भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ४१ मिश्रम् ॥ ६ ॥ यस्य श्रियं कामयते ततो व्रीह्याज्यपय आहार्य क्षीरौदनमश्नाति ॥ ७ ॥ तदलाभे हरितगो- मयमाहार्य शोषयित्वा त्रिवृति गोमयपरिचये शृतम- श्नाति ॥ ८ ॥ शेरभकेति सामुद्रमप्सु कर्म व्याख्यातम् ॥ ९ ॥ अनपहृतधाना लोहिताजाया द्रप्सेन संनीया- श्नाति ॥१०॥ एतावदुपैति ॥११॥ तृणानां ग्रन्थीनुद्ग- थ्नन्नपक्रामति ॥१२॥ तानुदाव्रजन्नुदपात्रस्योदपात्रेणा- भिप्लावयति मुखं विमार्ष्टि ॥१३॥ एह यन्तु पशवः सं वो गोष्ठेन प्रजावतीः प्रजापतिरिति गोष्ठकर्माणि ॥१४॥ गृष्टेः पीयूषं श्लेष्ममिश्रमश्नाति ॥१५॥ गां ददाति ॥१६॥ उदपात्रं निनयति ॥१७॥ समुह्य सव्येनाधिष्ठायार्धं दक्षि- जिस धनी के धन को हरण करना चाहे उसके घर से व्रीहि, आज्य, दूध किसी प्रकार लावे और उसमें क्षीरौदन पकाकर खावे ॥ ७ ॥ यदि ऐसा न कर सके तो, गीला गोबर लाकर सुखा लेवें और उसको एकत्र कर उसे पकाकर खावे ॥८॥ यह पुष्टि कर्म समुद्र जल में किया जाता है। शापैटक को लीपकर जल में निविध कर उस पर अग्नि का प्रणयन कर “शेरभक०” इत्यादि सूक्त से भात को सम्पातन और अभिमंत्रण कर खावे ॥ ९ ॥ बिन टुकड़े किये हुए जौओं को लावा भून कर उसको लाल बकरी के दूध के मट्ठे के साथ मिलाकर खावे ॥ १० ॥ समुद्र जल से इस कर्म को-इस परिमाण से करे ॥११॥ तृणों को एकत्र कर उनमें गांठे देकर उन पर वधू को चलावे ॥१२॥ उन गांठे हुए तृणों को लेकर जल में जाकर जलपात्र को जल में प्रवाहित करे और अपने मुख को जल से मार्जन करे ॥ १३ ॥ “एह यन्तु०” इत्यादि मंत्रों से वक्ष्यमाण गोष्ठ कर्मों को करे ॥१४॥ दूसरी बार ब्याई हुई गौ के पहिले दिन के दूध का नाम पीयूष है॥ इस पीयूष को गौके मुँह के लार को मिलाकर खावे ॥१५॥ ब्राह्मण को गौ देवे ॥१६॥ जलपात्र को अभिमंत्रण कर उसको गोशाला में लावे ॥१७॥ गौ गृह के भीतर—स्थान को पञ्च भूसंस्कार करके गोशाला में धूलि को ढेर किये हुए के आधे भाग को दक्षिण ६