भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 361 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 50

१८ ़अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । शिरस्तः प्रक्रम्याप्रपदात्प्रमार्ष्टि ॥ १७ ॥ पूर्वं प्रपाद्य प्रयच्छति ॥ १८ ॥ त्रयोदश्यादयस्तिस्रो दधिमधूनि वासयित्वा बध्नाति ॥ १९ ॥ आशयति ॥२०॥ अन्वार- ब्धायामभिमन्त्रणहोमाः ॥ २१ ॥ पश्चादग्नेश्चर्मणि हविषां संस्कारः ॥ २२ ॥ आनडुहः शकृत्पिण्डः ॥२३॥ जीवघात्यं चर्म ॥२४॥ अकर्णोऽश्मा ॥२५॥ आप्लवनावसे- चनानामाचामयति च ॥२६॥ सम्पातवतामश्नाति न्यङ्क्ते वा ॥ २७॥ अभ्याधेयानां धूमं नियच्छति ॥ २८ ॥ शुचि- ना कर्मप्रयोगः ॥२९॥७॥ पुरस्ताद्धोमवत्सु निशाकर्मसु पूर्वाह्ने यज्ञोपवीती शालानिवेशनं समूहहत्युपवत्स्यद्भक्तमशित्वा स्नातोऽ- हतवसनः प्रयुङ्क्ते ॥१॥ स्वस्त्ययनेषु च ॥ २॥ इज्यानां इनमें से स्त्री तो जल में गोता लगाकर स्नान करे और रुग्ण पुरुष शिर से पैर तक जल से मार्जन करे ॥१७॥ पहिले प्रपादन फिर मन्थौदन को देवे ॥१८॥ और त्रयोदशी आदि तीन तिथियों में दही, मधु, यज्ञ कराने वाले को कर्ता खिलावे और वासित को बान्ध देवे ॥१९॥ इसके पश्चात् अग्नि के पास जो चर्म है, उसमें हवि का संस्कार करे ॥२०॥ बैल के गोमय का पिण्ड बनावे । बलवान् जीवित पशु के चर्म को अर्थात् गोलाकार सींगवाले पशु के चर्म को लाकर घरे ॥२१॥२२॥२३॥२४॥२५॥ आप्लवन, अवसेचन, का कारयिता कर्ता से आचमन करावे ॥ २६ ॥ आहुति के सम्पात को आँखों में आञ्जे या खावे ॥ २७ ॥ अभ्याधेय पदार्थों के धूम को कारयिता स्वयं ग्रहण करे ॥२८॥ और कर्मों की समाप्ति में पवित्रता से कर्म का प्रयोग करे । नित्य, नैमित्तिक, काम्य कर्मों को स्नान कर के करे ॥२९॥३०॥ यह सातवी कण्डिका समाप्त हुई ॥७॥ पुरस्ताद्धोमवाले निशाकर्मों में पूर्वाह्न में यज्ञोपवीती होकर अग्नि- शाला में बैठकर अग्नि का समूहन करे । उपवास रहकर, भात खाकर, नहाकर, अखण्ड चीरे दार नये वस्त्र धारण कर-कर्म करने में प्रवृत्त होवे ऐसा कोई आचार्य मानते हैं ॥१॥ स्वस्त्ययन कर्मों में भी ऐसा ही करे