कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
पृष्ठ 74, कुल 361 में से
संदर्भ में पढ़ें४२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । णेन विक्षिपति ॥१८॥ सारूपवत्से शकृत्पिण्डान् गुग्गु- ललवणे प्रतिनीय पश्चादग्नेर्निखनति ॥१९॥ तिसृणां प्रातरश्नाति ॥२०॥ विकृते संपन्नम् ॥२१॥ आयमगन्नयं प्रतिसरोऽयं मे वरणोऽरातीयोरिति मन्त्रोक्तान् वासि- तान् बध्नाति ॥२२॥ उत्तमस्य चतुरो जातरूपशकलेनानु- सूत्रं गमयित्वावभुज्य त्रैधं पर्यस्यति ॥२३॥ एतमिध्ममि- त्युपसमाधाय ॥२४॥ तमिमं देवता इति वासितमुल्लुप्य ब्रह्मणा तेजसेति बध्नाति ॥२५॥ उत्तमो असीति मंत्रोक्तम् दिशा में फेक देवे ॥१८॥ सारूपवत्सवाली गौ के गोबर-पिण्डों को, गुग्गुल लवण में लाकर अग्नि के पश्चिम भाग में गाड़ देवे ॥१९॥ तीन रात बीत जाने पर प्रातःकाल उसे उखाड़ कर खावे ॥२०॥ और भूमि में गाड़े हुए पीयूष को निकालने पर वह तय्यार हुआ कि नहीं इसकी परीक्षा-उसका गन्ध, स्वाद, और रूप की देखभाल चखकर जानना । क्योंकि विकार रहित होने ही से यह ठीक हुआ समझना चाहिये ॥२१॥ “आयमग्न०” इत्यादि मंत्र से मणि द्रव्यों को मंत्रों से अभिमंत्रण कर वासित करके त्रयोदशी आदि नियमों से वासित मणियों को “पुष्टिफ- लत्वं मह्यं ददतु पुष्टये ।” “अयमागन्न०” से पलाशमणि, आदि वृक्षोंके “अयं प्रतिसर ।” “अयं मे वरण” से वरण, आडे खादिर, चिबुका ( मुचु- कुन्दवृक्ष ) ॥ उक्त मणि के सोने की ४ माला लाइ के साथ गांधने के योग्य करके टेढा करके एक २ माला को तीन २ बार लपेट कर बगल में सब तरफ लोहे के मोटे पत्तर से एक सौ दक्षिण सुवर्ण सूत्र करे ॥ ॥ तात्पर्य यह है कि यह प्रकरण सब कामनाओं की सिद्धि हेतु सर्व- काममणि शान्ति कहाता है ॥ पलाश मणि को तीन बार वासित करके डालकर अभिमंत्रण कर त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावास्या इन तीन तिथियों में दही, मधु में वासना देकर मणि को धारण करे ॥ २२ ॥ ॥ २३ ॥, “एतमिध्मम्०” से उपसमाधान करके “तमिमं देवता०” से मणि को छेदकर “ब्रह्मणा तेजसा०” से अपने उत्तमाङ्ग में बान्धे ॥ २४ ॥ ॥ २५ ॥ “उत्तमो अस्योषधीनां तव वृक्षा०” से जिस द्रव्य का⁻