भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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पृष्ठ 89

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ५७ उत्तरस्य ससोमाः॥२१॥ चातनानामपनोदनेन व्याख्या- तम् ॥२२॥ त्रपुसमुसलखदिरतार्ष्टाघानामादधाति ॥२३॥ अयुग्मान् खादिराञ्छङ्कनक्ष्यौ निविध्येति पश्चादग्नेः समं भूमि निहन्ति ॥ २४ ॥ एवमायसलोहान् ॥ २५ ॥ तप्त- शर्कराभिः शयनं राशिपल्यानि परिकिरति ॥ २६ ॥ अमावास्यायां सकृद्गृहीतान्यवाननपहतानप्रतीहार- पिष्टानाभिचारिकंपरिस्तीर्य तार्ष्टाघेध्म आवपति ॥२७॥ य आगच्छेत्तं ब्रूयाच्छणशुल्बेन जिह्वां निर्मृजानः शा- लायाः प्रस्कन्देति ॥ २८ ॥ तथा कुर्वन्नाद्ये ह्वाने ॥२९॥ वीरणतूलमिश्रमिङ्गिडं प्रपुटे जुहोति ॥३०॥ इध्माबर्हिः अभ्यातानान्त करके “अम्बयो यन्ति वायोः पूत०” इस सूक्त से आज्य की आहुतियां देवे और पलाश उदुम्बरादि काठों की समिधों का आधान करे ॥२०॥ अब सोम भक्षण में भैषज्य को कहते हैं ॥ सोम- पवन, सोमरसायन, सोमयान, सोम के अभिषव में और सोमविषय में जो रोग उत्पन्न होता है ॥२१॥ चातनों के अपनोदन के साथ पूर्व में कहा गया जानो ॥२२॥ कर्कटीवृक्ष, मुसल, खैर, सर्षप के डांट का इध्म, इनकी आहुति करने से पिशाच भाग जाता है ॥२३॥ खैर की १२ अंगुल की ७ या नौ शङ्कु को अग्नि के पश्चिम भाग में “अक्ष्यौ निविध्य” इत्यादि से गाड़े । इसी प्रकार लोहे के कीलों को अग्नि के पश्चिम भाग में समभूमि में उक्त मंत्र से गाड़े ॥२४ ॥२५॥ तप्त शर्कराओं को और धान्य के पोआड को पिशाच ग्रस्त रोगी के शयन स्थान के चारो ओर विखेर देवे ॥२६॥ और अमावश्या को अभ्यातानान्त होम करके शरमय कुश का स्तरण करके सर्षप के इध्मों का आधान करे और एकही बार में सत्तू को लेकर आहुति देवे । इस मन्त्र में यवराशि के मध्य से एक मुट्ठी लेकर उलूखल में कूट २ कर पीस लेवे तब रोगी को नीचे लेटाकर शणसूत्र से उसके जीभ का मार्जन करे । इस पर अग्निदेव आवेंगे उनसे पूछे कि ग्रहमुक्त हुआ ? वीरिण के रुई मिली इङ्गुड को पलाश के पत्ते में धरकर हवन करे ॥३०॥ और इसके पूर्व दिन इध्म और कुश शाला में रक्खे.