भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्रागैतिहासिक संघ : इतिहासकारों ने प्रागैतिहासिक मानव-सभ्यता के विकास को उसकी प्रमुख प्रवृत्तियों के आधार पर प्रस्तर, कांस्य या लौह आदि अनेक अवस्थाओं में विभक्त किया है। प्रागैतिहासिक मानव ने अपनी जीविकोपार्जन के साधन अन्न, वस्त्र, आश्रय-स्थान आदि के लिये प्रकृति से संघर्ष किया। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये उसने जितने साधनों का उपयोग किया, जितने व्यक्ति संघटित हुए, उन व्यक्तियों की जो योग्यता, कार्यक्षमता आदि थी वे सब मिलकर उस युग की उत्पादन शक्तियाँ कहलायीं। उत्पादन की ये शक्तियाँ समाज की आवश्यकता और क्रियाशीलता के अनुसार सदा ही बदलती रहती हैं।

सबसे पहले मनुष्य जब संगठनों की ओर प्रवृत्त होकर अपने सामाजिक जीवन का निर्माण करने में अग्रसर हो रहा था, उसका परिचय इतिहासकारों ने एक जांगल मानव के रूप में प्राप्त किया। कंद मूल और फल ही उसका आहार था। उसने पत्थरों के औजार तैयार किये; रगड़ से वह आग भी पैदा कर चुका था; धनुष-बाण का भी वह आविष्कार कर चुका था; वह गाँवों में बसने लग गया था, और टोकरियाँ बुनना तथा अस्त्र-शस्त्र बनाना भी उसने सीख लिया था। मनुष्य की दूसरी उन्नतावस्था बर्बरयुग के नाम से कही गयी है। इस युग में मिट्टी की कला अधिक विकसित हुई। पशु-पालन और पौधे उगाना इस युग की बड़ी विशेषताओं में हैं। मकान बनाने के लिये ईंटों और पत्थरों का प्रयोग भी इस युग में होने लगा था। इस युग में भोजन के लिये मांस तथा दूध पर्याप्त रूप में उपलब्ध था। लेखन-कला का जन्म भी इसी युग में हुआ। सभ्यता के तीसरे युग में पहुँच कर मनुष्य ने सारी जांगल प्रवृत्तियों और बर्बर स्वभाव को छोड़कर श्रम के विभाजन तथा उत्पादन की दिशा में अधिक उन्नति की। इस युग में विनिमय और उत्पादन की नयी शक्तियों ने वर्ग-भेद, शोषण, दासता, विरोध और निजी संपत्ति को जन्म दिया, जिससे पूरे समाज में क्रांति हुई।

ऐतिहासिक संघ : मनुष्य के आर्थिक जीवन के इतिहास का आरम्भ उत्पादन की शक्तियों, वितरण की अवस्थाओं और विनिमय के माध्यमों के जन्म से होता है। आर्ययुगीन प्राग्भारतीय समाज में इन शक्तियों, अवस्थाओं तथा माध्यमों का क्या स्वरूप था, इसका विवरण हमें भारत के प्राचीन साहित्य के अनुशीलन से प्राप्त होता है।

ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से भारतीय समाज की चार अवस्थायें बतायी गयी हैं : कृतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। हिन्दू समाज के