भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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२२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।

सर्वा इत्याख्यात ओं बृहस्पति प्रसूतः करवाणीत्यनु- ज्ञाप्यों सवितृप्रसूतः भवानित्यनुज्ञातः कुर्वीत ॥९॥ पूर्वया कुर्वीतेति गार्ग्यपार्थश्रवसभागलिकाङ्कायनोपरि- बभ्रवकौशिकजाटिकायनकौरुपथयः ॥ १० ॥ अन्यत- रया कुर्वीतेति युवा कौशिको युवा कौशिकः ॥११॥९॥ इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ॥१॥ पूर्वस्य मेधाजननानि ॥१॥ शुकसारिकृशानां जिह्वा बध्नाति ॥२॥ आशयति ॥३॥ औदुम्बरपलाशकर्कन्धूना- मादधाति ॥४॥ आवपति ॥५॥ भक्षयति ॥६॥ उपाध्यायाय भैक्ष्यं प्रयच्छति ॥ ७॥ सुप्तस्य कर्णमनुमन्त्रयते ॥ ८ ॥ उपसीदञ्जपति ॥९॥ धानाः सर्पिर्मिश्राः सर्वहुताः ॥१०॥ छूकर कहे-हाँ सब है । सब क्या ? चित्यादि सब मिल कर सब ओष- धियों सहित गंगादिके सब नदियों का जल है । "ओं बृहस्पतिप्रसूतः करवाणि" ऐसी मुझे अनुज्ञा हो "सवितृप्रसूतः भवानि" अनुज्ञा पाने पर करो ॥ "बृहस्पति प्रसूतः" से करे यह मत गार्ग्य, पाथे, श्रवस, भागलि, काङ्कायन, उपरि बभ्रव, कौशिक, जाटिकायन, कौरुपथि का है। "सवितृप्रसूतः" से करे यह मत युवा कौशिक का है ॥८॥९॥१०॥११॥ यह नवमी कण्डिका समाप्त हुई ॥९॥ यह अथववेद के कौशिक सूत्र के प्रथमाध्याय का भाषानुवाद समाप्त हुआ ॥१॥ पूर्व के (त्रिषप्रीयासूक्त) अनुवाक से मेधा जनन कर्म करे ॥१॥ मेधा चाहने वाले कंटारिका के पत्ते को "अयं मे वरण उरसि०" और आज्यादि सूक्त से आज्याहुति के संपात से होमकर अपने गले में बाँधे ॥२॥ और कर्त्ता मेधा चाहने वाले को खवावे ॥३॥ उदुम्बर, पलाश, बैर के बड़े फल, इनको लावे ॥४॥ और उसे आवपन करे ॥५॥ ये त्रि- षप्ता०" इस सूक्त से क्षीरौदन खावे और रस को प्राशन करे ॥६॥ "ये त्रिषप्ता०" सूक्त से उपनयन के अनन्तर-ब्रह्मचारी-एकत्रित की हुई भिक्षा को अभिमन्त्रण कर अध्यापक को समर्पण करे ॥७॥ रात में सोते हुए अध्यापक के कान में अभिमंत्रण करे ॥८॥ जब २ उपाध्याय घर