भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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पृष्ठ 88

५६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । मति ॥ ६ ॥ विद्या शरस्येति प्रमेहणं बध्नाति ॥ १० ॥ आखुकिरिपूतीकमथितजरत्प्रमन्दसावस्कान् पाययति ॥ ११ ॥ उत्तमाभ्यामास्थापयति ॥ १२ ॥ यानमारो- हयति ॥१३॥ इषुं विसृजति ॥१४॥ वस्तिं विष्यति ॥१५॥ वर्त्तिं बिभैति ॥ १६ ॥ एकविंशतिं यवान् दोहन्यामद्भि- रानीय द्रुघनीं जघने संस्तभ्य फलतोऽवसिञ्चति ॥ १७ ॥ आलबिसोलं फाण्टं पाययति ॥ १८ ॥ उदावर्तिने च ॥१९॥ अम्बयो यन्ति वायोः पूत इति च शान्ताः ॥२०॥ मूत्र एवं मल के अवरोधमें “विद्या शरस्य०” से हरीतकी या कपूर को सम्पातन कर अभिमंत्रितकरके बान्धे ॥ मूत्र और पुरीष के रुकाव में हरें आदि रेचक दवा नाभि के नीचे उपस्थेन्द्रिय के ऊपर छः अङ्गुल पर बान्धे अर्थात् अपान या शिश्न या ब्रह्ममुख को अतिसारी फुकवावे ॥८॥९॥१०॥ “विषितां तेऽस्ति बिलं०” इत्यादि दो ऋचाओं को मूस्त की फेकी मट्टी के ऊपर बैठ कर जप करे । तृण पर बैठकर अभिमंत्रण करे । वस्ति बिलमुख का अभिमंत्रण करे । ( पुराने काठ के चीरने से जो बुरादा गिरता है उसको तक्ष कहते हैं । ) काठ को तक्ष के शकलों पर, दधि मथित पर बैठ कर अभिमंत्रण करे । पुराने प्रमन्द पर बैठकर अभिमंत्रण करे । और काठ के तक्ष के शकलों पर रोगी को बैठा कर अभिमंत्रण करे । मूत्रादि के रुकावट में “मूत्रं मुच्यताम्” पढ़कर अभिमंत्रण करे ॥११॥१२॥ रोगी को घोड़े आदि के रथों पर सवार करावे ॥१३॥ रोगी बाण छोड़े ॥१४॥ शरशिश्न को अभिमंत्रण करके शिश्न को चमड़े से बाहर करे ॥१५॥ लोह शलाका को “प्रते भिनद्मि मेहनं०” इत्यादि से अभिमंत्रित कर शिश्न में उसे पैठावे और मूत्र के प्रवाह को खोल देवे ॥१६॥ “विद्या शरस्य०” द्वितीय सूक्त से जघन में शिश्न देश में उपर को करके गो- दोहनी में जल भर कर उसमें २१ जौ डालकर उस जल से धनुष पर फल धर कर उसको जल सेक करे, सूक्त जपकर जिस प्रकार जल शिश्न में जावे वैसा करे ॥१७॥ गोधूम पञ्चमूल, कस्तूरिका इनका काथ करके अभिमंत्रित कर रोगी को पिलावे ॥१८॥ उदावर्त्त के रोगी को प्रमेहण आदि पूर्वोक्त सबही कर्म्म होंगे ॥१९॥ सर्वरोग भैषज्य को कहेंगे । प्रथम