कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १९ : अ० ३ ] दुर्गों का निर्माण ८९
समत्तवारणौ द्वौ प्रतिमञ्चौ अन्तरम् आणिः । हर्म्यं च समुच्छ्रायादर्धतलं स्थूणावबन्धश्च । आध्र्वास्तुकमुत्तमागारं त्रिभागान्तरं वा, इष्टकावबद्धपार्श्व, वामतः प्रदक्षिणसोपानं गूढभित्तिसोपानमितरतः । (१) द्विहस्तं तोरणशिरः, त्रिपञ्चभागिकौ द्वौ कवाटयोगौ, द्वौ द्वौ परिघौ, अरत्निरिन्द्रकीलः, पञ्चहस्तमणिद्वारं, चत्वारो हस्तिपरिघाः । (२) निवेशार्धं हस्तिनखः मुखसमः । संक्रमोऽसंहार्यो वा भूमिमयो वा निरुदके । (३) प्राकारसमं मुखमवस्थाप्य त्रिभागगोधामुखं गोपुरं कारयेत्; प्राकारमध्ये कृत्वा वापीं पुष्करिणीद्वारं, चतुःशालमध्यर्धान्तराणि कं
उनमें से बीच के हिस्से में बावड़ी बनवाई जाय, उसके दायें-बायें शाला और शाला के छोरों पर सीमागृह बनवाये जाँय । शाला के किनारों पर भी आमने-सामने छोटे-छोटे दो चबूतरे बनवाये जाँय जिन पर बुर्जे भी हों । शाला और सीमागृह के बीच में आणि ( एक छोटा दरवाजा ) होना चाहिए । मकान की दूसरी मंजिल की ऊँचाई पहिली मंजिल की ऊँचाई से आधी होनी चाहिए, उसकी छत के नीचे सहारे के लिए छोटे-छोटे खंभे भी होने चाहिए । मकान की तीसरी मंजिल को उत्तमागार कहते हैं, उसकी ऊँचाई डेढ़ दंड होनी चाहिए । उत्तमागार परिमाण द्वार का तृतीयांश होना चाहिए । उसके पार्श्व भाग पक्की ईंटों से मजबूत होने चाहिए । उसकी बाईं ओर घुमावदार सीढ़ियाँ और दाहिनी ओर गुप्त सीढ़ियाँ होनी चाहिए ।
( १ ) किले के दरवाजे का ऊपरी बुर्ज दो हाथ लम्बा होना चाहिए । दोनों फाटक तीन या पाँच तख्तों की पर्त के बने हों । किवाड़ों के पीछे दो-दो अर्गलाएँ होनी चाहिए । किवाड़ों को बन्द करने के लिए एक अरत्नी परिमाण ( एक हाथ ) की इन्द्रकील ( चटखनी ) होनी चाहिए । फाटक के बीच में पाँच हाथ का एक छोटा सा दरवाजा जुड़ा होना चाहिए । पूरा दरवाजा इतना बड़ा होना चाहिए कि जिसमें चार हाथी एक साथ प्रवेश कर सकें ।
( २ ) द्वार की ऊँचाई का आधा, हाथी के नाखून के आकार-प्रकार का, मजबूत लकड़ी का बना हुआ ऐसा मार्ग होना चाहिए जिससे यथा अवसर किले में टहला जा सके । जहाँ जल का अभाव हो वहाँ मिट्टी का ही मार्ग बनवाना चाहिए ।
( ३ ) प्राकार की ऊँचाई जितना किंतु उसके तृतीयांश जितना, गोह के मुँह के आकार का एक नगरद्वार भी बनवाना चाहिए । प्राकार के बीच में एक बावड़ी बनाकर उससे संबद्ध एक द्वार भी बनवाये । उस द्वार को पुष्करिणी कहते हैं । जिस दरवाजे के आसपास चार शालाएँ बनाई जाँय और उस दरवाजे में पुष्करिणी द्वार से ड्योढ़ा दरवाजा लगा हो । उसका नाम कुमारीपुरद्वार है । जो दरवाजा