कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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चिन्तना की जाती थी । इस समिति में राजनीतिक विषयों के अतिरिक्त शिक्षा और ज्ञान-संबंधी बातों पर भी वाद-विवाद हुआ करता था । मूलतः वह एक धर्मपालिका या न्यायपालिका भी होती थी ।
समिति के सदस्य समाज के विभिन्न समुदायों या क्षेत्रों ( वर्गों ) के प्रति-निधि होते थे । उस युग में प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त का आदर होता था । ग्राम-संघटन के प्रतिनिधि को ग्रामणी कहा जाता था । यहाँ तक कि ग्रामणी के नाम पर ग्राम शब्द का व्यवहार हुआ ( काशिका ५।३।११२ ) । इस प्रकार गाँवों, व्यापारियों, दार्शनिकों और राजनीतिकों के अपने-अपने प्रति-निधि होते थे । वे प्रतिनिधि समिति के प्रमुख अंग थे । अथर्ववेद में इन समि-तियों और ग्रामों की बड़ी स्तुति की गयी है ( १२।१।५६ ) । वैदिक काल के परवर्ती समाज में समिति के संघटन के मुख्य आधार ग्राम ही हुआ करते थे ।
इस प्रकार की समिति की ऐतिहासिक प्राचीनता के संबंध में ठीक-ठीक पता नहीं चलता है। अथर्ववेद ( ७।१२ ) में उसको अनादि और प्रजापति की कन्या कहा गया है। उसके अस्तित्व और कार्यों का प्रमाण सर्वप्रथम ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में और उसके बाद छान्दोग्य उपनिषद् में मिलता है।
ऋग्वेद ( ६।२८।६; ८।४।६; १०।३४।६० ) के अनेक स्थलों पर समिति : सभा की विशेषताओं पर कई तरह से प्रकाश डाला गया है । वहाँ उसको एक ऐसा समुदाय बताया गया है, जिसको सामाजिक व्यवहारों तथा सार्वजनिक मामलों पर विवाद करने का पूरा अधिकार था ।
लगभग सूत्रग्रन्थों के निर्माण ( ५०० ई० पूर्व ) के समय से समिति की जगह परिषद् ( पर्षत् ) ने ले ली थी ( पारस्कर गृह्यसूत्र ३।१३।४ ) । इस प्रकार हमें विदित होता है कि सार्वजनिक संघटनों या संस्थाओं के लिए समिति शब्द का प्रयोग वैदिककाल में ही होने लगा था ।
सभा : समिति के अतिरिक्त वेदकालीन सार्वजनिक संस्था सभा के अस्तित्व का भी पता चलता है । अथर्ववेद ( ७।१२।१-४ ) में उसको समिति की बहिन और प्रजापति की दो कन्याओं में से एक माना गया है । सायणा-चार्य ने उसकी व्याख्या करते हुए लिखा है कि 'नरिष्ठा' ( सभा ) बहुत से लोगों के उस निर्णय को कहते हैं, जिसका कथमपि उल्लंघन न हो सके । उसका निर्णय अमान्य नहीं हो सकता है, क्योंकि वह समुदाय की वस्तु है और एकस्वर में कही हुई बात है ।