भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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इन चारों युगों का संचालक धर्म रहा है। धर्म अर्थात् रहन-सहन का ढंग; शासन सत्ता के नियम, विवाह-संबंध आदि। हिन्दू-साहित्य के प्राचीनतम प्रमाण वेद, धार्मिक प्रवृत्ति से परिचालित उक्त युग-परिवर्त्तन को किस रूप में प्रस्तुत करते हैं, इसका परिचय श्री डांगे के शब्दों में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है "पूरा वेद-साहित्य सिर्फ एक माँग उपस्थित करता है। और उस माँग को पूरा करने के लिए उपायों को खोजता है। वह माँग धन है। इस धन के दो रूप हैं। एक है अन्न और दूसरा है प्रजा ( मनुष्य ) धन या अन्न उस समाज के उत्पादन के साधनों, आर्थिक उत्पादन की क्रियाशीलता का द्योतक है जिसका सीधा संबंध प्रजा से जुड़ा है। इन दो प्रश्नों पर सभी वेद-संहिताओं में बहुत मात्रा में सामग्री मिलती है" ( पृ० ७३ ) ।

अग्नि की उत्पत्ति : आर्ययुगीन मानव के सामने पहिली समस्यायें भोजन, निवास, आग और आत्मरक्षा की थी। कृतयुग में जब कि मनुष्य नितांत ही जंगली अवस्था में था, उसको कई कारणों से, जैसे—भोजन, रोग तथा शत्रुओं के कारण, एक स्थान से दूसरे स्थान में भटकना पड़ा। प्रकृति के विरोध में, आत्मरक्षा के लिए, उसने निरन्तर संघर्ष किया। धीरे-धीरे उसने आग का पता लगाया, जिसका श्रेय महर्षि अंगिरस को है ( ऋग्वेद ५।२।८; १०३२।६; ५।११।६ )। आग का पता लग जाने से तत्कालीन जन-जीवन में महान् क्रांतिकारी परिवर्त्तन हुआ। उसको प्राकृतिक शक्ति के रूप में देखा गया। एक ओर तो उसका उपयोग पशुओं तथा मछलियों के मांस को भूनने में किया गया और दूसरी ओर उसको शत्रुबाधा को दूर करने तथा भूत-प्रेतादि को भगाने वाली महाशक्ति के रूप में भी पूजा जाने लगा ( ऋग्वेद ३।१५।१; ) । धीरे-धीरे मनुष्य ने समझा कि ये पशु, जो दूध देते हैं, जिनका मांस खाकर जीवित रहा जा सकता है; उनकी रोमयुक्त खाल को ओढ़ कर सर्दी दूर की जा सकती है और उनकी हड्डियों तथा उनके सींगों से उपयोगी औजार भी बनाये जा सकते हैं।

अग्नि की सहायता से मनुष्य की उन्नति का एक दूसरा रूप सामने आया। ज्यों ही उसको यह ज्ञात हुआ कि अग्नि के द्वारा कच्चे लोहे को पिघला कर बड़े-बड़े असंभव कार्य भी संभव हो सकते हैं, कि समाज का ढांचा ही बदल गया; किन्तु मनुष्य की यह सूझ बहुत बाद की है। जांगल युग से बर्बर युग में पहुँच कर, अर्थात् कृतयुग के आविष्कारों का विकास कर जब उसने त्रेतायुग में प्रवेश किया तो प्रकृति के सामने उसने अपनी जिन दुर्बलताओं को स्वीकार किया था, उन पर उसने विजय प्राप्त कर ली। उसने अपने