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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ५७ उत्तरस्य ससोमाः॥२१॥ चातनानामपनोदनेन व्याख्या- तम् ॥२२॥ त्रपुसमुसलखदिरतार्ष्टाघानामादधाति ॥२३॥ अयुग्मान् खादिराञ्छङ्कनक्ष्यौ निविध्येति पश्चादग्नेः समं भूमि निहन्ति ॥ २४ ॥ एवमायसलोहान् ॥ २५ ॥ तप्त- शर्कराभिः शयनं राशिपल्यानि परिकिरति ॥ २६ ॥ अमावास्यायां सकृद्गृहीतान्यवाननपहतानप्रतीहार- पिष्टानाभिचारिकंपरिस्तीर्य तार्ष्टाघेध्म आवपति ॥२७॥ य आगच्छेत्तं ब्रूयाच्छणशुल्बेन जिह्वां निर्मृजानः शा- लायाः प्रस्कन्देति ॥ २८ ॥ तथा कुर्वन्नाद्ये ह्वाने ॥२९॥ वीरणतूलमिश्रमिङ्गिडं प्रपुटे जुहोति ॥३०॥ इध्माबर्हिः अभ्यातानान्त करके “अम्बयो यन्ति वायोः पूत०” इस सूक्त से आज्य की आहुतियां देवे और पलाश उदुम्बरादि काठों की समिधों का आधान करे ॥२०॥ अब सोम भक्षण में भैषज्य को कहते हैं ॥ सोम- पवन, सोमरसायन, सोमयान, सोम के अभिषव में और सोमविषय में जो रोग उत्पन्न होता है ॥२१॥ चातनों के अपनोदन के साथ पूर्व में कहा गया जानो ॥२२॥ कर्कटीवृक्ष, मुसल, खैर, सर्षप के डांट का इध्म, इनकी आहुति करने से पिशाच भाग जाता है ॥२३॥ खैर की १२ अंगुल की ७ या नौ शङ्कु को अग्नि के पश्चिम भाग में “अक्ष्यौ निविध्य” इत्यादि से गाड़े । इसी प्रकार लोहे के कीलों को अग्नि के पश्चिम भाग में समभूमि में उक्त मंत्र से गाड़े ॥२४ ॥२५॥ तप्त शर्कराओं को और धान्य के पोआड को पिशाच ग्रस्त रोगी के शयन स्थान के चारो ओर विखेर देवे ॥२६॥ और अमावश्या को अभ्यातानान्त होम करके शरमय कुश का स्तरण करके सर्षप के इध्मों का आधान करे और एकही बार में सत्तू को लेकर आहुति देवे । इस मन्त्र में यवराशि के मध्य से एक मुट्ठी लेकर उलूखल में कूट २ कर पीस लेवे तब रोगी को नीचे लेटाकर शणसूत्र से उसके जीभ का मार्जन करे । इस पर अग्निदेव आवेंगे उनसे पूछे कि ग्रहमुक्त हुआ ? वीरिण के रुई मिली इङ्गुड को पलाश के पत्ते में धरकर हवन करे ॥३०॥ और इसके पूर्व दिन इध्म और कुश शाला में रक्खे.

५८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । शालायामासजति ॥३१॥ अपरेद्युर्विकृते पिशाचतो रुजति ॥३२॥ उक्तो होमः ॥३३॥ वैश्रवणायाञ्जलिं कृत्वा जप- न्नाचमयत्यभ्युक्षति ॥३४॥ निश्युल्मुके सङ्कर्षति ॥३५॥ स्वस्त्ययनं कुरुते ॥३६॥ अयं देवानामित्येकविंशत्या दर्भ- पिञ्जूलीभिर्वलीकैः सार्धमधिशिरोऽवसिञ्चति ॥३७॥१।२५॥ जरायुज इति मेदो मधु सर्पिस्तैलं पाययति ॥ १ ॥ मौञ्जप्रश्नेन शिरस्यपिहितः सव्येन तितउनि पूल्यानि ॥३१॥ दूसरे दिन धरी हुई विकृत होजाने पर पिशाच गृहीत व्यक्ति को पीड़ा होगी ॥३२॥ इससे जानना कि पिशाच अबही नहीं गया है। तो पूर्वोक्त वीरणतूलादि उसे उसी भाँति करे जब तक पिशाच न छोड़े ॥३३॥ कुबेरदेव के लिये हाथ जोड़कर मंत्र जपता हुआ आचमन करके रोगी को जलसे अभ्युक्षण करे ॥३४॥ रात्रि में उल्मुक को अभिमंत्रण करे परस्पर दो उल्मुकों को घसे ॥३५॥ और रात्रि में स्वस्त्ययन गण के मंत्रों “अमूपारे पातं न०” इत्यादि सूक्तका पाठ करे ॥३६॥ और “देवानाम्” इत्यादि मंत्र से २१ (तीन कुशों को एकत्र लपेट कर बान्धने से पिञ्जुली होती है।) दर्भ पिञ्जुलियों से वलीकों के द्वारा रोगी के शिर से पैर तक सर्वाङ्ग को अव सेचन करे। जलोदरक रोगी की दवा—घड़े में दर्भ पिञ्जुली डालकर २१ घर के छप्पर के ओलती के तृणों को डालकर उस घड़े को अभिमंत्रित कर के तब रोगी को सिंचन कर मार्जन करे ॥ ॥३७॥१॥२५॥ यह पचीसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥ २५ ॥ अब वात, पित्त, कफ के दवाओं का उपदेश करेंगे ॥ “जरायुज” इत्यादि सूक्त ( तक्म नाशन गण ) मेद्, मधु, घी, तैल को अभिमंत्रित करके वात विकार रोगी को मांस और मेद् को पिलावे। और मधुको अभिमंत्रित करके कफ के रोगी को पिलावे। घृत को अभिमंत्रित करके वात पित्त के रोगी को पिलावे। और वात, कफ के रोगी को तेल पिलावे ॥१॥ अब अतिकास, शिर की पीड़ा इन रोगों की दवा का वर्णन करते हैं ॥ रोगी के शिर में मूँज की पगड़ी पहिना देवे एवं वाम हाथ से छलनी, लाजा को धारण करता हुआ दहिने हाथ से वपन को लाजा सहित “जरायुज०” इस सूक्त से लाजा को व्याधि देश तक (जिस स्थान

