कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
प्र० २४ : अ० ८ ] गबन हुए धन की प्राप्ति ११३
(१) कृतप्रतिघातावस्थः सूचको निष्पन्नार्थः षष्ठमंशं लभेत, द्वादशमंशं भृतकः । प्रभूताभियोगादल्पनिष्पत्तौ निष्पन्नस्यांशं लभेत । अनिष्पन्ने शारीरं हैरण्यं वा दण्डं लभेत, न चानुग्राह्यः । (२) निष्पत्तौ निक्षिपेद्वादमात्मानं वापवाहयेत् । अभियुक्तोपजापात्तु सूचको वधमाप्नुयात् ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे समुदायस्य युक्तापहृतस्य प्रत्यानयनमष्टमोऽध्यायः, आदितः अष्टाविंशः ॥
सम्बन्ध में पूरे सबूत नहीं मिलते, कुछ ही धन के सम्बन्ध में सबूत मिल पाते हों, तो उस पर पूरे गबन का अभियोग लगाना चाहिए ।
( १ ) यदि कोई निष्पक्ष, राजहितेच्छु व्यक्ति किसी अध्यक्ष के गबन की सूचना देता है, तो अपराध सिद्ध हो जाने पर, उस अपहृत धन का छठा भाग सूचना देनेवाले को दिया जाना चाहिये । यदि सूचना देनेवाला व्यक्ति राजकर्मचारी हो तो उसे बारहवाँ भाग दिया जाना चाहिये । यदि अभियोग बहुत से धन का सिद्ध हो चुका है, किन्तु मिला कुछ ही धन है तो सूचना देनेवाले व्यक्ति को उस प्राप्त धन में से ही हिस्सा देना चाहिये । यदि अपराध सिद्ध न हो सके तो सूचना देनेवाले व्यक्ति को उचित शारीरिक या आर्थिक दण्ड दिया जाना चाहिये । किसी भी अपराधी को क्षमा न किया जाय ।
( २ ) अभियोग साबित हो जाने पर सूचना देनेवाला व्यक्ति अदालत से अपने को बरी करा सकता है, किन्तु रिश्वत लेकर यदि वह अपराधी के पक्ष में हो जाता है, और सच्चा बयान नहीं देता है तो उसे प्राणदण्ड दिया जाना चाहिये ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में अपहृतप्रत्यानयन नामक आठवाँ अध्याय समाप्त ।
८ कौ०
| प्रकरण २५ | # उपयुक्तपरीक्षा |
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| अध्याय ९ |
(१) अमात्यसम्पदोपेताः सर्वाध्यक्षाः शक्तितः कर्मसु नियोज्याः । कर्मसु चैषां नित्यं परीक्षां कारयेत्, चित्तानित्यत्वान्मनुष्याणाम् । अश्वसधर्माणो हि मनुष्या नियुक्ताः कर्मसु विकुर्वते ।
(२) तस्मात् कर्तारं कारणं देशं कालं कार्यं प्रक्षेपमुदयं चैषु विद्यात् । ते यथासन्देशमसंहता अविगृहीताः कर्माणि कुर्युः । संहता भक्षयेयुः । विगृहीता विनाशयेयुः । न चानिवेद्य भर्तुः किञ्चिदारब्धं कुर्यु रन्यत्रापत्प्रतीकारेभ्यः । प्रमादस्थानेषु चैषामत्ययं स्थापयेद् दिवसवेतनव्ययद्विगुणम् ।
राजकीय उच्चाधिकारियों के चाल-चलन की परीक्षा
