कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 145, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण १४ | # राजप्रणिधिः |
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| अध्याय १८ |
(१) राजानमुत्तिष्ठमानमनूत्तिष्ठन्ते भृत्याः । प्रमाद्यन्तमनुप्रमाद्यन्ति । कर्माणि चास्य भक्षयन्ति । द्विषद्विश्चातिसन्धीयते । तस्मादुत्थानमात्मनः कुर्वीत । नाडिकाभिरहरष्टधा रात्रिं च विभजेत्; छायाप्रमाणेन वा । त्रिपौरुषी पौरुषी चतुरङ्गुला च च्छाया मध्याह्न इति चत्वारः पूर्वे दिवसस्याष्टभागाः । तैः पश्चिमा व्याख्याताः । (२) तत्र पूर्वे दिवसस्याष्टभागे रक्षाविधानमायव्ययौ च शृणुयात् । द्वितीये पौरजानपदानां कार्याणि पश्येत् । तृतीये स्नानभोजनं सेवेत;
राजा के कार्य-व्यापार
( १ ) राजा के उन्नतिशील होने पर ही उसका सारा भृत्यवर्ग उन्नतिशील होता है । इसके विपरीत राजा के प्रमादी होने पर सारा भृत्यवर्ग प्रमाद करने लगता है । उस दशा में वह प्रमादित भृत्यवर्ग राज्यकार्यों को चुपचाप पी जाता है । ऐसा राजा शत्रुओं के धोखे में आ जाता है । इसलिए राजा को उचित है कि वह अपने आपको सदा ही उन्नतिशील बनाये रखे । राजकार्य को व्यवस्थित ढंग से संचालित करने के लिए वह दिन और रात को आठ-आठ घड़ियों में बांट दे । अथवा पुरुष की छाया से भी वह समय का विभाजन कर सकता है । सूर्योदय से लेकर जब तक पुरुष की छाया तिगुनी लंबी रहे, वह दिन का पहिला आठवां हिस्सा है । इस छाया को 'त्रिपौरुषी' छाया कहते हैं । इसी प्रकार वह छाया जब एक पुरुष के बराबर लंबी रह जाय तो, वह दिन का दूसरा भाग है । उसको 'एकपौरुषी' छाया कहते हैं । तदनंतर वही 'एकपौरुषी' छाया घटकर जब चार अंगुल मात्र रह जाय तो वह दिन का तीसरा भाग है । उसको 'चतुरंगुली' छाया कहते हैं । उसके बाद का समय मध्याह्न कहलाता है । दिन का यह चौथा भाग है । मध्याह्न के उपरांत इसी क्रम से त्रिपौरुषी, पौरुषी, चतुरंगुला और दिनांत, ये चार भाग हैं । इस प्रकार दिन के ये आठ भाग हुए ।
( २ ) पूर्वार्द्ध के प्रथम भाग में राजा रक्षा-संबंधी कार्यों का निरीक्षण करे और बीते हुए दिन के आय-व्यय की जाँच करे । दूसरे भाग में वह पुरवासियों तथा जानपदवासियों के कार्यों का निरीक्षण करे । तीसरे भाग में स्नान, भोजन तथा स्वाध्याय