा सू० । तक्षण ( १म का० २३ सू० । ) १२ सू० सर्प विष का मंत्र—( ५म का० २३ सू० । )