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ५९

धारयमाणो दक्षिणेनावकिरन्व्रजति ॥२॥ सव्येन तितउ- प्रश्नौ दक्षिणेन ज्यां द्रुघ्नीम् ॥३॥ प्रैषकृदग्रतः ॥४॥ यत्रैनं व्याधिर्गृह्णाति तत्र तितउप्रश्नी निदधाति ॥ ५ ॥ ज्यां च ॥६॥ आव्रजनम् ॥७॥ घृतं नस्तः ॥८॥ पञ्चपर्वणा ललाटं संस्तभ्य जपत्यमूर्या इति ॥ ९ ॥ पञ्चपर्वणा पांसुसिक्त- ताभिः परिकिरति ॥१०॥ अर्मकपालिकां बध्नाति ॥११॥ पाययति ॥१२॥ चतुर्भिर्दूर्वाग्रैर्दधिपललं पाययति ॥१३॥ अनुसूर्यमिति मन्त्रोक्तस्य लोममिश्रमाचमयति ॥ १४ ॥ पृष्ठे चानीय ॥ १५ ॥ शङ्कुधानं चर्मण्यासीनाय दुग्धे में रोग पैदा हुआ हो) छींटे ॥ इसी प्रकार बायें हाथ से छलनी और मुंजकी पगड़ी को धारण करता हुआ (कर्ता) दहिने हाथ धनुष को ॥३॥ प्रैषकृत हो आगे २ चले ॥४॥ चलता हुआ जहाँ रोग अच्छा हो जावे वहाँ पर छलनी, मुंज की पगड़ी और धनुष को धर देवे । जहाँ जाना बन्द हो जावे अर्थात् रोगी को आगे कर के जिस स्थान में रोग उत्पन्न हुआ हो वहाँ जाकर "जरायुज०" सूक्त पढ़कर मुंज की पगड़ी वपन कर देवे ॥ एवं धनुष को तूष्णीं छोड़ देवे । वात ज्वर, कटिभङ्ग, शिरो रोग, वात गुल्म, वात विकार, सब ही वात की बीमारी में यह दवा काम करेगी । शिर की बीमारी में घी को अभिमंत्रित कर रोगी के नाक में नस्य देवे ॥८॥ "जरा युज०" इत्यादि सूक्त से पाँच गिरह वाले डंडे को अभिमंत्रित करके रोगी के ललाट में लगा कर खड़ा कर "अमूर्या" इत्यादि का जप करे । शिरो रोग, कटिभङ्ग या वात गुल्म में रोगों की दवा समाप्त हुई ॥९॥ शरीरमें किसी स्थान से या शरीर के बाहर रुधिर स्राव हो उसकी दवा-पाँच गाठ वाले बांस के दण्डे को रुधिर वहन स्थान में लगाकर "अमूर्या" सूक्त का जप करे और गली की धूलि को लेकर उसे अभिमंत्रित कर रुधिर व्रण में डाले और केदार की सूखी मट्टी को उक्त मंत्र से अभिमंत्रित कर रुधिर स्थान में बांधे ॥ ११ ॥ और इसी को पिलावे ॥ १२ ॥ एवं चार दूर्वा के अग्रभाग से दधि पललको पूर्वोक्त मंत्र से अभिमंत्रित कर रोगी को पिलावे ॥ १३ ॥ लाल वर्ण की गौ के रोम जल में मिला कर उससे आचमन करे ॥१४॥ (हृद् रोग की

६० | अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।

सम्पातवन्तं बध्नाति ॥१६॥ पाययति ॥१७॥ हरिद्रौदन- भुक्तमुच्छिष्टानुच्छिष्टेनाप्रपदात्प्रलिप्य मन्त्रोक्तानध- 'स्तल्पे हरितसूत्रेण सव्यजङ्घासु बद्धावस्नापयति ॥ १८ ॥ प्रपादयति ॥ १९ ॥ वदत उपस्थापयति ॥ २० ॥ क्रोड्लोमानि जतुना संदिह्य जातेरूपेणापिधाप्य ॥२१॥ नक्तं जाता सुपर्णो जात इति मन्त्रोक्तं शकृदा लोहितं प्रघृष्यालिम्पति ॥२२॥ पलितान्याच्छिद्य ॥२३॥ मारुता-

दवा है) गौ के पीठ पर जल धर कर उससे आचमन करे ॥१५॥ चमड़े को विस्तार करने के लिये शंकु स्थापन करे ( चमड़े में शङ्कु गाड़ देवे ) उस पर बैठे रोगी को दूध को चलाता हुआ शङ्कु को रोगी के शरीर में बाँध देवे और दूध उस रोगी को पिला देवे ॥ १६ ॥ १७ ॥ हल्दी में मिला पकाये हुए भात को रोगी को खाने को देकर उसका बचा हुआ उच्छिष्ट और अनुच्छिष्ट को इकट्ठा करके उसका उबटन बना कर रोगी के शिर से लेकर पैर तक उबटन लगा कर उस को खाट पर लेटा देवे । शुका, काष्ठमुसुक, और गोपीतिलका इन पक्षियों को वाम जंघा में हरे रंग के सूत से बाँध कर खाट के नीचे बान्ध देवे ॥ यह मिर्गी की दवा है। और जल से अभिमन्त्रित करके रोगी को स्नान करावे ॥१८॥ मन्थ को अभिमंत्रण करके उसे खाने को देवे ॥ सर्वत्र घर के द्वार पर आगे रोगी को करके और उसे आगे प्रवेश करा कर और स्वयं प्रवेश कर के तब भात को अभिमंत्रण कर रोगी के लिये खाने को दिया करे । जहाँ २ "प्रयच्छति" शब्द से कहा गया है वहाँ २ इसी प्रकार करे । "अनु सूर्य०" सूक्त से सूखे चन्दन को अभिमंत्रण करके गोपीतिलका को जिस किसी में कहती हुई को देखे वहाँ उस रोगी को अभिमंत्रण करे ॥ २० ॥ वृषभ के लोमों से सोने को लपेट कर धरे और उसे अभि- मंत्रण कर के रोगी के वास्ते बान्ध देवे ॥ अपस्मार, विस्मय, हृद् रोग, कामला, रोहिणक रोगों का भेषज्य समाप्त हुआ ॥ २१ ॥ अब श्वेत कुष्ठ रोग के भेषज्य को कहते हैं। श्वेत कुष्ठ को गोबर से घस कर जब तक उस में से रुधिर बाहर न हो उसको घसे, रुधिर निकलने पर भृङ्गराज ( भङ्गरिया ), हल्दी, इन्द्र वारुणी, नीलिका और पुष्पा इन पाँचो को

