भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 918 में से

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६८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण

(१) स्वभूमौ च वसेत् सर्वः परभूमौ न सञ्चरेत् ।
न च बाह्येन संसर्गं कश्चिदाभ्यन्तरो व्रजेत् ॥
(२) सर्वं चावेक्षितं द्रव्यं निबद्धागमनिर्गमम् ।
निर्गच्छेदधिगच्छेद्वा मुद्रासंक्रान्तभूमिकम् ॥

इति विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे निशान्तप्रणिधि-
नमिकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥

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( १ ) अंतःपुर के सभी परिचारक-परिचारिकायें अपने-अपने स्थानों पर ही रहें, एक दूसरे के स्थान पर न जाने पावें । इसी प्रकार भीतर का कोई भी आदमी बाहर के आदमियों से न मिलने पावे ।

( २ ) जो भी वस्तु महल से बाहर आवे तथा महल में जावे उसका भली-भाँति निरीक्षण कर और उसके संबंध के सारे विवरण रजिस्टर में लिख देने चाहिए । राजमहल के बाहर और भीतर जाने-आने वाली प्रत्येक वस्तु पर राजकीय मुहर लग जानी चाहिए ।

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त ।

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