कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
पृष्ठ 42, कुल 361 में से
संदर्भ में पढ़ें१० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । मध्ये हविः ॥३॥ उपस्तीर्याज्यं संहताभ्यामङ्गुलिभ्यां द्विर्हविषोऽवद्यति मध्यात्पूर्वार्द्धाच्च ॥४॥ अवत्तमभिघार्य द्विर्हविः प्रत्यभिघारयति ॥५॥ यतो यतोऽवद्यति तदनु- पूर्वम् ॥६॥ एवं सर्वाण्यवदानानि ॥७॥ अन्यत्र सौविष्ट- कृतात् ॥८॥ उदेनमुत्तरं नयेति पुरस्ताद्धोमसंहतां पूर्वाम् ॥९॥ एवं पूर्वा पूर्वा संहतां जुहोति ॥१०॥ स्वाहान्ताभिः प्रत्यूचं होमाः ॥११॥ यामुत्तरा मग्नेराज्यभागस्य जुहोति रक्षोदेवत्या सा यां दक्षिणतः सोमस्य पितृदेवत्या सा ॥१२॥ तस्मादन्तरा होतव्या देवलोक एव हूयन्ते ॥१३॥ यां हुत्वा पूर्वामपरां जुहोति सापक्रामन्ती स पापी- यान्यजमानो भवति ॥१४॥ यां परां परां संहतां जुहोति साभिक्रामन्ती स वसीयान् यजमानो भवति ॥१५॥ होम के मध्य भाग में प्रधान हवि की आहुतियाँ देवे ॥३॥ आज्य को उतार कर स्रुव से उपस्तरण मिली हुई दो अङ्गुलियों से ( मध्यमा और प्रदेशिनी से ) स्रुच में एक स्रुव धर कर दो अङ्गुलियों से अवदान करे पूर्वार्द्ध मध्य से ॥४॥ अवदान को अभिघार कर दो बार आहुति कर के पुनः अभिघार देवे ॥५॥ जैसे २ अवदान करे उसी क्रम से उस हवि का ढार देवे ॥६॥ इसी प्रकार उक्त अवदान नियम से प्रत्येक ऋचा से अवदान करे ॥७॥ सौविष्ट कृत को छोड़ कर अन्यत्र समझना ॥८॥ “उदेनमुत्तरं नय०” इस प्रथम ऋचा से पुरस्ताद्धोम देश की आहुति देवे ॥९॥ इस २ प्रकार पूर्व २ देश में मिली हुई पूर्व २ आहुतियाँ देवे ॥१०॥ प्रत्येक आहुति के स्वाहान्त मंत्र के साथ करे ॥११॥ अग्नि के उत्तर भाग में जो आज्य भाग की आहुति होती है वह रक्षो देवता के लिये जानो । जो दक्षिण भाग में सोम की आहुति होती है वह पितरों के लिये जानो ॥१२॥ इसलिये मध्य में आहुति देवे—यह आहूति देव लोक ही में होती है जानो ॥१३॥ जिस आहुति करके—पूर्वा अपरा आहुति होती है, वह अपक्रामन्ती नाम की आहुति है जिसके करने से यजमान पापी होता है ॥१४॥ जो परा परा मिली आहुति होती है