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ६१ न्यपिहितः ॥२४॥ यदग्निरिति परशुं जपंस्तापयति क्वाथयत्यवसिञ्चति ॥२५॥ उप प्रागादित्युद्वीजमानस्य शुक्लप्रसूनस्य वीरणस्य चतसृणामिषीकाणामुभयतः प्रत्युष्टं बध्नाति ॥२६॥ त्रिविदग्धं काण्डमणिम् ॥२७॥ उल्मुके स्वस्त्यायम् ॥२८॥ मातृनाम्नोः सर्वसुरभिचू- र्णान्यन्वक्तानि हुत्वा शेषेण प्रलिम्पति ॥२९॥ चतुष्पथे च शिरसि दर्भेण्डेऽङ्गारकपालेऽन्वक्तानि ॥३०॥ तितउनि प्रतीपं गाहमानो वपतीत्तरोऽवसिञ्चति पश्चात् ॥३१॥ पीस कर कुष्ठ को लेप करे ॥ २२ ॥ पलित को काट २ कर उसे घस कर तब उस पर लेप करे ॥ २३ ॥ और “समुत्पतन्तु प्रनभस्व०” इत्यादि का जप करे ॥ २४ ॥ अब ज्वर के भैषज्य को कहते हैं । नित्य ज्वर, वेला ज्वर, सतत ज्वर, एकांतरित ज्वर, चातुर्थिक ज्वर, और ऋतुज्वर में “यदग्निः” इस तक्मनाशन सूक्त से परशु को गर्म कर क्वाथ बनावे और उस गर्म जल से रोगी को अवसिंचन करे ॥२५॥ जो घबड़ाता हुआ निष्कारण डरता हो, और श्वेत कुष्ठ का रोगी-शरपत के चार इषीकाके अग्र भाग को मणि के आकार बना कर उनको तीन स्थानों में जलाकर उस मणि को रोगी को बान्ध देवे और उस काण्ड मणि को रात्रि में “उप प्रागात्” सूक्तसे दो उल्मुकों को अभिमंत्रण करके घर्षण करे फिर प्रातःकाल “स्वस्तिदा” सूक्त से दक्षिण पग को आगे कर चले । यह स्वस्त्ययन कर्म्म है ॥ बालक, युवा, स्त्री, पुरुषों को अकस्मत् उद्वेग हो जाने पर या प्रलाप करे तो यह कर्म करे ॥२६॥२७॥२८ ॥ गन्धर्व, राक्षस, अप्सरा, भूत और ग्रहादि के उपद्रवों का भैषज्य कहते हैं ॥ “मातृगण” सूक्त से सर्वौषधि के चूर्ण अन्वक्त कर आहुति करके शेष से रोगी को लेप करे ॥ २९ ॥ और चौराहे पर रोगी के शिर पर दर्भ- इन्दुक को धर कर उस पर खप्पर में अग्नि भर कर अग्नि को जला कर तब प्रज्वलित अग्नि में घी चपोड़ी हुई सर्वौषधि की आहुति करे ॥३०॥ रोगी की वल्लणिका को सर्वौषधि सहित हाथ में धर कर नदी सम्मुख हो छलनी में सर्वौषधि चूर्ण को विलोडन करता हुआ वपन करे और उसके पीछे दूसरा कोई रोगी को सूक्त जपता हुआ

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आमपात्र ओप्यासिच्य मौञ्जे त्रिपादे वयोनिद्वे- शाने प्रबध्नाति ॥ ३२ ॥ अघद्विष्टा शं नो देवी वरणः पिप्पली विद्रधस्य या बभ्रव इति ॥ ३३॥ उपोत्तमेन पला- शस्य चतुरङ्गुलेनालिम्पति ॥३४॥ प्रथमेन मन्त्रोक्तं बध्नाति ॥३५॥ द्वितीयेन मन्त्रोक्तस्य सम्पातवतानुलिम्पति ॥३६॥ तृतीयेन मन्त्रोक्तं बध्नाति ॥३७॥ चतुर्थेनाशयति ॥३८॥ पञ्चमेन वरुणगृहीतस्य मूर्धिन सम्पातानानयति ॥३९॥ उत्तमेन शाकलम् ॥४०॥ उद्गातामित्याप्लावयति बहिः जल से सेक करे ॥ ३१ ॥ कच्चे मिट्टी के पात्र में उक्त शेष चूर्ण को डालकर और लीप कर मूँज के शिक्य में धर कर मातृ नामक दो सूक्तों में से किसी एक सूक्त का जप करता हुआ पक्षी के घोसले में बान्ध देवे ॥३२॥ [

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ६३

॥४१॥ अपेयमिति व्युच्छन्त्याम् ॥४२॥ बभ्रोरिति मन्त्रोक्तमाकृतिलोष्टवल्मीकौ परिलिख्य जीवकोषण्या- मुत्सीव्य बध्नाति ॥४३॥२॥२६॥ नमस्ते लाङ्गलेभ्य इति सीरयोगमधिशिरोऽवसि- ञ्चति ॥१॥ नमः सनिस्स्रासेभ्य इति शून्यशालायामप्सु सम्पातानानयति ॥२॥ उत्तरं जरत्खाते सशालतृणे॥३॥ तस्मिन्नाचामयन्त्याप्लावयति ॥ ४ ॥ दशवृक्षेति शाकलः ॥ ५ ॥ दश सुहृदो जपन्तोऽभिमृशन्ति ॥ ६ ॥ क्षेत्रिया- त्त्वेति चतुष्पथे काम्पीलशकलैः पर्वसु बद्धा पिञ्जूली- मणि बनाकर पहने या बान्धे ॥३३-४०॥ अब क्षेत्रिय (कुल परम्परा से होने वाले रोग) रोगों के भैषज्य को कहते हैं ॥ “उद्गाताम्” तक्म- नाशन गण के मंत्र से घर के बाहर प्रातः काल उषः काल में क्षेत्रिय (कोढ़, क्षय रोग, संग्रहणी आदि) रोगी को स्नान करावे और “बभ्रोर- र्जुन काण्डस्य०” इन तीन ऋचा से अर्जुन काठ को, जौके भूसा, तिल- पिञ्जिका, आकृति लोष्ट, वल्मीक इन को भली-भाँति चूर्ण करके जीते पशु के चर्माङ्गस्थलिका में डालकर सूई से उसे सी करके रोगी को बान्ध देवे ॥ ४१।४२।४३ ॥ यह छब्बीसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥२६॥ क्षेत्रिय रोगी को हलयुक्तबैलों द्वारा शिरपर “नमस्ते लाङ्गलेभ्य०” से जलपात्र से अवसेचन करे ॥ १ ॥ शून्य घर में पुराने गर्त में घरके छप्पर की ओलनी के खर्रों को डाल कर उत्तर सम्पातों को “नमः स- निस्रसा०” मंत्र से लावे ॥२॥ रोगी को उस पुराने गर्त में खड़े कर देवे एवं सम्पातोदक से उसे आचमन करावे और स्नान करा देवे ॥३॥४॥ क्षेत्रिय रोग के भैषज्य की समाप्ति हुई ॥ अब ब्रह्मग्रह के भैषज्य को कहते हैं ॥ तक्म नाशन गण “दशवृक्ष०” इस सूक्त से दश शान्त वृक्षों के शकलों को लेकर लाख एवं सोने से वेष्टित मणि बना कर दश मित्र मिल- कर इस सूक्त का जप करें और पिशाच गृहीत को अभिमर्शन करे ॥६॥ फिर क्षेत्रिय रोगी के भैषज्य को कहते हैं । क्षेत्रिय रोगी को चौराहे पर लेजाकर काम्पील शकलों से गांठों में बान्धकर “क्षेत्रियात्त्वा०” इस

