कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 153, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण १६ | # आत्मरक्षितकम् |
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| अध्याय २० |
(१) शयनादुत्थितः स्त्रीगणैर्धन्विभिः परिगृह्येत; द्वितीयास्यां कक्ष्यायां कञ्चुकोष्णीषिभिर्वर्षवराभ्यागारिकैः, तृतीयास्यां कुब्जवामनकिरातैः, चतुर्थ्यां मन्त्रिभिः सम्बन्धिनिर्दीवारिकैश्च प्रासपाणिभिः ।
(२) पितृपैतामहं महासम्बन्धानुबन्धं शिक्षितमनुरक्तं कृतकर्माणं जनमासन्नं कुर्वीत; नान्यतोदेशीयमकृतार्थमानं स्वदेशीयं वाप्यपकृत्योपगृहीतम् । अन्तर्वैशिकसैन्यं राजानमन्तःपुरं च रक्षेत् ।
(३) गुप्ते देशे माहानसिकः सर्वमास्वादबाहुल्येन कर्म कारयेत् । तद्राजा तथैव प्रतिभुञ्जीत, पूर्वमग्नये वयोभ्यश्च बलिं कृत्वा ।
आत्मरक्षा का प्रबंध
( १ ) प्रातःकाल राजा के विस्तर से उठते ही, धनुष-बाण लिये स्त्रियां उन्हें घेर लें । शयनकक्ष से उठकर राजा जब दूसरे कक्ष में प्रवेश करे तो वहाँ कुर्ता, पगड़ी पहिने हुए नपुंसक तथा दूसरे सेवक राजा की देख-रेख के लिए उपस्थित रहें । तीसरे कक्ष में कुबड़े, बौने एवं निम्न जाति के परिजन राजा की रक्षा करें । चौथे कक्ष में मंत्रियों, संबंधियों और हाथ में भाला लिये द्वारपालों द्वारा राजा की रक्षा होनी चाहिए ।
( २ ) वंश-परंपरा से अनुगत, उच्चकुलोत्पन्न, शिक्षित, अनुरक्त और प्रत्येक कार्य को भली-भांति समझने वाले पुरुषों को राजा अपना अंगरक्षक नियुक्त करे । किंतु धन-संमान-रहित विदेशी व्यक्ति को तथा एक बार पृथक् होकर पुनः नियुक्त स्वदेशीय व्यक्ति को भी राजा अपना अंगरक्षक कदापि नियुक्त न करे । राजमहल की भीतरी सेना राजा और रनिवास की रक्षा करे ।
( ३ ) माहानसिक ( पाकशाला का अध्यक्ष या निरीक्षक ) को चाहिए कि वह किसी एकांत स्थान में भोज्य पदार्थों का स्वाद ले-लेकर उन्हें सुस्वादु तथा सुरक्षा से तैयार कराये । भोजन के तैयार हो जाने पर राजा पहिले अग्नि तथा पक्षियों को बलि प्रदान कर, फिर स्वयं खावे ।