कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतिलमिश्रा हुत्वा प्राश्नाति ॥ ११ ॥ पुरस्तादग्नेः कल्माषं दण्डं निहत्य पश्चादग्नेः कृष्णाजिने धाना अनुमन्त्रयते ॥१२॥ सूक्तस्य पारं गत्वा प्रयच्छति ॥१३॥ सकृज्जुहोति ॥१४॥ दण्डधानाजिनं ददाति ॥१५॥ अहं रुद्रेभिरिति शुक्ल- पुष्पहरितपुष्पे किंस्त्यनाभिपिप्पल्यौ जातरूपशकलेन प्राक्स्तनग्रहात् प्राशयति ॥ १६॥ प्रथमप्रवदस्य मातु- रुपस्थे तालुनि सम्पातानानयति ॥ १७ ॥ दधिमध्वाश- यति ॥ १८ ॥ उपनीतं वाचयति वार्षशतकं कर्म ॥१९॥ त्वं नो मेघे द्यौश्च म इति भक्षयति ॥ २० ॥ आदित्य- मुपतिष्ठते ॥२१॥ यदग्ने तपसेत्याग्रहायण्यां भक्षयति ॥ २२ ॥ अग्निमुपतिष्ठते ॥२३॥ प्रातरग्निं गिरावर्गराटेषु को जाया करे तब २ ब्रह्मचारी जप किया करे ॥९॥ लावा, घी, मिला- कर हवन करे ॥१०॥ तिल रें., घी मिलाकर हवन कर शेष हवि को प्राशन करे ॥११॥ काले रंग के दण्ड को अग्नि के पीछे धर कर काले रंग के मृग चर्म पर धाना धर कर उस का अनुमंत्रण करे ॥१२॥ सूक्त को पढ़ लेने पर देवे ॥१३॥ धान को अजिन के द्वारा एक बार आहुति देवे ॥१४॥ और उपाध्याय के लिये दण्ड धान अजिन देवे ॥१५॥ “अहं रुद्रेभिः” इत्यादि से शंखपुष्पिका, अन्धपुष्पिका, शंखनाभि, पिप्पली को सोने के शलाका से घस कर माँ के दूध पीने के पहिले बालक को चटावे ॥ और बच्चे को भली भाँति वर्चस्वी बनाने के लिये और मेधावि बनाने वाला पहिले माता के गोद में बच्चे को देकर “अहं रुद्रेभिः” सू० से पाँच कर्मों को जात कर्म में करे और सम्पात को तालु पर डाले ॥१६॥१७॥ और दही मधु मिलाकर बच्चे को चटावे ॥१८॥ और बालक के पास “अहं रुद्रेभिः” सूक्त एवं “आयातु मित्र” इत्यादि गण के अन्त के वचन को पढ़े—जो बच्चे की आयुः सौ वर्ष की चाहे वह इस कर्म को करे ॥१९॥ “त्वं नो मेघे०” मंत्रों से भक्षण करावे ॥२०॥ आदित्य का उपस्थान करे ॥२१॥ “यदग्ने तपसे०” इत्यादि से आग्रयण की पौर्णमासी को मेधा- जनन कर्म कर के और बच्चे को शेष हवि भक्षण करावे ॥ २२ ॥ और