६४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।

भिराप्लावयति ॥७॥ अवसिञ्चति ॥८॥ पार्थिवस्येत्युद्यति पृष्ठसंहितावुपवेशयति ॥९॥ प्राङ्मुखं व्याधितं प्रत्यङ्मु- खमव्याधितं शाखासूपवेश्य वैतसे चमसे उपमन्थ- नीभ्यां तृष्णागृहीतस्य शिरसि मन्थमुपमथ्यातृषि- ताय प्रयच्छति ॥ १०॥ तस्मिंस्तृष्णां संनयति ॥ ११ ॥ उद्धृतमुदकं पाययति ॥ १२ ॥ सवासिनाविति मंत्रो- क्तम् ॥ १३ ॥ इन्द्रस्य या महीति खल्वञ्जान्लाण्डून् हननान् घृतमिश्राञ्जुहोति ॥१४॥ बालान्कल्माषे काण्डे सव्यं परिवेष्ट्य संभिनत्ति ॥ १५ ॥ प्रतपति ॥ १६ ॥ आदधाति ॥१७॥ सव्येन दक्षिणामुखः पांसून्नुपमथ्य परि- किरति ॥१८॥ संमृद्नाति ॥१९॥ आदधाति ॥२०॥ उद्य- सूक्त से कुश पिञ्जली से रोगी को नहवावे ॥७॥ या अवसिञ्चन करे ॥ ८॥ भगवान् सूर्य का उदय रहते क्षेत्रिय तथा उदक तृष्णार्त रोगी को एक पीछे दूसरे को इस भाँति बैठावे ॥ ९॥ पूर्व मुख रोगी को एवं पश्चिम मुख निरोगी को बेत की शाखाओं पर बिठलाकर चमसे में सत्तू धर कर उस में जल छोड़ देवे और दोनों उप मन्थनियों द्वारा तृष्णा गृहीत के शिर पर मन्थ को मथन करके तृष्णा रहित रोगी को तृष्णा को संक्रमण करावे ॥ १०॥ ११॥ कूप से निकले जलको उसे पिलावे ॥ १२॥ "सवासिनौ०" इस सूक्त से मन्थ घट को अभिमंत्रण करके पिलावे । रोगी और रोग रहित दोनों एकही प्रकार के वस्त्र पहने हुए हों ॥ १३ ॥ अरुषी, उदर, गण्डुलक के भैषज्य को कहते हैं । "इन्द्र- स्य या मही०" इस सूक्त से काले चणों को घी में मिलाकर आहुति देवे, गोवाल से चित्रित शर मध्य को लपेट कर पत्थर से चूर्ण कर अग्नि में तपावे, तब सूक्त के अन्त में अग्नि में आधान करे । वाम हाथ में धूलि लेवे और दहिने हाथ से मार्जन करके दक्षिण मुँह हो सूक्त को जप करके रोगी के ऊपर छीटे । यह अरुषी गण्डुलक के भैषज्य है ॥१४॥१५॥ १६॥१७॥१८॥ पलाश, गूलरकी समिधों का आधान करे ॥१९॥ सूर्य भग- वान् का उदय रहते "उद्यन्नादि०" सूक्त से गौ के मालिक से कहे कि 'गौ का

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ६५

नादित्य इत्युद्यति गोनामेह्याहासाविति ॥२१॥ सूक्तान्ते ते हता इति ॥२२॥ दर्भैरभ्यस्यति ॥२३॥ मध्यन्दिने च ॥ २४ ॥ प्रतीचीमपराह्णे ॥२५॥ बालस्तुकामाच्छिद्य खल्वादीनि ॥२६॥ अक्षीभ्यां त इति वोद्बहम् ॥२७॥ उदपात्रेण सम्पातवतावसिञ्चति॥२८॥ हरिणस्येति बन्धन- पायनाचमनशङ्खवानज्वालेनावनक्षत्रेऽवसिञ्चति ॥२९॥ अमितमात्रायाः सकृद्गृहीतान्यवानावपति ॥३०॥ भक्तं प्रयच्छति ॥३१॥ मुञ्चामि त्वेति ग्राम्ये पूतिशफरोभिरो- दनम् ॥३२॥ अस्थ्ये तिलशणगोमयशान्ताज्वालेनाव- नाम कहा—उत्तर में वह कहे "असौ" ( जो नाम हो ) । सूक्त के अन्त में अन्य पुरुष बोले "ते हताः" ऐसा ॥२०॥२१॥२२॥ कुशों से बार २ इसी प्रकार करे । और मध्यान्ह काल में भी करे ॥ २३ ॥ २४ ॥ घाव पर बाल, जटा ढाक देवे । और खलवादी और अलगण्डू को घी मिला- कर "उद्यन्नादित्य०" सूक्त से आहुति देवे "अक्षीभ्यां त०" सूक्त से मार्जन कर गाँठों को खोल देवे । अब सर्वव्याधि भैषज्य को कहते हैं ॥ आज्य तंत्र करके रोगी को गाँठों में बान्ध कर "अक्षीभ्यां त०" सूक्त से जलपात्र को धोकर पुनः सूक्त को जप करके रोगी को अवसेचन करे । आँख, कान, नाक, जीभ, गर्दन, राजयक्ष्मादि रोगों का भैषज्य समाप्त हुआ ॥ २५ । २६ । २७ । २८ ॥ "हिरण्यस्य०" तक्मनाशन सूक्त से हरिण के सींगमणि को बान्धे । उसी शृङ्ग में जल धर कर आचमन करे । उसी से पान करे, और हरिण के लोममणि को शङ्खुधान को मिलाकर जलावे और जल से उसे बुताकर उसी ठण्डे जल से उषः काल में क्षेत्रिय रोगी को अवसिंचन करे ॥ २९ ॥ और अपरिमित परिमाण यव राशि में से एकही बार हाथ से यव को पकड़ कर प्रत्येक ऋचा से आहुति देवे ॥३०॥ रोगी को भात खाने को देवे ॥३१॥ "मुञ्चामि त्वा०" तक्मनाशन सूक्त से ग्राम्य रोग ( मैथुन संयोग से हुए रोग ) में पूति- गन्धा मछली को भात के साथ रोगी को खाने को देवे ॥ ३२ ॥ जंगली तिल, जंगली गोबर, जंगली शण, ये शान्त ओषधियाँ हैं । इनको अभि- मंत्रण करके इससे रोगी को अवसिंचन करे। यह यक्ष्मा रोग की दवा है। ९

६६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । नक्षत्रेऽवसिञ्चति ॥३३॥ मृगारैर्मुञ्चेत्याप्लावयति ॥३४॥ ३॥२७॥ ब्राह्मणो जज्ञ इति तक्षकायाञ्जलिं कृत्वा जपन्ना- चमयत्यभ्युक्षति ॥ १ ॥ क्रमुकशकलं संक्षुद्य दूर्शाजरद- जिनावकरज्वालेन ॥ २ ॥ सम्पातवत्युदपात्र ऊर्ध्वफला- भ्यां दिग्धाभ्यां मन्थमुपमथ्य रयिधारणपिण्डानन्वृचं प्रकीर्य छर्दयते ॥ ३ ॥ हरिद्रां सर्पिषि पाययति ॥ ४ ॥ जंगली शण से जङ्गली गोबर को जलाकर जल से अभिमंत्रण करके रोगी को उषः काल में अवसेचन एवं अभिमंत्रण करे ॥ अब सर्वरोग भैषज्य को कहते हैं। "आ गाव०" इन दश सूक्तों और "मुञ्च शीर्षक्त्या०" ऋचा से जल भरे घड़े को लाकर अभिमंत्रण करके रोगी को अव- सिंचन करे ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ यह सत्ताईसवी कण्डिका पूरी हुई ॥३॥२७॥ स्कन्द विष के भय में भैषज्य को कहते हैं । तक्षक देवता को नम- स्कार कर के "ब्राह्मणो जज्ञे वारिदं०" इत्यादि दो सूक्तों से जलको अभि- मंत्रण करके रोगी को आचमन करा कर विष के रोगी को संप्रोक्षण करे ॥ १ ॥ क्रमुक के शकल को जल के साथ अभिमंत्रण करके आचमन एवं अभ्युक्षण करावे । पुराना वस्त्र, उकुटिका, तृणों में से किसी एक को जला कर विषजल को अभिमंत्रण करके रोगी को अवसिंचन करे ॥ पुराने हरिण के चर्म को जलाकर जल में डाल कर अभिमंत्रण कर उस को आमंत्रण करे । बुहारण के अवकर तृणों से जल को गर्म करके अभिमंत्रण कर रोगी को अवसिंचन करे ॥ जलपात्र को लाकर रोगी को स्नान करावे । विष से लेप कर दो ऊर्ध्व कपालों द्वारा विष से पुंखित दो धनुषों से मथन कर अभिमंत्रण करके रोगी को पिलावे । मैनफलों को प्रत्येक ऋचा से अभिमंत्रण करके जिसभाँति हो वैसे रोगी को वमन करावे ॥ २ ॥ अब शस्त्र के अभिघात से रुधिर के बहने में भैषज्य को कहते हैं ॥ उक्त मंथ से मट्टी को सान कर पिण्डों को बनाकर प्रत्येक ऋचा से रोगी को खिलावे जिसमें वह वमन करे ॥ ३ ॥ हरिद्रा को चूर्ण करके घी में डाल कर रोगी को पिलावे ॥ ४ ॥ "रौहिण्यसि०" सूक्त से लाख के पानी को काथ बना कर अभिमंत्रण करके रोगी के

