कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । प्रतिप्रवर्तयति ॥२॥ यानेनाभियाति ॥३॥ वादित्रैः ॥४॥ दृतिवस्त्योरोप्य शर्कराः ॥५॥ तोत्रेण नग्नप्रच्छन्नः ॥६॥ विद्मा शरस्य मा नो विदन्नदारसृत्स्वस्तिदा अवमन्यु- र्निर्हस्तः परिवर्त्मान्यभिभूरिन्द्रो जयात्यभित्वेन्द्रोति सा- ङ्ग्रामिकानि ॥७॥ आज्यसक्तूञ्जुहोति ॥८॥ धनुरिध्मे धनुःसमिधमादधाति ॥६॥ एवमिष्विध्मे ॥१०॥ धनुःस- म्पातवद्विमृज्य प्रयच्छति ॥११॥ प्रथमस्येषुपर्ययणानि ॥१२॥ द्रुघ्न्यार्त्तीज्यापाशत्तृणमूलानि बध्नाति ॥१३॥ आ- प्रधान कर्म करे। इस के अनन्तर उत्तर तंत्र में विशेषता है। संनति होमांत तक करके "इमे जयंतु स्वाहेभ्य०" इत्यादि मंत्र से आज्य की आहुति देवे। पश्चात् वधक काष्ठ प्रज्वलित अग्नि में बायें हाथ से इङ्गिड की 'पराभिजयन्तादुराहामोभ्यः ओं स्वाहेति" मंत्र से आहुति देवे। तब शाखाओं पर दक्षिणा में- "नीललोहितेनामून्" मंत्र से डाले स्विष्ट- कृत् आदि उत्तर तंत्र-हुआ। यह सांग्रामिकतंत्र है। सांग्रामिक तंत्रों में सब जगह मंत्रों का उच्चारण ऊंचे स्वर से होगा परन्तु प्रधान मंत्रों ही को ऊंचे स्वर से बोलना चाहिये ॥ अब शत्रु के हाथियों को डराने के कर्मों का विधि कहेंगे ॥१॥ शत्रु सेना के हाथियों को युद्ध में प्रवर्त्तमान के सम्मुख राजा अपनी सेना की हस्तिनियों को आगे करे और रथचक्र के आगे हाथियों को प्रवृत्त करे घोड़े आदि को सम्पात् से संस्कृत करके शत्रु सैन्य के सम्मुख करे ॥ पुरोहित बाजों के (भेरी, मृदङ्ग झलरि आदि) साथ जावें, दृति (चमड़े का मोट) अनुवासना चर्म इन दोनों में शर्करा (अस्त्र विशेष) को डाल कर हाथी पर प्रतोद लेकर लग्न हो छिपाकर, हाथी को अङ्कुशादि से दण्ड देकर आगे शीघ्र चलावे ॥२॥३॥४॥५॥६॥ "विद्मा शरस्य०" इत्यादि सूक्तों से आज्य आहुतियाँ देवे ॥८॥ प्रादेशमात्र लम्बी सरपत की इध्म अग्नि में डाले ॥१०॥ और धनुष को सम्पात की तरह करके (अग्नि पर झुका कर) राजा को देवे ये विजय कर्म समाप्त हुए ॥ इन कर्मों से शत्रु से न लड़ने पर भी विजय होता है क्योंकि शत्रु सेना इन कर्मों को देखते ही भाग जायेगी॥११॥ इषु निवारण कर्म को कहते हैं। द्रुघ्नी, आर्त्ती, ज्या,