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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 357, कुल 361 में से

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पृष्ठ 357

विज्ञापन । प्रत्येक बड़े २ रोगों, भूत, प्रेतादिक उपद्रवों, जादू टोनादिको दूर करना, इनकी अचूक दवा, वेदोक्त यन्त्र, आभिमंत्रित बूटियों द्वारा रोगों को दूर करना, युद्ध, मोकदमा, की जीत होगी। इत्यादि । १ मृतवत्सा रोग—गर्भ या जन्मते ही या छोटे या स्याने होने पर बच्चे मर जाया करते । २ वन्ध्या —अनेक प्रकार की होती है। इनको नहीं जानने से लोग प्रारब्ध पर तकिया करके निरुपाय हो बैठ जाते हैं। ३ सन्तान न होना, जन्म भर दुःखी रहना—प्रेतादि के आवेश से, डाइन के करतूत से, शाप से, पूर्व- जन्म कृत पाप से, तथा अन्यान्य अज्ञात कारणों से, ऐसा होता है। ४ सूतिका को—बच्चा होते समय ऐसी पीड़ा होने लगती जो ३-४ दिन तक उसकी मरण की दशा हो जाती या तो मरजाया करती या उसका डाक्टर द्वारा औपरे- शन होता है, ऐसी स्त्री ३ प्रकार की होती है। विकृतगर्भा, (टेढ़ा मेढ़ा, उलटा) मूढ़गर्भा (पता नहीं लगता कि क्या कारण है) और मृतगर्भा (पेट ही में बच्चा मरजाता) में बहुत ख़र्च करने पर अत्यल्पसंख्यकों की जान बच जाती है। अधिकांश की मृत्यु ही हो जाती है। ५ प्रेत, भूत, पिशाच, व चूडैल, यक्ष (जिन्न) अप्सरा (परी) आदि के आवेश से प्रायः स्त्रियां बालक और छोटे बच्चे तथा कतिपय पुरुष भी दुःखी होते हैं। ६ भूतादि आविष्ट व्यक्ति रोगयुक्त होने पर, रोगों की दवा करते करते, आविष्ट रोगी मरजाते परन्तु केवल दवा से रोगी अच्छे नहीं हो पाते) जब तक भूतादि को यन्त्रादि अलौकिक शक्ति से काम न लिया जाय । ७ बहुत सी स्त्रियाँ, पुरुष, बालक, आदि प्रयोग से वशी करण, पागलपन, उच्चाटन, मारण, मोहन आदि का प्रयोग करने पर लोग बेकार हो जाते हैं। ८ जिन्न, परी, जबरदस्त प्रेत, विनायक जो मामूली मन्त्र प्रयोक्ता से नहीं हटते, मकान, पाखाना, स्कूल, आदि में भी बदमाश प्रेत लोगोंको कष्ट पहुँचाते हैं। बहुत से नये मकान बनवा कर लोग उनमें रह नहीं पाते—रहने से आ जन्म दुःखी या बहुत से मरने लगते हैं।

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