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ६७ रोहिणीत्यवनक्षत्रेऽवसिञ्चति ॥ ५ ॥ पृषातकं पायय- त्यभ्यनक्ति ॥६॥ आ पश्यतीति सदंपुष्पामणिं बध्नाति ॥ ७ ॥ भवाशर्वाविति सप्त काम्पीलपुटानपां पूर्णान् सम्पातवतः कृत्वा दक्षिणेनावसिच्य पश्चादपविध्यति ॥ ८ ॥ त्वया पूर्वमिति कोशेन शमीचूर्णानि भक्ते ॥ ६ ॥ अलङ्कारे ॥ १० ॥ शालां परितनोति ॥ ११ ॥ उतामृतासु- रिह्यमतिगृहीतस्य भक्तं प्रयच्छति ॥ १२ ॥ कुष्ठलिङ्गा- भिर्नवनीतमिश्रेणाप्रतीहारं प्रलिम्पति ॥ १३ ॥ लाक्षा- लिङ्गाभिर्दुग्धे फाण्टान् पाययति ॥ १४ ॥ ब्रह्म जज्ञा- रुग्ण प्रदेश को अवसिंचन करे । यह क्रिया उषः काल में करे ॥ ५ ॥ घी मिले दूध को रोगी को पिलावे एवं इसी को शरीर में लगावे ॥ ६ ॥ “आ पश्यति०” सूक्तसे सदंपुष्पा मणि को रोगी के अङ्गों में बाँधे ॥७॥ “भवाशर्वौ” सूक्त से सात कम्पील जल पूर्ण पुटों को लाकर बायें हाथ से रोगी को एक एक पुट को रोगी को अवसिंचन कर २ के रोगी के पीछे फेकता जावे ॥ ८ ॥ “त्वया पूर्वं०” से शमी के पत्तों के चूर्ण को शमी फल में डाल कर अभिमंत्रण करके रोगी को खिलावे, शमी फल को डाल कर अभिमंत्रण करके अलङ्कार में देवे । और उसी प्रकार करके चूर्ण को रोगी के घर में बखेर देवे ॥ ९ ॥ १० ॥ ११ ॥ “उतामृतासु०” से बुद्धि भ्रष्ट पुरुष को इस ओषधि को खिलावे ॥ “ये गिरेष्वजायन्त०” सूक्त, “अश्वत्थो देव सदन०” सूक्त, ये दो सूक्त, एवं “गर्भोऽसि० ” इत्यादि तीन ऋचाओं से अर्थात् उक्त दो सूक्त और इन तीन ऋचाओं से कुष्ठ ( कूट ) पिसा हुआ को मिला कर इसे अभिमंत्रण करके रोगी को पिलावे और उस के शरीर में लगा तार प्रलेप करे ॥ १२ ॥ १३ ॥ शस्त्र के अभिघात के भैषज्य को कहते हैं ॥ “रात्रि माता०” इस सूक्त से दूध और लाख का काथ तय्यार कर अभिमंत्रण करके रोगी को खिलावे । शस्त्र, काठ, पत्थर, अग्नि से सारा जल जाने पर इन जख्मों की दवा समाप्त हुई ॥ १४॥ अब स्त्री के सूति का रोग की दवा को कहते हैं । “ब्रह्म जज्ञानं०” सूक्त से भात को अभिमंत्रण करके सूतिकादि अरिष्ट रोगिणी

: 'द' 'दि' 'र्' 'ही' 'ति' -> "ददिर्हीति". Then "तक्षकायैत्युक्तम् ॥ १ ॥" -> 'त' 'क्ष' 'का' 'यै' 'त्यु' 'क्त' 'म्' = "तक्षकायैत्युक्तम्". Then "द्वितीयाया" or "द्वतीयया"? In Bloomfield 29.2: "dvitīyayā grahaṇī" In image: 'द्वि' 'ती' 'य' 'या' -> "द्वितीयाया" (it has an 'ा' on 'य'? No, 'द्विती' then 'य' then 'या' = "द्वितीयया"!). Wait, look at 'य' in "द्वितीयया": is there an 'ा' on the first 'य'? No! It is 'द्वि' 'ती' 'य' 'या' = "द्वितीयया"! Wait, let's look at it: 'द्वि' 'ती' 'य' 'या' -> yes, "द्वितीयया"!

Now let's re-examine Line 7: "॥२॥ सव्यं परिक्रामति ॥३॥ शिखासिचि स्तम्बानुद्ग-" Wait, "स्तम्बानुद्ग-" Line 8: "थ्नाति ॥४॥ तृतीयया प्रसर्जनी ॥५॥ चतुर्थ्या दक्षिणम-" Line 9: "पेहीति दंशम तृण

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ६९ दष्टः ॥७॥ पञ्चम्या वलीकपलालज्वालेन ॥८॥ षष्ठ्यार्त्नी- ज्यापाशेन ॥६॥ द्वाभ्यां मधूद्वापान् पाययति ॥१०॥ नव- म्या श्वाविट्पुरीषम् ॥११॥ त्रिःशुक्लया मांसं प्राशयति ॥१२॥ दशम्यालाबुनाचमयति ॥१३॥ एकादश्या नाभिं बध्नाति ॥१४॥ मधुलावृषलिङ्गाभिः खलतुलपर्णी संक्षुद्य मधुमन्थे पाययति ॥१५॥ उत्तराभिर्भुङ्क्ते ॥१६॥ द्वारं सृजति ॥ १७ ॥ अग्निस्तक्मानमिति लाजान् पाययति ॥ १८ ॥ दावे लोहितपात्रेण मूर्ध्नि सम्पातानानयति ॥ १६ ॥ ओते म इति करीरमूलं काण्डेनेकदेशम् ॥२०॥ ग्रामात्पांसून् ॥२१॥ पश्चादग्नेर्मातुरुपस्थे मुसल- “कैरातपृश्न०” ऋचा को पढ़कर छप्पर की ओलती के तृणों को जला- [

७० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । बुध्नेन नवनीतान्वक्तेन त्रिः प्रतीहारं तालुनि तापयति ॥ २२ ॥ शिग्रुभिर्नवनीतमिश्रैः प्रदेग्धि ॥ २३ ॥ एक- विंशतिमुशीराणि भिनत्तीति मन्त्रोक्तम् ॥ २४ ॥ उशी- राणि प्रयच्छति ॥२५॥ एकविंशत्या सहाप्लावयति ॥२६॥ आ यं विशन्तीति वधोनिवेशनशृतं क्षीरौदनमश्नाति ॥२७॥ परिद्यामिवेति मधु शीभं पाययति ॥२८॥ जपँश्च ॥ २६ ॥ अस्थिस्रंसमिति शकलेनाप्स्वटे सम्पातवता- वसिञ्चति ॥३०॥५॥२६॥ आवयो इति सार्षपं तैलसम्पातं बध्नाति ॥ १ ॥ काण्डं प्रलिप्य ॥२॥ पृक्तं शाकं प्रयच्छति ॥३॥ चत्वारि कर अग्नि में तपा कर गाँव की धूलि को सूक्त पढ़कर बखेर देवे ॥२०॥२१॥ पुनः अग्नि के पश्चिम भाग में माता के गोद में कुमार को बैठाकर करीर मूल के साथ नवनीत मिलाकर तीन बार ले २ कर कुमार के तालु में तपावे ॥ २२ ॥ शोहजन वृक्ष के जड़ की रस को या जड़ को नवनीत मिलाकर । “ओते म०” से अभिमंत्रण करके फेंके ॥ २३ ॥ खस के २१ जड़ को अभिमंत्रण करके पत्थर से चूर्ण करके सूक्त को जप कर अग्नि में जलावे । तब कृमियों को देवे ॥ २५ ॥ और २१ खस की पिञ्जुली सहित को अभिमंत्रण कर रोगी को नहवावे ॥ २६ ॥ राक्षस गृहीत की दवा को कहते हैं । “आ यं विशन्ति०” सूक्त से पक्षी के घोसले को जला कर क्षीरौदन पका कर खावे ॥२७॥ “परिद्यामिव० सूक्त से मधु और शीर रोगी को पिलावे और सूक्त का जप करे ॥२८॥ ॥२९॥ “अस्थिस्रंस०” सूक्त से शान्त वृक्ष के शकल को लाकर जल में डालकर अग्नि जलाकर जल को गर्म कर सर्प दष्ट पुरुष को सिंचन करे यह साँप की दवा है ॥३०॥ यह उन्तीसवी कण्डिका पूरी हुई ॥२९॥५॥ अब नेत्र की बीमारी की दवा को कहते हैं । “आवयो०” सूक्त से सर्षप काण्डमणि को लाकर अभिमंत्रण करके सर्षप के तेल से सम्पात वंत करके आज्य द्वारा आधान होम करके अङ्गों को सर्षप तैल से मल- कर मणि को बान्धे ॥ १ ॥ २ ॥ और सर्षप के शाकको उसके तेल से अभ्यक्त और अभिमंत्रण करके रोगी को खाने को देवे ॥ ३ ॥ चार शाक

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ७१ शाकफलानि प्रयच्छति ॥४॥ क्षीरलेहमाङ्क्ते ॥५॥ अश्ना- ति ॥ ६॥ अग्नेरिव इत्युक्तं दावे ॥ ७॥ इमा यास्तिस्र इति वृक्षभूमौ जाताज्वालेनावसिञ्चति ॥ ८ ॥ शीर्ष फाण्टाङ्गैः ॥ ६॥ निकटाभ्याम् ॥ १० ॥ कृष्णं नियानम- ह्योषध्याभिश्चोतयते ॥ ११ ॥ मारुतानामप्ययः ॥ १२ ॥ हिमवत इति स्यन्दमानादन्वीपमाहार्य वलीकैः ॥ १३ ॥ पञ्च च या इति पञ्चपञ्चाशतं परशुपर्णान्काष्ठैरादीप- यति ॥१४॥ कपाले प्रश्रुतं काष्ठेनालिम्पति ॥१५॥ किं- फलों को रोगी को देवे और उसकी आँखों में क्षीरपाटिकालग्न मूल क्षीर को प्राशन करा के क्षीर के लेह को आँखों में आँजे ॥५॥ ६॥ पित्त ज्वर की दवा को कहते हैं । “अग्नेरिव०” सूक्त से दावाग्नि में अग्नि प्रणयन करके उस में ताम्बे के स्रुवा से रोगी के शिर पर सम्पात को गिरावे ॥ ७॥ केशों के गिरने एवं बढ़ने की दवा को कहते हैं ॥ वृक्ष भूमि पर उत्पन्न औषधियों को जलाकर उससे जल गर्म करके अभिमंत्रण कर के प्रातः काल रोगी को अवसिंचन करे ॥ ८ ॥ “निकटावनिकटा- भ्यां०” सूक्तों से मधु और बहेड़ का काथ बनाकर रोगी को उषः काल में अवसिंचन करे ॥ ९ ॥ दारु हल्दी और हल्दी का काथ बना कर अभि- मंत्रण करके उषः काल में रोगी को अवसिंचन करे ॥ १० ॥ अब उदर तुण्ड बीमारी की दवा को कहते हैं॥ “कृष्णं नियानं०” एवं “सस्रुषीः” इत्यादि दो सूक्तों से चिति आदि ओषधियों के सहित जल को अग्नि में गरम करके उषः काल में रोगी को अवसिंचन करे ॥ ११ ॥ “कृष्णं नियानं, सस्रुषीः” इन दो सूक्तों से एवं “मरुतो यजते०” से पाकयज्ञ विधान से और “यथा वरुणं मारुतं क्षीरौदनं मारुतशृतं इत्यादि मारुत सूक्तोक्त मंत्रों का उपयोग करे ॥ १२ ॥ अब हृदयदाह, जलोदर, कामला रोगों की दवा को कहते हैं ॥ नदी के अनुकूल प्रवाह के जल को रोक कर उस में छप्पर के तृणों को डाल कर रोगी को अवसिंचन करे ॥१३॥ अब गण्डमाला रोग की दवा को कहते हैं । “पञ्च च या” सूक्त से पलाश के ५५ पत्तों को लकड़ी से जलाकर कपाल में पर्ण काठ के रस को पकाकर पलाश के काठ से लेकर रोगी को लेपन करे और अवसे-

