भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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४२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [पहला अधिकरण

(१) यथा श्वगणिनां धेनुः श्वभ्यो दुग्धे न ब्राह्मणेभ्यः, एवमयं राजा सत्त्वप्रज्ञावाक्यशक्तिहीनेभ्यो दुग्धे नात्मगुणसम्पन्नेभ्यः । असौ राजा पुरुषविशेषज्ञः सेव्यताम्—इति लुब्धवर्गमुपजापयेत् ।

(२) यथा चण्डालोदपानश्चण्डालानामेवोपभोग्यो नान्येषामेवमयं राजा नीचो नीचानामेवोपभोग्यो न त्वद्विधानामार्याणाम् । असौ राजा पुरुषविशेषज्ञः, तत्र गम्यताम्—इति मानिवर्गमुपजापयेत् ।

(३) तथेति प्रतिपन्नांस्तान् संहितान पणकर्मणा ।
योजयेत यथाशक्ति सापसर्पान् स्वकर्मसु ॥

(४) लभेत सामदानाभ्यां कृत्यांश्च परभूमिषु ।
अकृत्यान् भेददण्डाभ्यां परदोषांश्च दर्शयेत् ॥

इति कौटीलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे परविषये कृत्याकृत्यपक्षोपग्रहः त्रयोदशोऽध्यायः ॥

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वाला है। तुम्हारे लिए यही उचित है कि तुम इस स्थान को छोड़ कर कहीं अन्यत्र चले जाओ।' यह कह कर भीतवर्ग का भेदन करे ।

( १ ) लुब्धवर्ग को वश में करने के लिए गुप्तचर यों कहे, 'देखो जैसे चाण्डालों की गाय चाण्डालों के लिए ही दूध देती है, ब्राह्मणों के लिए नहीं, उसी प्रकार राजा भी बल, बुद्धि और वाक्शक्ति से हीन लोगों के लिए लाभदायक है, सर्वगुण-सम्पन्न लोगों के लिए नहीं। इसके विपरीत अमुक राजा बड़ा गुणज्ञ है, तुम्हें उसी के आश्रय में रहना चाहिए।' इस प्रकार लुब्धवर्ग को मिलाये ।

( २ ) मानीवर्ग का भेदन करने के लिए गुप्तचर कहे 'देखो, जैसे चाण्डालों का कुंआ अकेले उन्हीं के लिए उपयोगी है, उसी प्रकार नीच राजा भी नीच लोगों के लिए ही सुखकर है, तुम्हारे जैसे श्रेष्ठ पुरुषों के लिए नहीं । किन्तु वह अमुक नाम का राजा स्वयं गुणी और गुणज्ञों का आदर करनेवाला है । तुम्हें उसी के आश्रम में जाकर रहना चाहिए।' इस प्रकार मानीवर्ग को उसके स्वामी से अलग करे ।

( ३ ) इस प्रकार राजा अपने पक्ष में किये गए पुरुषों को शपथ, संधि आदि से विश्वास दिला कर उन्हें उन्हीं कार्यों में नियुक्त करे, जिन पर वे नियुक्त थे; किन्तु उनके पीछे गुप्तचरों को अवश्य रखे ।

( ४ ) इस प्रकार राजा, शत्रुदेश में कृत्यपक्ष के पुरुषों को साम तथा दाम के द्वारा अपनी ओर मिलावे । परन्तु अकृत्यपक्ष के पुरुष उन्हें भेद तथा दण्ड के द्वारा अपनी ओर करते रहें और उनके सामने शत्रु के दोषों की बराबर चर्चा करते रहें ।

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में परविषयक कृत्याकृत्यपक्षोपग्रह नामक तेरहवां अध्याय समाप्त ।

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