कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका
समिति : सभा
समिति : प्राचीन भारत में शासन-व्यवस्था के परिचालन के लिए आज की भाँति सभायें तथा समितियाँ नियुक्त होती थीं । उदाहरण के लिए प्रौढ़ों की राजसभा, जनता की सार्वजनिक सभा, व्यापारियों तथा व्यवसायियों का मण्डल ( पूग ), राज्यों का 'संघ' और कुटुम्बों ( कुलों ) की ग्रामसभायें । ये ही सभायें कानून बनातीं तथा उसको जनता में क्रियान्वित करती थीं । इन सभाओं का प्रमुख कार्य जनता का प्रतिनिधित्व करना और राजा के निर्वाचन तथा सार्वजनिक भलाई के लिए अपनी राय देना था । कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में सभा : समिति की गंभीर व्याख्या की गयी है ।
यदि हम सभा : समिति के इतिहास की खोज करते हैं तो उसके बीज हमें मानव-सभ्यता के मूल में बिखरे दिखायी देते हैं । मनुष्य की उदयवेला से ही उसके इतिहास का आरम्भ होता है ।
वैदिक साहित्य के अध्ययन से हमें विदित होता है कि उस समय राष्ट्रीय जीवन-सम्बन्धी सार्वजनिक कार्यों को संपन्न करने के लिए समिति की व्यवस्था थी । यह समिति सर्वसाधारण प्रजाजनों ( विशः ) द्वारा आयोजित तथा स्वीकृत होती थी । उसी के द्वारा राजा का चुनाव होता था । वह इतनी महत्त्वपूर्ण थी कि उसमें सभी लोगों का उपस्थित होना अनिवार्य बताया गया है (ऋग्वेद १०।१७३।१; अथर्ववेद ६।८७।१ ) । राजनीतिक दृष्टि से इस लोकसंस्था का दूसरा भी महत्त्व था; क्योंकि उसी के द्वारा राजा के अतिरिक्त राजव्यवस्था का भी संचालन होता था । यही कारण है कि ऋग्वेद ( १०।१९१।३ ) में उसकी नीति तथा मंत्रणा के लिए शुभकामना प्रकट की गयी है । निर्वाचित राजा के लिए 'समिति' की प्रत्येक बैठक में उपस्थित होना आवश्यक था ( ऋग्वेद ९।६२।६ ) ।
समिति में उपस्थित प्रत्येक वक्ता इस बात के लिए यत्नशील रहता था कि उसका भाषण ओजस्वी, सर्वप्रिय और अकाट्य सिद्ध हो ( अथर्ववेद २।२७ ) । अथर्ववेद के इस वचन से यह ध्वनि निकलती है कि समिति के वक्ताओं के विभिन्न मत होते थे और उनमें विभिन्न दृष्टियों से जनहित की