भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० २४ : अ० ८ ] गबन हुए धन की प्राप्ति ११३

(१) कृतप्रतिघातावस्थः सूचको निष्पन्नार्थः षष्ठमंशं लभेत, द्वादशमंशं भृतकः । प्रभूताभियोगादल्पनिष्पत्तौ निष्पन्नस्यांशं लभेत । अनिष्पन्ने शारीरं हैरण्यं वा दण्डं लभेत, न चानुग्राह्यः । (२) निष्पत्तौ निक्षिपेद्वादमात्मानं वापवाहयेत् । अभियुक्तोपजापात्तु सूचको वधमाप्नुयात् ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे समुदायस्य युक्तापहृतस्य प्रत्यानयनमष्टमोऽध्यायः, आदितः अष्टाविंशः ॥


सम्बन्ध में पूरे सबूत नहीं मिलते, कुछ ही धन के सम्बन्ध में सबूत मिल पाते हों, तो उस पर पूरे गबन का अभियोग लगाना चाहिए ।

( १ ) यदि कोई निष्पक्ष, राजहितेच्छु व्यक्ति किसी अध्यक्ष के गबन की सूचना देता है, तो अपराध सिद्ध हो जाने पर, उस अपहृत धन का छठा भाग सूचना देनेवाले को दिया जाना चाहिये । यदि सूचना देनेवाला व्यक्ति राजकर्मचारी हो तो उसे बारहवाँ भाग दिया जाना चाहिये । यदि अभियोग बहुत से धन का सिद्ध हो चुका है, किन्तु मिला कुछ ही धन है तो सूचना देनेवाले व्यक्ति को उस प्राप्त धन में से ही हिस्सा देना चाहिये । यदि अपराध सिद्ध न हो सके तो सूचना देनेवाले व्यक्ति को उचित शारीरिक या आर्थिक दण्ड दिया जाना चाहिये । किसी भी अपराधी को क्षमा न किया जाय ।

( २ ) अभियोग साबित हो जाने पर सूचना देनेवाला व्यक्ति अदालत से अपने को बरी करा सकता है, किन्तु रिश्वत लेकर यदि वह अपराधी के पक्ष में हो जाता है, और सच्चा बयान नहीं देता है तो उसे प्राणदण्ड दिया जाना चाहिये ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में अपहृतप्रत्यानयन नामक आठवाँ अध्याय समाप्त ।


८ कौ०