भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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पृष्ठ 68

३६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।

रो राजपुत्रास्ताल्पाः पृथक् पादेषु शयनं परामृश्य सभां प्रापयन्ति ॥१४॥ दासः पादौ प्रक्षालयति ॥१५॥ महा- शूद्र उपसिञ्चति ॥१६॥ कृतसम्पन्नानक्षानातृतीयं विचि- नोति ॥१७॥ वैश्यः सर्वस्वजैनमुपतिष्ठत उत्सृजायुष्म- न्निति ॥१८॥ उत्सृजामि ब्राह्मणायोत्सृजामि क्षत्रियायो- त्सृजामि वैश्याय धर्मो मे जनपदे चर्यतामिति ॥१९॥ प्रतिपद्यते ॥२०॥ आशयति ॥२१॥ अश्वमारोह्यापराजि- तां प्रतिपादयति ॥२२॥ सभामुदायाति ॥२३॥ मधुमिश्रं ब्राह्मणान् भोजयति ॥२४॥ रसानाशयति ॥२५॥ महि- षाण्युपयाति ॥२६॥ कुर्युर्गामिति गार्ग्यपार्थश्रवसौ नेति भागलिः ॥२७॥ इममिन्द्र वर्धय क्षत्रियं म इति क्षत्रियं प्रातः प्रातरभिमन्त्रयते ॥२८॥ उक्तं समासेचनं विपरि- धानम् ॥२९॥ सविता प्रसवानामिति पौरोहित्ये वत्स्य- चर्म पर आरोहण करावे ॥१३॥ और राजपुत्र राजा के शयन-शय्या के पैर की ओर जब तक राजा को नींद न आवे तब तक शयन सम्बन्धि बातें करे और सभा को पहुँचावे ॥१४॥ शूद्रदास राजा के पैरों को प्रक्षालन करे ॥१५॥ महाशूद्र प्रक्षालन करते समय जल ढारा करे ॥१६॥ पुष्टिद्यूत के लिये बहेरा के फलों को चूने और द्यूत के लिये अक्षों को तय्यार कर तीसरे पाशा को चुन लेवे यों राजा द्यूत खेले ॥१७॥ “उत्सृज आयुष्मन्”० ऐसा कहकर वैश्य राजा के पास बैठे ॥१८॥ “उत्सृ- जामि”० इत्यादि मंत्र राजा पढ़े और वैश्य, राजा के निकट पहुँचे ॥१९॥२०॥ सब वर्णों से आज्ञा पाकर वैश्य सब पटरानियों के घरों में जावे और राजा को घोड़े पर चढ़ाकर पश्चिम दिशा में पहुँचा कर सभा में राजा को लेकर आवे ॥२३॥ और मधु मिला अन्न ब्राह्मणों को भोजन करावे । रसों को भोजन करावे ॥२५॥ और सब महिषियों के घरों में राजा जावे ॥२६॥ “कुर्युर्गाम्”–ऐसा गार्ग्य पार्थश्रवस ये दो आचार्य मानते हैं और भागलि नहीं मानते हैं ॥२७॥ 'इममिन्द्र वर्धय क्षत्रियम्'० प्रति दिन प्रातः समय पुरोहित अभिमंत्रणा किया करे