कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ११
यामनग्नौ जुहोति सान्धा तया चक्षुर्यजमानस्य मीयते सोऽन्धंभावुको यजमानो भवति ॥१६॥ यां धूमे जुहोति सा तमसि हूयते सो ऽरोचको यजमानो भवति ॥१७॥ यां ज्योतिष्मति जुहोति तया ब्रह्मवर्चसी भवति तस्मा- ज्ज्योतिष्मति होतव्यम् ॥१८॥ एवमस्मै क्षत्रमग्नीषोमा- विह्यग्नीषोमीयस्य ॥१९॥४॥ अग्नीषोमा सवेदसा सहूती वनतं गिरः । सं देवत्रा बभूवथुः ॥ युवमेतानि दिवि रोचनान्यग्निश्च सोम सक्रतू अधत्तम् । युवं सिन्धूँरभिशस्तेरवद्यादग्नीषोमा- वमुञ्चतं गृभीतान् ॥ अग्नीषोमा य आहुतिं यो वां दाशाद्धविष्कृतिम् । स प्रजया सुवीर्यं विश्वमायुर्व्य- श्नवत् ॥१॥ इन्द्राग्नी रोचना दिवः परि वाजेषु भूषथः । तद्वां चेति प्रवीर्यम् ॥ श्रथद्वृत्रमुत सनोति वाज- मिन्द्रा यो अग्नी स हुरी सपर्यात् । इरज्यन्ता वस्व्व्यस्य भूरेः सहस्तमा सहसा वाजयन्ता ॥ इन्द्राग्नी अस्मान् रक्षतां यौ प्रजानां प्रजावती । स प्रजया सुवीर्यं विश्व- मायुर्व्यश्नवत् ॥ गोमद्धिरण्यवद्वसु यद्वामश्वावदीमहे ।
उसको अभिक्रामन्ती कहते हैं-उससे यजमान ईश्वर ( शक्तिशाली ) होता है ॥१५॥ जो आहुति अग्नि बुत जाने पर भस्म में होती है उसका करने वाला यजमान नेत्र से दृष्टि हीन होता है ॥१६॥ जो धूमयुक्त अग्नि में आहुति करता है वह गुणयुक्त होता हुआ भी प्रकाश रहित होता है ॥१७॥ जो ज्वालायुक्त अग्नि में आहुति करता है वह यजमान ब्रह्म- वर्चस्वी होता है अतएव ज्वालायुक्त अग्नि में आहुति देवे ॥१८॥ इसी प्रकार “अस्मै क्षत्रम्०” इत्यादि से अग्नीषोमीय देवताओं की आहुतियाँ देवे ॥१९॥ यह चौथी कण्डिका पूरी हुई ॥४॥ “अग्नीषोमा०” इत्यादि से लेकर “तद्वानेमहि स्वाहा” तक के मंत्रों