कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २ ) कं. सूत्र पृष्ठ ९-१-११ “अम्बयो यन्ति” आदि सूक्तों का स्पष्टीकरण और शान्त्युदक २१-२२ का तैयार करना । अध्याय ॥ २ ॥ १०-१-२४ मेधाजनन, ब्रह्मचारी को ब्रह्मचर्य की सफलता, हवि करने २२-२४ के नियम, बच्चे को शंखपुष्पी आदि का चटाना, जातकर्म के महोपकारी नियम । ११-१-२० पौर्णमासी को निर्ऋतिकर्म, ब्रह्मचारी साम्पदकर्म करे । २४-२५ १२-१-१६ सम्पत्ति कामना, सामनस्य के लिये काम्यकर्म ग्रामप्राप्ति २५-२६ एवं सर्वकामना की सिद्धि । १३-१-१३ हस्तिवर्चस आदि को विधिपूर्वक यन्त्र बांधने से फल, २६-२७ यक्ष्मा की दवा मेघजल को नियम से लेवे । १४-३१ युद्ध का वर्णन, विजय कर्म, इषुनिवारण कर्म, शत्रुसेना २७-३० की बुद्धिभ्रष्ट करना, उद्वेगकर कर्म । १५-१८ जयकर्म, जयपराजय ज्ञान, रोगी जीवेगा ? जानने का यंत्र । ३०-३२ सांग्रामिक विधान, परसेना में किन महारथियों का मरण होवेगा ? जानना । १६-३३ सोमलता को योद्धाओं के हाथ में बांधना, अभयकर्म । सेना ३२-३५ कर्म । राष्ट्र में प्रवेश । १७-३४ माण्डलिक राजाओं का अभिषेक और क्षत्रिय को सावित्री ३५-३७ बचवावे । अध्याय ॥ ३ ॥ १८-३८ दरिद्रता दूर करने के लिये, मन चाहा धन मांगने वाला ३७-४० निऋति कर्म करे । १९-३१ गोपालनविधि । पुष्टिकर्म । पीयूष की संज्ञा । सर्वकाममणि ४०-४३ शान्ति । २०-२६ हल जोलने आदि, खेती सम्बन्धि कर्म, बहुत बैल, गौयें हों ४३-४५ ऐसी इच्छा वाला मनुष्य यह कर्म करे । २१-२५ पदार्थवृद्धि कर्म, गोशान्ति कर्म । शान्त वृक्ष की शाखा को ४५-४७ घर में लाकर अमावास्या और पूर्णमासी को रसकर्म करे ।