कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) बहिर्जानुभञ्जनीत्रिशूलप्रकरकूपकूटावपातकण्टकप्रतिसराहि-पृष्ठतालपत्रशृङ्गाटकश्वदंष्ट्रार्गलोपस्कन्दनपादुकाम्बरीषोदपानकैः छन्नपथं कारयेत् । (२) प्राकारमुभयतो मण्डपकमध्यर्धदण्डं कृत्वा प्रतोलीषट्तलान्तरं द्वारं निवेशयेत्; पञ्चदण्डादेकोत्तरवृद्ध्याष्टदण्डादिति चतुरश्रम् । द्विदण्डं वा । षड्भागमायामादधिकमष्टभागं वा । (३) पञ्चदशहस्तादेकोत्तरमष्टादशहस्तादिति तुलोत्सेधः । (४) स्तम्भस्य परिक्षेपाः षडायामा द्विगुणो निखातः चूलिकायाश्चतुर्भागः । (५) आदितलस्य पञ्च भागाः शाला वापी सीमागृहं च । दशभागिकौ
कोई न देख सके, प्रधावितिका तथा उसके पास ही निष्कुहद्वार भी बनवाने चाहिए। बाहर से छोड़े गये बाण आदि से सुरक्षित रहने के लिए छिपने योग्य आड़ को प्रधावितिका कहते हैं। उसमें निशाना मारने के लिए जो छिद्र बनाया जाता है, उसको निष्कुहद्वार कहा जाता है।
(१) प्राकार की बाहरी भूमि में शत्रुओं के घुटनों को तोड़ देने वाले खूंटे, त्रिशूल, अँधेरे गड्ढे, लौह-कंटक के ढेर, साँप के काँटे, ताड़पत्रों के समान बने हुए लोहे के जाल, तीन नोकवाले नुकीले काँटे, कुत्ते की दाढ़ के समान लोहे की तीक्ष्ण कीलें, बड़े-बड़े लट्ठे, कीचड़ से भरे हुए गढ़े, आग और जहरीले पानी के गढ़े आदि बनाकर दुर्ग के मार्ग को पाट देना चाहिए।
(२) जिस स्थान पर किले का दरवाजा बनवाना हो, वहाँ पहिले प्राकार के दोनों भागों में डेढ़ दण्ड लम्बा-चौड़ा मण्डप (चबूतरा) बनाया जाय। तदनन्तर उसके ऊपर प्रतोली के समान छह खम्भे खड़े करके द्वार का निर्माण करवाया जाय। द्वार का निर्माण पाँच दंड परिधि से करना चाहिए, और तदनन्तर एक-एक दंड बढ़ाते हुए अधिक से अधिक आठ दंड तक उसकी परिधि होनी चाहिए; अथवा, कुछ विद्वानों के मत से दरवाजा दो दंड का हो। या नीचे के आधार के परिमाण से छठा तथा आठवाँ हिस्सा अधिक ऊपर का दरवाजा बनवाया जाय।
(३) दरवाजे के खम्भों की ऊँचाई पन्द्रह हाथ से लेकर अठारह हाथ तक होनी चाहिए।
(४) खम्भों की मोटाई उसकी ऊँचाई से छठा हिस्सा होनी चाहिए। मोटाई से दुगुना भाग भूमि में गाड़ दिया जावे और चौथाई भाग खम्भे के ऊपर चूल के लिए छोड़ दिया जावे।
(५) प्रतोलीका के तीन तल्लों में से पहिले तल्ले के पाँच हिस्से किए जाँय।