कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । दिवस्पृथिव्या इति संह्राय मुखं विमार्ष्टि ॥२४॥१॥१०॥ पूर्वस्य ब्रह्मचारि साम्पदानि ॥१॥ औदुम्बर्यादयः ॥२॥ ब्रह्मचार्यावसथादुपस्तरणान्यादधाति ॥३॥ पिपीलिकोद्वापे मेदोमधुश्यामाकेषीकतूलान्याज्यं जुहोति ॥ ४ ॥ आज्य- शेषे पिपीलिकोद्वापानोप्य ग्राममेत्य सर्वहुतान् ॥ ५ ॥ ब्रह्मचारिभ्योऽन्नं धानास्तिलमिश्राः प्रयच्छति ॥६॥ एता- निग्रामसाम्पदानि ॥ ७ ॥ विकारस्थूणामूलावत्तक्षणानि समानामुपस्तरणानि ॥८॥ ग्रामीणेभ्योऽन्नम् ॥९॥ सुरां सुरापेभ्यः ॥ १० ॥ औदुम्बर्यादीनि भक्षणान्तानि सर्व- साम्पदानि ॥११॥ त्रिज्योतिःकुरुते॥१२॥ उपतिष्ठते॥१३॥ सव्यात्पाणिहृदयाल्लोहितं रसमिश्रमश्नाति ॥ १४॥ पृश्निमन्थः ॥ १५ ॥ जिह्वाया उत्साद्यमक्ष्योः परिस्तरण- अग्नि का उपस्थान करे ॥२३॥ "प्रातरग्नि०" इत्यादि पढ़ कर सोते से उठ कर मुख का प्रक्षालन करे ॥२४॥ १॥ यह दशमी कण्डिका पूरी हुई ॥१०॥ पौर्णमासी को निर्ऋति कर्म करके एक वार प्रातःकाल में ब्रह्मचारी "त्रिषप्तीय०" सूक्त से साम्पद् कर्म करे ॥ उदुम्बर आदि १०।४ सूत्रोक्त अग्नि का आधान करे ॥२॥ ब्रह्मचारी अपने घर से तृणादि को लाकर आधान करे ॥३॥ चूँटियों से फेकी वा निकाली हुई मट्टी के छिद्र में मेद, मधु, श्यामक, शरपुष्प इनको आज्य के साथ आहुति देवे ॥४॥ आज्य शेष में पिपीलिका की मट्टी को थाली में धर कर ग्राम में आकर एक वार हवन करे ॥५॥ ब्रह्मचारियों के लिये अन्न, और तिल मिला धान देवे ॥६॥ पूर्व दिन में निर्ऋति कर्म करके ग्राम साम्पद् का अधिकार होता है। समिद् का विकार, स्थूणा (खूँटी) के जड़, इनके अवतक्षण (चीर, फाड़, कर, ) को यज्ञ के उपस्तरण करे ॥७।८॥ ग्रामीणों को अन्न, सुरा पीने वाले को सुरा देवे ॥९।१०॥ औदुम्बर, पलाश, बैर आदि और क्षीरौदन, पुरोडाश, रस ये सर्वकामनाओं के लिये हैं ॥११॥ तीनवार ज्योतिःकरै ॥१२॥ तब उपस्थान करे ॥१३॥ सव्य हाथ से लाल सहजन को पानी में मिलाकर खावे ॥१४॥ गौ का मट्ठा ॥१५॥ मस्तु