कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥३३॥७॥१६॥ भूतो भूतेष्विति राजानमभिषेक्ष्यन्महानदे शान्त्युदकं करोत्यादिष्टानाम् ॥१॥ स्थालीपाकं श्रपयित्वा दक्षिणतः परिगृह्याया दर्भेषु तिष्ठन्तमभिषिञ्चति ॥२॥ तल्पार्षभं चर्मारोहयति ॥३॥ उदपात्रं समासिञ्चेते ॥४॥ विपरिधाने ॥५॥ सहैव नौ सुकृतं सह दुष्कृतमिति ब्रह्मा ब्रूयात् ॥६॥ यो दुष्कृतं करवत्तस्य दुष्कृतं सुकृतं नौ सहेति ॥७॥ आशयति ॥८॥ अश्वमारोह्यापराजितां प्रति- पादयति ॥९॥ सहस्रं ग्रामवरो दक्षिणा ॥१०॥ विपरिधा- नान्तमेकराजेन व्याख्यातम् ॥११॥ तल्पे दर्भेष्वभिषि- ञ्चति ॥१२॥ वर्षीयसि वैयाघ्रं चर्मारोहयति ॥१३॥ ऋत्वा- को भी ग्रहण करे ॥३२ ॥ राष्ट्र के तीन जनों के प्रातःकाल भोजन कर लेने पर पुरोडाश से हवन करे ॥३३॥७॥१६॥ यह सोलहवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥१६॥ अब लघुअभिषेक विधि को कहेंगे ॥ माण्डलिक, सामन्त, युवराज, सेनापति, या अन्य किसी का अभिषेक कर्म जानना । राजा आदि अभि- षेक करने की इच्छा वाला महानदी गंगा, यमुना आदि के जल से पुरोहित मंत्रोक्त जल से तय्यार करे ॥१॥ स्थालीपाक को पकाकर अग्नि के दक्षिण भाग में बिछाये हुए कुशों पर बैठे राजा आदि को पुरोहित यथाविधि “भूतोभूतेषु”० इत्यादि अभिषेक गण मंत्रों से अभिषेक करे ॥२॥ पलङ्ग पर लाल बैल के चर्म को बिछा कर उसपर राजा को पुरोहित आरोहण करावे ॥ जलपात्र को जल से सिञ्चन करे ॥४॥ पुरोहित राजा के बदले “सह नौ सुकृतं सह दुष्कृतम्” ऐसा ब्रह्मा कहे ॥६॥ राजा उत्तर देवे । “यो दुष्कृतं करवत्तस्य दुष्कृतं सुकृतं नौ सह” ॥७॥ स्थाली पाक को भक्षण करे ॥८॥ राजा घोड़ा पर चढ़कर पश्चिम दिशा की ओर जावे ॥९॥ सहस्र गौ दक्षिणा में पुरोहित को देवे ॥१०॥ सार्वभौम राजा का अभिषेक, माण्डलिक राजा के अभिषेक की अपेक्षा भिन्न है ऐसा कहा गया जानना ॥११॥ मंचान पर, कुशों पर, बैठे हुओं को अभिषिंचन करे इसका विकार फिर कुशोंपर का कहना तल्प के सम्बन्धार्थ जानना ॥१२॥ अधिक उमर वाले व्याघ्र के