कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
पृष्ठ 33, कुल 361 में से
संदर्भ में पढ़ें❀ श्रीगणेशाय नमः ❀ ❖ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ❖ अथ विधिं वक्ष्यामः॥ १ ॥ स पुनराम्नायप्रत्ययः ॥ २ ॥ आम्नायः पुनर्मन्त्राश्च ब्राह्मणानि च ॥ ३ ॥ तद्यथा ब्राह्मणविधिरेवं कर्मलिङ्गा मन्त्राः॥ ४ ॥ तथान्यार्थाः ॥५॥ तथा ब्राह्मणलिङ्गा मन्त्राः॥ ६॥ तदभावे सम्प्रदायः ॥७॥ प्रमुक्तत्वाद्ब्राह्मणानाम् ॥ ८ ॥ यज्ञं व्याख्यास्यामो देवानां पितॄणां च ॥ ९ ॥ प्राङ्मुख उपांशु करोति ॥१०॥ यज्ञो- पवीती देवानाम् ॥११॥ प्राचीनावीती पितॄणाम् ॥१२॥ भाषार्थः—वेद की संहिता भाग को पढ़ लेने के अनन्तर वेदमंत्रों से यज्ञ, संस्कार आदि का विधान हुआ है। अब उस विधि को कहते हैं। अर्थात् शान्तिक, पौष्टिक, आभिचारिक और अद्भुत कर्म संहिताविधि में उप- दिष्ट है। यह कर्म तीन प्रकार का है। विधिकर्म, अविधिकर्म और उच्छ्रय कर्म। इनमें से विधिकर्म तीन प्रकार का है।—प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द ॥१॥ उक्त विधि का ज्ञान वेद से होता है। और वेद में विधि ज्ञापक मंत्र हैं और ब्राह्मण ग्रन्थ में वेद मंत्रों का कर्मों में विनियोग है ॥२॥ जैसे ब्राह्मण विधि हैं उसी प्रकार कर्म-लिङ्ग मंत्र हैं ॥३॥४॥ इसके अभाव में वेदाचार्यों की परम्परा से यज्ञादिकों के करने की प्राचीन प्रथा भी प्रमाण है ॥५॥६॥७॥ आचार्यों के पठन-पाठन के विश्शृ- ङ्खल होने और पढ़ाने की परम्परा नष्ट होने और प्रमाणों की विस्मृति होने से यज्ञादि करने की प्रक्रिया ने विकृत रूप धारण कर लिया है ॥८॥ अतएव देवताओं एवं पितरों के यज्ञों का उपदेश करेंगे ॥९॥ पूर्व मुख होकर देवकार्य उपांशु ( बिना मंत्र बोले ) करे ॥१०॥ देवकार्य करने में यजमान यज्ञोपवीती होकर करे और पितृकार्य में प्राचीनावीती हो करे ॥११॥१२॥