७२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । स्त्यश्वजाम्बीलोदकरक्षिकामशकादिभ्यां दंशयति ॥१६॥ निह्यव मा पाप्मन्निति तितउनि पूल्यान्यवसिच्याप- विध्य ॥१७॥ अपरेद्युः सहस्राक्षायाप्सु बलींस्त्रीन्पुरोडाश- संवर्तींश्चतुष्पथेऽवक्षिप्यावकिरति ॥१८॥६॥३०॥ यस्ते मद इति शमीलूनपापलक्षणयोः शमीशम्याके- नाभ्युक्ष्य वापयति ॥ १ ॥ अधिशिरः ॥ २ ॥ अन्तर्दाव इति सन्तम्अग्नेः कर्षामुष्णपूर्णायां जपंस्त्रिः परिक्रम्य पुरोडाशं जुहोति ॥ ३ ॥ प्राग्नये प्रेत इत्युपदधीत ॥४॥ वैश्वानरीयाभ्यां पायनानि ॥५॥ अस्थाद् द्यौरित्यपवा- चन करे ॥ १५ ॥ शंख, कुत्ते के मुँह का लार, जलौका, गृहगोधिका और शंख से आलेपन या कुत्ते के कफ से आलेपन करे। शंख से आलेपन करने की दशा में रोगी को जलौका से कटवावे और कुत्ते के कफ से आलेपन करने की दशा में गृहगोधिका से ( मशक आदि से ) आलेपन करने की दशा में तक्मनाशन गण के सूक्त के मंत्रों को जप करे ॥१६॥ “निह्यव मा पाप्मन्०” तक्मनाशन मंत्र से चालनी में पूल्यों को डाल कर उस में जल देकर रोगी को अवसिंचन करे ॥ १७ ॥ और दूसरे दिन लाक्षा के साथ जल में छप्पर की ओलती के तीन तृणों को और पुरोडाश एवं सम्पातों

तायाः स्वयंस्रस्तेन गोशृङ्गेण सम्पातवता जपन् ॥ ६ ॥ यां ते रुद्र इति शूलिने शूलम् ॥ ७ ॥ उत्सूर्य इति शमीबिम्बशीर्णपर्ण्यावधि ॥ ८ ॥ द्यौश्च म इत्यभ्यज्या- वमार्ष्टि ॥ ९ ॥ स्थूणायां निकर्षति ॥ १० ॥ इदमित्था इत्यक्षतं मूत्रफेनेनाभ्युद्य ॥ ११ ॥ प्रक्षिपति ॥ १२ ॥ प्रक्षालयति ॥ १३ ॥ दन्तरजसावेदग्धि ॥ १४ ॥ स्त- म्बरजसा ॥ १५ ॥ अपचित आ सुस्रस इति किंस्यूता- कर पिलावे ॥ ५ ॥ बहुत बोलना, अधम में प्रवृत्त होना अपवाद कह- लाता है। इसका भैषज्य। अभ्यातानान्त तक क्रिया करके जिस गौ का बच्चा अपनी मा का दूध पीना छोड़ दिया हो ऐसी गौ का सींग अपने आप टूट जाने पर उस सींग को लेकर उसमें जल डालकर अभि- मंत्रण करके अभ्युक्षण करके "अस्थाद् द्यौः" मन्त्र से आचमन करावे ॥ ६ ॥ पेट, हृदय, या किसी अङ्ग या सब अङ्गों में शूल पैदा होने की दवा को कहते हैं॥ "यान्ते रुद्र०" इस सूक्त से शूलमणि को लाकर अभिमंत्रण कर बान्धे। लोहमणि या पाषाणमणि एक ही पदार्थ है ॥७॥ अब रक्षोग्रह की दवा को कहते हैं। "उत्सूर्य०" से चिति आदि ओषधियों द्वारा जल भरे घड़े को अभिमंत्रण करके रोगी को अवसिंचन करे। शमी जल से अवसिंचन करे। शमी बिम्ब जल सहित से अव- सिंचन करे। शीर्णपर्णी जल से अवसिंचन करे ॥ ८ ॥ अब दुष्टगण्ड विशिष्ट की दवा को कहते हैं॥ "द्यौश्च म०" मंत्र से तेल को अभिमंत्रण करके रोगी को सम्मार्जन करे ॥ ९ ॥ और घी से अरिष्ट को अभ्यक्त करके जखम को घीसकर स्थूणा से पीव निकाले ॥ १० ॥ अब अक्षत व्रण की दवा को कहते हैं। गोमूत्र या मनुष्यमूत्रके फेन को “इदमित्था०" से अभिमंत्रण करके जखम को मर्द्दन करे (जिस घाव में पीव बहने का मुँह न हो ) और मूत्र को फेककर हाथ धो लेवे ॥ १२॥ १३॥ जखम को दाँत के मल से सब ओर से लेप करे (जिस दुष्ट गण्डमाल घाव का रुधिर न बहे) और तृण के लगे धूलि को अभिमंत्रण कर लेप करे ॥ १४ ॥ १५ ॥ गण्डमाला की दवा को कहते हैं। शंख को घीसकर "अपचित०" से अभिमंत्रण करके गण्डमाला पर लेप करे। या कुत्ते १०

२. अध्याय ४-७: उपनयन, वेदारम्भ, मेधा-जनन, विवाह एवं स्त्री-संस्कार

७४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । दीनि ॥१६॥ लोहितलवणं संक्षुद्याभिनिष्ठीवति ॥१७॥ अन्तरिक्षेणेति पक्षहतं मन्त्रोक्तं चङ्क्रमया ॥१८॥ कीटेन धूपयति ॥१९॥ ग्लौरित्यक्षतेन ॥२०॥ वीहि स्वामित्य- ज्ञातारुः शान्त्युदकेन सम्प्रोक्ष्य मनसा सम्पातवता ॥ २१ ॥ या ओषधय इति मन्त्रोक्तस्यौषधीभिर्धूपयति ॥२२॥ मधूदश्वित्पाययति ॥२३॥ क्षीरोदश्वित् ॥२४॥ उभयं च ॥२५॥ देवा अदुरिति वल्मीकेन बन्धनपायना- चमनप्रदेहनमुष्णेन ॥ २६ ॥ यथा मनोऽव दिव इत्यरि- के लार का लेप करे । जोंक को अभिमंत्रण करके गण्डमाला में लगा देवे । या गृहगोधिका को अभिमंत्रण के गण्डमाला में लगा देवे ॥१६॥ सैंधव नून को चूर्ण करके अभिमंत्रण कर गण्डमाला पर छींटे और उस पर थूक देवे एवं मुख के लार को उस पर डाल देवे ॥ १७ ॥ पक्षी के काटने से जखम होने पर उसकी दवा को कहते हैं । “अन्तरिक्षेण०” से कुत्ते के पैर के नीचे की मट्टी को अभिमंत्रण करके काटे जखम पर लेप करे ॥१८॥ कुत्ते के शरीर पर के कीट को अभिमंत्रण करके उसे अग्नि में डालकर धूप देवे ॥ १९ ॥ “ग्लौरितः प्रपतिष्यति०” इस आधी ऋचा से गोमूत्र को अभिमंत्रण करके गण्डमाला को मर्दन करे प्रक्षालन करे और दाँत के मल से प्रलेप करे और तृणरज का लेप करे ॥ २० ॥ अब गदहे आदि के ऊरुगण्ड की दवा को कहते हैं । “वीहि स्वां०” मंत्र से शान्तिजल को अभिमंत्रण करके जखम को प्रोक्षण करे । आज्य की आहुति देवे । तब मन से संकल्प करे और सम्पातों को देवे ॥२१॥ पाप- गृहीत जलोदर की दवा को कहते हैं । “या ओषधय०” से दूधवाली दवा- ओं का धूप देवे । और आधा पानी महा हुआ तक्र रोगी को पिलावे । दूध, और उदश्वित् रोगी को पिलावे ॥२२॥२३॥२४॥ दोनों ही को पिलावे ॥ २५ ॥ विष, उपविष, स्थावरविष, जङ्गमविष, मधुमक्षिकाविष, इनकी दवा को कहते हैं । “देवा अदुः” सूक्त द्वारा दीमक की मट्टी को बान्धे, पिलावे, आचमन करावे, एवं उसको गरम करके रोगी को लेप करे ॥२६॥ कास और कफ गिरने की दवा को कहते हैं । “यथा मनोऽव दिव०” से अरिष्ट गृहीत व्यक्ति को भोजन को अभिमंत्रण करके देवे । सत्तु

