भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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॥२६॥ अक्षितास्त इति यवमणिम् ॥२७॥ प्रथमा ह व्युवास सेत्यष्टक्याया वपां सर्वेण सूक्तेन त्रिर्जुहोति ॥२८॥ समवत्तानां स्थालीपाकस्य ॥२९॥ सहहुतानाज्य- मिश्रान्हुत्वा पश्चादग्नेर्वाग्यतः संविशति ॥३०॥ महा- भूतानां कीर्तयन् संजीहिते ॥३१॥२॥१९॥ सीरा युञ्जन्तीति युगलाङ्गलं प्रतनोति ॥१॥ दक्षिण- मुष्टारं प्रथमं युनक्ति ॥२॥ एहि पूर्णकेत्युत्तरम् ॥३॥ कीनाशा इतरान् ॥४॥ अश्विना फालं कल्पयतामुपावतु मणि हो उसी को इस मंत्र से बान्धे ॥२६॥ “अक्षितास्त०” से यव मणि को बान्धे ॥ २७॥ माघ मास की अष्टका में पूर्वाह्न समय यज्ञोपवीती होकर यज्ञशाला निवेशन के लिये पञ्च भूसंस्कार करके उपवास रहकर भात खाकर स्नानकर अखण्ड नये वस्त्र को पहन ओढ़- कर-रात्रि में प्रयोग करे अर्थात् वश्य तन्त्रानुसार पाकयज्ञ विधान से धान आदि को पकाकर आज्यभागान्त होम करके अग्नि के पूर्वभाग में पश्चिम में गौ को धरे ॥ अग्नि के पश्चिम भाग में पूर्व मुख बैठ कर अन्वारब्ध हुआ शान्त्युदक करे ॥ “प्रथमा ह व्युवास स०” इत्यादि सम्पूर्ण सूक्त से घी की आहुति देवे ॥ सूक्त को तीन बार पढ़कर आहुतियां करे । इसके अनन्तर मांस होम में “प्रथमा ह व्युवास स०” इत्यादि सम्पूर्ण सूक्त से तीन बार आहुतियां देवे ॥ फिर ‘प्रथमा ह व्युवास०” सम्पूर्ण सूक्त से स्थालीपाक की आहुति देवे ॥२९॥ सह हवन क्रियों के साथ आज्य मिला आहुति देकर अग्नि के पश्चिम भाग में वाक् संयम कर बैठे ॥३०॥ महाभूतों ( पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश ) के गुणों के वर्णन करता रहे, जिससे नीन्द न आवे ॥३१॥२॥१९॥ यह उन्नीसवी कंडिका पूरी हुई ॥१९॥ “सीरायुञ्जन्ति०” इत्यादि से कर्त्ता हलके दहिने भाग मे और “उष्टारं प्रजन- यितारं०” मंत्र पढ़कर दाहिने युग धुरि में । उत्तरां युगं धुरि सेक्तारमेव “एहि पूर्णक०” से वाम भाग में बैल जोते। “युनक्तसीरावियुगातनोत०” को पढ़कर जोतने वाले से कहे कि तुम खेत जोतो और अलग २ सीरोरे कर जोतो' ऐसा कहने पर कर्षक खेत जोते ॥१॥२॥३॥४॥ “अश्विना