कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७ ) सू० इस सू० में अपची गण्डमाला (केशव और सायन) रोग के आरो- ग्यार्थ मंत्र विहित हुआ है। २५ सू० देखो। ८५म सू० में यक्ष्मा रोग को दूर करने के लिये “वरण” वृक्ष के (भरणी Luffa foctidas or Caratoena roseburgeict) यन्त्र धारण की व्यवस्था कियी है। कौशिक' सूत्र में (२६।३३।३७) यह बन्धन प्रक्रिया सविस्तर वर्णित है। ९० सू०। इस सू० में—“शूल रोग” (कौलिक) निवारण कल्प में मंत्र है। इस सू० में किसी भी दवा का नाम नहीं है। केवल मंत्र की सहायता से प्राचीन लोग इस रोग को आरोग्य करते थे। ९१ सू० में जल मिश्रित यव (barley) 'सब रोगों में प्रयुज्य होती—इस सूक्त में लिखा है। ९५ सू० में तक्षण कां० १।२५ सू० १०२ सू० तक्षण—१ काण्ड २५ सू० १०९ क्षुत रोग की चिकित्सा में पिप्पली का (papper carm) व्यवहार सूचित होता है। ४ थे कां० में १२ सू० १११ सू० में पागलपन की दवा है। ११६ सू० में तक्षण—१ म काण्ड, २५ सू०। १२७ सू०। इस सूक्त में “चोपद्रु वृक्ष” सब रोगों के प्रशमनार्थ उल्लेख किया गया है। १३६–१३७ इन दो सूक्तों में केश वृद्धि के लिये नितत्नी नामक लता को सम्बोधन किया गया है। २१ सू० देखो। सप्तम काण्ड ॥ ७ ॥ ५६ सू० सर्प विष का मंत्र—५ म काण्ड १३ सू० ७४।७६ सू० इन दो सू० में—“जायान्य” नामक अर्बुद की चिकित्सा का मंत्र है। ८३ सू० में शोथ रोग का मंत्र है। चतुर्दश काण्ड ॥ १४ ॥ ३८ सू०। २ काण्ड। ४ सू० देखो। उनविंश काण्ड ॥ १६ ॥ ३५ सू०। २ रा काण्ड और ४ था सू० देखो। इस सू० में गुग्गूल का (Beclelleum) मीठे गगनपूर का रोग नाशक की शक्ति का वर्णन है। ३९ सू० में कुष्ठवृक्ष की आराधना का मंत्र है। इस स्थान में कुष्ठवृक्ष को सब प्रकार के रोग जैसे—ज्वर, कास, रोग इत्यादि आरोग्य करने के लिये बुलाया गया है। १ म काण्ड २५ सू०।