कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ३७ न्वैश्वलोपीः समिध आधाय ॥३०॥ इन्द्र क्षत्रमिति क्षत्रियमुपनयीत ॥३१॥ तदाहुर्न क्षत्रियं सावित्रीं वाच- येदिति ॥३२॥ कथं नु तमुपनयीत यन्न वाचयेत् ॥३३॥ वाचयेदेव वाचयेदेव ॥३४॥८॥१७॥ इत्यथर्ववेदे कौशिक- सूत्रे द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥२॥ पूर्वस्य पूर्वस्यां पौर्णमास्यामस्तमित उदकान्ते कृष्ण- चेलपरिहितो निर्ऋतिकर्माणि प्रयुङ्क्ते ॥१॥ नाव्याया दक्षिणावर्ते शापेटं निखनेत् ॥२॥ अपां सूक्तैरवसि- ञ्चति ॥३॥ अप्सु कृष्णं जहाति ॥४॥ अहतवसन उपमु- च्योपानहौ जीवघात्याया उदाव्रजति ॥५॥ प्रोष्य तामुत्त- रस्र्यां साम्पदं कुरुते ॥६॥ शापेटमालिप्याप्सु निबध्य तस्मिन्नुपसमाधाय संपातवन्तं करोति ॥७॥ अश्नाति ॥२८॥ जलका आसेचन विपरियान करके कहा गया है ॥२९॥ “सविता प्रसवाना”० इत्यादि मंत्र से अमावस्या को पुरोहित उपवास रहकर समिदाधान करे ॥३०॥ “इन्द्रक्षत्रम्”० से क्षत्रिय का उपनयन करे ॥३१॥ सो कहा है कि क्षत्रिय से सावित्री मंत्र न बचवावे ॥३२॥ तो कैसे उसका उपनयन किया जावे ? (जब सावित्री न बचवायी जावे) ॥३३॥ बचवावे ही बचवावे ही ॥३४॥ ८॥१७॥ यह सतरहवीं कण्डिका पूरी हुई ॥१७॥ और अथर्ववेद के कौशिकसूत्र के दूसरे अध्याय का भाषानुवाद समाप्त हुआ ॥ “पूर्वं त्रिषप्तीयम्”० सूक्त के अनुसार पहिली पौर्णमासी को सूर्यास्त समय जल के पास जाकर काला वस्त्र पहन कर निर्ऋति कर्मों (दरिता दूर करने के लिये) को करने में प्रयुक्त होवे ॥१॥ नाव के दक्षिण भाग में शापेट को खने और अप सूक्तों से जल से सिंचन करे ॥२॥३॥ और जो काला वस्त्र पहिना है उसको जल में छोड़ देवे ॥४॥ और अखण्ड नये वस्त्र और जीवित पशु को मारकर जो चर्म लिया गया हो उससे बने जूते को छोड़ पीछे लौट कर देखता हुआ घर को आवे ॥५॥ उस रात्रि में वहाँ रहकर दूसरी रात्रि में ब्रह्मचारि साम्पद् करे ॥६॥