भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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इस संबंध में स्वर्गीय विद्वान् डॉ० काशीप्रसाद जायसवाल का कथन है कि संभवतः वह चुने गये लोगों की एक स्थायी संस्था होती थी और समिति के अधीन होकर कार्य करती थी ( हिन्दू राजतंत्र १, पृष्ठ २६ ) । यह सभा प्रमुखतया राष्ट्रीय न्यायालय का कार्य करती थी ।

वाजसनेयी संहिता में प्रयुक्त सभाचार ( ३०।६ ) और अथर्ववेद में प्रयुक्त सभासद ( ३।१९।१; ७।१२।२; १८।५५।६ ) शब्द का अभिप्राय उस व्यक्ति से बताया गया है, जो सभा में उपस्थित होकर न्याय करता है । महाभारत ( ४।१।२४ ) में सभास्तार का प्रयोग न्यायाधीश के लिए किया गया है । उसमें एक जगह ( ५।३५।३८ ) यह कहा गया है कि वह सभा, सभा नहीं है, जिसमें प्रौढ़ लोग न हों; और वे प्रौढ, प्रौढ नहीं, जो नियम घोषित न कर सकें । अथर्ववेद ( ६।८८; ५।१० ) में उसको जनता की आवाज और न्याय का एकमात्र निदर्शन करने वाली कहा गया है । ऋग्वेद ( १०।१९१।३ ) में एक विशेष बात इस संबंध में यह भी कही गयी है कि राज्य की अभ्युन्नति के लिये राजा और सभा में भेद होना परमावश्यक है ।

इस प्रकार यद्यपि सभी प्राचीन ग्रंथों के उद्धरणों से यह स्पष्ट है कि समिति तथा 'सभा' के अधिकारों में कुछ अन्तर अवश्य था, किन्तु उसका संवैधानिक ढाँचा लगभग एक ही था ।

आदिम आर्यसंघों का स्वरूप

आदिम आर्य-संघों की संघटन-व्यवस्था की ओर आधुनिक लेखकों का ध्यान तब गया जब वे सर्वथा ध्वस्त हो चुके थे और उनकी जगह वर्ग-शासन-सत्ता एवं नये युद्धों ने ले ली थी; अर्थात् जब गृहयुद्ध, शासनसत्ता, कर, कानून और आचार के आन्तरिक संघटन के बनाने का प्रश्न समाज के सामने उपस्थित हुआ था । इस दृष्टि से वैदिक साहित्य में साम्य-संघ के आंतरिक विधानों के बारे में कुछ नहीं कहा गया है; उसमें न तो धन की चर्चा है न व्यक्तिगत अधिकारों का विवेचन और न दण्ड के लिये कोई व्यवस्था ही । उसमें संसार, मनुष्य, अग्नि, पशु, धन आदि की उत्पत्ति कैसे हुई, इन्हीं प्रश्नों पर अधिकतर विचार किया गया है । ब्राह्मण-ग्रन्थों में अवश्य ही आचार, सत्ता और व्यवहार के सम्बन्ध में जिज्ञासायें प्रगट की गयी हैं । वैदिक साहित्य की अपेक्षा महाभारत और स्मृतियों में यह बात हमें अधिक स्पष्ट रूप में देखने को मिलती है कि आदिम आर्यसंघों और परवर्ती सामाजिक संगठनों में क्या अन्तर था एवं उनके संचालन का स्वरूप क्या था ।