[Page Header: अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ७५]

ष्टेन ॥२७॥ देवी देव्यां यां जमदग्निरिति मन्त्रोक्तफलं जीव्यलाकाभ्याममावास्यायां कृष्णवसनः कृष्णभक्षः पुरा काकसम्पातादवनक्षत्रेऽवसिञ्चति ॥२८॥७॥३१॥ यस्ते स्तन इति जम्भगृहीताय स्तनं प्रयच्छति ॥१॥ प्रियङ्गुतण्डुलानभ्यवदुग्धान्पाययति ॥२॥ अग्ना- विष्णू सोमारुद्रा सिनीवालि वि ते मुञ्चामि शुम्भनी इति मौञ्जैः पर्वसु बद्धा पिञ्जलीभिराप्लावयति ॥३॥ अवसि- ञ्चति ॥४॥ तिरश्चिराजेरिति मन्त्रोक्तम् ॥५॥ आकृतिलोष्ट- वल्मीकौ परिलिख्य ॥६॥ पायनानि ॥७॥ अपचिता-


के मंथ को अभिमंत्रण करके देवे । एवं सूर्य का उपस्थान करे और अभि- मंत्रित जल से आचमन करावे ॥ २७ ॥ “देवी देव्यां०” मंत्रोक्त फल काचीमाची फलमणिको भृङ्गराजमणि को बान्धे । जीवन्ती फलको बांधे । भृङ्गराज को बान्धे । केशों को दृढ़ करने, केशों के उत्पन्न होने, छोटे केशों के बढ़ने की दवा कही गयी है । माष ( उड़ीद ) तिलादि काले अन्न को खिलाकर काची माची फल को भृङ्गराज के द्वारा जल के साथ अभिमंत्रण करके रात्रि में ब्राह्ममुहूर्त्त में अवसिंचन करे ॥२८॥ ७ ॥ ३१ ॥ यह इकतीसवीं कण्डिका पूरी हुई ॥ जिस शिशु को जम्भु आदि पकड़ लिया हो उसकी माता के स्तनों को “यस्ते स्तन०” मंत्र से अभिमंत्रण करके बच्चे के मुखमें लगा देवे ॥ १ ॥ इस क्रिया को उसका पति करे ॥ दुःखनाशके भैषज्य को कहते हैं मालकौनी के चावलों को, बच्चे की मां या बाप बालक को पिलावे, तब उसे दूध पिलावे ॥ २ ॥ “अग्नाविष्णू०” इत्यादि से मूँज को गांठों में बांध कर उसकी पिंजुलियों से बच्चे को नहवावे या सिंचन कर ॥ ३ ॥ बिच्छु काटने की दवा । “तिरश्चिराज०” इन आठ ऋचाओं से जेठी- मधु को पीस कर अभिमंत्रण करके बिच्छु काटे व्यक्ति को पिलावे ॥ ४ ॥ ५ ॥ खेत की मट्टी को जीव कोषणी के चमड़े में लपेट,करके मणि बना करके भूमि पर धरकर अभिमंत्रण करके रोगी को बान्ध देवे ॥ ६ ॥ विषदूषण में जो उपायन ओषधियां कही गईं हैं, वे “तिरश्चि- राज०” सूक्त पठित जानो । बिच्छू, मशक, पिपीलिका, शार्कोटक,

७६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । मिति वैणवेन दार्भ्यूषेण कृष्णोर्णाज्येन कालबुन्दैः स्तुका- ग्रैरिति मन्त्रोक्तम् ॥८॥ चतुर्थ्याभिनिधायाभिविध्यति ॥९॥ ज्यास्तुकाज्वालेन ॥१०॥ यः कीकसा इति पिशील- वीणातन्त्रीं बध्नाति ॥११॥ तन्त्र्या क्षितिकाम् ॥ १२॥ वीरिणवध्री स्वयंम्लानं त्रिः समस्य ॥१३॥ अप्सु त इति वहन्त्योर्मध्ये विमिते पिञ्जुलीभिराप्लावयति ॥ १४ ॥ अवसिञ्चति ॥१५॥ उष्णाः सम्पातवतीरसम्पाताः ॥१६॥ नमो रुरायेति शकुनीनिवेषीकाङ्घ्रिमण्डूकं नीललोहिता- भ्यां सूत्राभ्यां सकक्षं बद्ध्वा ॥१७॥ शीर्षक्तिमित्यभिमृ- जोंक की दवायें कही गई जानो ॥ ७ ॥ फिर गण्डमाला की दवा को कहते हैं । “अपचितां०” इन दो एवं “आसुस्रसः” इस एक, इन तीन ऋचाओं से बांस के धनुष को काले रंग के भेड़के दुम की ज्या बनाकर चित्रित शर से गण्डमाला को प्रत्येक ऋचा से विद्ध करे । तीन ऋचायें हैं एवं तीन ही शर हैं । चौथी ऋचा-“या ग्रैव्या अपचित०” से गण्ड- माला पर धरकर विद्ध करे और अवसिंचन करे ॥ ८ ॥ ९ ॥ काले रंग के भेड़े के स्तुकाग्रको जलाकर उसपर जलको गरम करके उससे उषः- काल में रोगी को अवसिंचन करे ॥ १० ॥ अब राजयक्ष्मा रोग के भैष- ज्य को कहते हैं। “यः कीकसार्क०” इन तीन ऋचाओं से वीणातंत्री खण्ड को डालकर अभिमंत्रण करके बान्धे ॥ ११॥ वीणा के गस्वर को विष्णो वाद्य वीणाकंठ शिखण्ड को वीणा तंत्री बांधकर भूमि पर डालकर अभि- मंत्रण करके बान्धे ॥ १२ ॥ स्वयं पतित वीरिण के खण्डों को एकत्र बांध कर डालकर अभिमंत्रण कर बान्धे ॥ १३ ॥ जलोदर रोग जो वरुण से पकड़ा गया हो उसकी दवा । “अप्सु त०” से दो बहती नदियों के संगम पर घर बनाकर रोगी को संगम के जल से नहवाया करे ॥ १४ ॥ या उस जल से अवसिंचन करे ॥ १५ ॥ जिसको रोगी पर डाले वह गरम जल होना चाहिये । और जो असम्पात जल हो शीतल होना चाहिये जिससे आसिंचन करे ॥ १६ ॥ “नमो रुराय०” ( तक्म नाशन गण ) इन दो सूक्तों से रोगी को खाट पर कर देवे और उसके नीचे हरे सूत से रोगी के बांये जंघा में बान्धे । बाण की भाँति रेखा को इषीका कहते