भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

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शं त्वा गृह्णे सहस्रपोषायेति तृतीयम् ॥१३॥ ओं जनच्छं त्वा गृह्णेऽपरिमितपोषायेति चतुर्थम् ॥१४॥ राजकर्माभिचारिकेष्वमुष्य त्वा प्राणाय गृह्णेऽपानाय व्यानाय समानायोदानायेति पञ्चमम् ॥१५॥ अग्नावग्नि- र्हृदा पूतं पुरस्ताद्युक्तो यज्ञस्य चक्षुरिति जुहोति ॥१६॥ पश्चादग्नेर्मध्यदेशे समानत्र पुरस्ताद्धोमान् ॥१७॥ दक्षि- णेनाग्निमुदपात्र आज्याहुतीनां सम्पातानानयति ॥१८॥ पुरस्ताद्धोम आज्यभागः संस्थितहोमः समृद्धिः शान्ता- नामिति ॥१९॥ एतावाज्यभागौ ॥२०॥ ॥३॥ वृष्णे बृहते स्वविदे अग्नये शुल्कं हरामि त्विषीमते । स न स्थिरान्बलवतः कृणोतु ज्योक् नो जीवात्वे दधात्वग्नये स्वाहेत्युत्तरपूर्वार्द्धे आग्नेयमाज्यभागं जुहोति॥१॥दक्षिणपूर्वार्द्धे सोमाय त्वं सोम दिव्यो नृचक्षाः सुगा अस्मभ्यं पथो अनुख्याः । अभि नो गोत्रं विदुष इव नेषोऽछा नो वाचमुशतीं जिगासि सोमाय स्वाहेति ॥२॥ को, “ओं जनच्छं०” इत्यादि से चौथे को पकड़े ॥११॥१२॥१३॥१४॥ राजकर्म और आभिचारिक कर्मों में “अमुष्य त्वा०” इत्यादि से पञ्चम को पकड़े ॥१५॥ “अग्नावग्निर्हृदा०” इत्यादि से अविधिकर्म होने से एक एक स्रुव करके आज्यधानी से आज्य की आहुतियाँ देवे ॥१६॥ अग्नि के पश्चात् मध्य देश में समान ही पुरस्ताद्धोम, अग्नि के दक्षिण भाग में जलपात्र आज्याहुतियों के संपातों को लावे अर्थात् हुतशेषों को लावे ॥ पुरस्ताद्धोम, आज्य भाग, संस्थित होम, समृद्धि होम, और शान्त होमों के बचे होमों को उदपात्र में रक्खे और इन आज्यभाग की दो आहुतियों को भी ॥१७॥१८॥१९॥२०॥ यह तीसरी कण्डिका समाप्त हुई ॥ ३ ॥ “वृष्णे बृहते०” इत्यादि मंत्र से अग्नि के उत्तर पूर्वार्द्ध में आग्नेय आज्य भाग की आहुति देवे ॥१॥ और दक्षिण पूर्वार्द्ध में “त्वं सोम दिव्यो०” इत्यादि से आहुति करे ॥२॥ पुरस्ताद्धोम और आज्यभाग के २