कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ६२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ पहला अधिकरण |
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स्वाध्यायं च कुर्वीत । चतुर्थे हिरण्यप्रतिग्रहमध्यक्षांश्च कुर्वीत । पञ्चमे मन्त्रिपरिषदा पत्रसम्प्रेषणेन मन्त्रयेत; चारगुह्यबोधनीयानि च बुद्धयेत । षष्ठे स्वैरविहारं मन्त्रं वा सेवेत । सप्तमे हस्त्यश्वरथायुधीयान् पश्येत् । अष्टमे सेनापतिसखो विक्रमं चिन्तयेत् । प्रतिष्ठितेऽहनि सन्ध्यामुपासीत ।
(१) प्रथमे रात्रिभागे गूढपुरुषान्पश्येत् । द्वितीये स्नानभोजनं कुर्वीत स्वाध्यायं च । तृतीये तूर्यघोषेण संविष्टश्चतुर्थपञ्चमौ शयीत । षष्ठे तूर्यघोषेण प्रतिबुद्धः शास्त्रमितिकर्तव्यतां च चिन्तयेत् । सप्तमे मन्त्रमध्यासीत; गूढपुरुषांश्च प्रेषयेत् । अष्टमे ऋत्विगाचार्यपुरोहितसखः स्वस्त्ययनानि प्रतिगृह्णीयात्; चिकित्सकमाहानसिकमौहूर्त्तिकांश्च पश्येत् । सवत्सां धेनुं वृषभं च प्रदक्षिणीकृत्योपस्थानं गच्छेत् ।
(२) आत्मबलानुकूल्येन वा निशाहर्भागान् प्रविभज्य कार्याणि सेवेत ।
करे और चौथे भाग में बीते दिन की अवशिष्ट आमदनी को सँभाले तथा उसी भाग में विभिन्न कार्यों पर अध्यक्ष आदि की नियुक्ति भी करे । उत्तरार्ध के पाँचवें भाग में वह मंत्रि-परिषद् के परामर्श से पत्र भेजे तथा आवश्यक कार्यों के संबंध में विचार-विनिमय करे । इसी समय वह गुप्तचरों के कार्यों एवं गुप्त बातों के संबंध में जाने-सुने । छठे भाग में वह स्वतंत्र होकर स्वेच्छया विहार तथा विचार करे । सातवें भाग में वह हाथी, घोड़े, रथ तथा अस्त्र-शस्त्रों का निरीक्षण करे । अंतिम आठवें भाग में वह सेनापति के साथ युद्ध आदि के संबंध में विचार-विमर्श करे । दिनांत के बाद वह संध्योपासन करे ।
( १ ) इसी प्रकार रात्रि के पहिले भाग में वह गुप्तचरों को देखे । दूसरे भाग में स्नान, भोजन, स्वाध्याय, तीसरे भाग में संगीत सुनता हुआ शयन करे और चौथे पाँचवें भाग तक सोता रहे । रात्रि के छठे भाग में संगीत के द्वारा जागा हुआ वह अर्थशास्त्रसंबंधी तथा दिन में संपादित किये जाने योग्य कार्यों पर विचार करे । सातवें भाग में गुप्त-मंत्रणा करे और गुप्तचरों को यथास्थान भेजे । रात्रि के अंतिम आठवें भाग में ऋत्विक्, आचार्य तथा पुरोहित के साथ स्वस्तिवाचन-सहित आशीर्वाद ग्रहण करे । इसी समय वह वैद्य, प्रधान रसोइयाँ और ज्योतिषी आदि से भी तत्संबंधी बातों पर परामर्श करे । इन सब कार्यों से निवृत्त हो वह बछड़े वाली गाय और बैल की प्रदक्षिणा करके राज-दरबार में प्रवेश करे ।
( २ ) ऊपर का काल-विभाग सामान्य-दृष्टि से निरूपित किया गया है, वैसे शक्ति तथा अनुकूल परिस्थितियो के अनुसार स्वेच्छया राजा अपनी कार्य-व्यवस्था को स्वयं भी निर्धारित कर सकता है ।