भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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४० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ष्टीनां भवन्ति ॥३२॥ दर्भाणामुपोलवानां चत्वारः ॥३३॥ तं व्यतिषक्तमष्टावरमिध्मं सात्रिकेऽग्नावाधायाज्येना- भिजुहुयात् ॥३४॥ धूमं नियच्छेत् ॥३५॥ लेपं प्राश्नीयात् ॥३६॥ तमु चेन्न विन्देदथ सत्रस्यायतने यज्ञायतनमिव कृत्वा ॥३७॥ समुद्र इत्याचक्षते कर्म ॥३८॥१॥१८॥ अम्बयो यन्ति शम्भुमयोभुभ्यां ब्रह्म जज्ञानमा गाव एका च म इति गा लवणं पाययत्युपतापिनीः ॥१॥ प्रजननकामाः ॥२॥ प्रपामवरुणद्धि ॥३॥ सं सं स्रव- न्त्विति नाड्याभ्यामुदकमाहरतः सर्वत उपासेचम् ॥४॥ तस्मिन् मैश्रधान्यं श्रुतमश्नाति ॥५॥ मन्थं वा दधिमधु- प्रकार आठ ऊपर करके "ब्रह्मजज्ञानेन सहस्रधारेण" मंत्र से आज्य की आहुति देवे ॥३२॥३३॥३४॥ आज्य होम के अनन्तर तांत्रिकाग्नि का धूम भक्षण करे ॥३५॥ पलाश के डांड में से अग्नि के संयोग से "सिलि सिलिनः" इस मंत्र को पढ़कर प्राशन करे ॥३६॥ सात्रिक अग्नि का प्रणयन या यज्ञ स्थान में यह कार्य करे । इस कर्म का फल धन, धान्य, लक्ष्मी, पुत्र, यश, मेधा, धर्म, आयु, बल, प्रजा, सम्पत्, ग्राम, कूपादि की प्राप्ति होती है । इसलिये इस कर्म का नाम समुद्रकर्म है ॥३७॥३८॥१॥१८॥ यह अठारहवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥१८॥ “अम्बयो यन्ति, शम्भुमयोभुभ्यां ब्रह्मजज्ञानमागावएकाचमे” ० इत्यादि मंत्रों से गौओं को लवण पान करावे-इससे सारे रोग छूट कर गौयें हृष्ट पुष्ट हो जाती हैं-परन्तु स्मरण रहे कि लवण देने पर थोड़ा जल भी पीने को न देवे ॥१॥ गौओं को हृष्ट पुष्ट अच्छे बच्चे नीरोग हों ऐसी कामनावाले गौ को लवण तो खवावे परन्तु उसे थोड़ा जल भी पीने को न देवें ॥ गौओं को बहुत दूध होवे, रोग रहित रहें, ज्वर, गण्डमालादि रोगों में और गर्भ रहने के लिये यह कर्म होता है ॥ ॥२॥ तड़ाग को रोक कर तब गौओं को जल पिलावे ॥३॥ सब ही प्रयो- जन के लिये पुष्टि कर्मों को कहते हैं । दो नदियों के जल को लाकर उससे सब ओर उपसेचन करे ॥ ४ ॥ उस जल से दूध में मैश्रधान्य को पकाकर खावे ॥ ५॥ या मन्थ ( दधि मधु मिला ) खावे ॥ ६ ॥