(१) राजकीय उच्चपदस्थ कर्मचारियों को अमात्य के गुणों से युक्त होना चाहिए, योग्यता एवं कार्यक्षमता के आधार पर ही उन्हें भिन्न-भिन्न पदों पर नियुक्त किया जाना चाहिए। उपयुक्त पदों पर नियुक्त किए जाने के अनन्तर समय-समय पर राजा उनके चाल-चलन की निगरानी कराता रहे, क्योंकि मनुष्यों की चित्त-वृत्तियां सदा एक जैसी नहीं रहती हैं। देखा यह जाता है कि कभी-कभी मनुष्य भी घोड़ों की आदत जैसा आचरण करने लगते हैं। अर्थात् घोड़ा जैसे अपने स्थान पर बँधा हुआ शान्त दिखाई देता है, किन्तु रथ आदि में जोड़ते ही वह बिगड़ पड़ता है, वैसे ही स्वभाव से शांत दिखाई देने वाला मनुष्य भी कार्य पर नियुक्त हो जाने के बाद उद्दण्ड हो जाता है।
(२) इसलिए राजा को चाहिए कि अध्यक्षों के सम्बन्ध में वह कारण (अधीनस्थ कर्मचारी), देश, काल, कार्य, वेतन और लाभ, इन बातों की जानकारी रखे। उच्चपदस्थ कर्मचारियों को भी चाहिए कि वे राजा के आदेशानुसार एक-दूसरे से द्वेष न करते हुए जुदा-जुदा रह कर ही अपने कार्यों में तत्पर रहें। यदि वे आपस में मिल जायेंगे तो राजधन का अपहरण करेंगे और परस्पर द्वेष करेंगे तो राजकार्यों को नष्ट कर देंगे। कर्मचारियों को चाहिए कि राजा की आज्ञा प्राप्त किए बिना वे किसी भी नये कार्य का आरंभ न करें, किन्तु आपत्तियों का प्रतीकार करने के लिए किये जाने योग्य कार्यों को वे राजा की अनुमति प्राप्त किए बिना भी आरंभ कर
प्र० २५ अ० ९ ] उच्चाधिकारियों की परीक्षा ११५
(१) यश्चैषां यथादिष्टमर्थं सविशेषं वा करोति स स्थानमानौ लभेत । (२) अल्पायतिश्चेन्महाव्ययो भक्षयति । विपर्यये यथायतित्त्वव्ययश्च न भक्षयति इत्याचार्याः अपसर्पेणैवोपलभ्यते इति कौटिल्यः । (३) यः समुदयं परिहापयति स राजार्थं भक्षयति । स चेदज्ञानादिभिः परिहापयति तदेनं यथागुणं दापयेत् । (४) यः समुदयं द्विगुणमुद्भावयति स जनपदं भक्षयति । स चेद् राजार्थमुपनयत्यल्पापराधं वारयितव्यः । महति यथापराधं दण्डयितव्यः । (५) यः समुदयं व्ययमुपनयति स पुरुषकर्माणि भक्षयति । स कर्म-दिवसद्रव्यमूलपुरुषवेतनापहारेषु यथापराधं दण्डयितव्यः ।
सकते हैं । यदि उच्चपदस्थ कर्मचारी अपने कार्यों में प्रमाद करें तो उन पर उनके वेतन का दुगुना दण्ड किया जाय ।
( १ ) जो पदाधिकारी आदिष्ट कार्य को पूरा करके, स्वेच्छया किसी दूसरे हित-कर कार्य को भी करता है, उसे तरक्की और सम्मान दिया जाना चाहिए ।
( २ ) कुछ पुरातन आचार्यों का कहना है कि 'यदि किसी अध्यक्ष की आमदनी थोड़ी और खर्च अधिक दिखाई दे, तो समझ लेना चाहिए कि वह राज्य के धन का अपहरण करता है । यदि जितनी आमदनी है, उतना ही व्यय दिखाई दे तो समझना चाहिए कि वह न तो राजधन का गबन करता है और न रिश्वत लेता है ।' किन्तु आचार्य कौटिल्य का कथन है कि 'धन का अपहरण करनेवाला भी थोड़ा खर्च कर सकता है । अतः गुप्तचरों द्वारा ही इस कार्य का ठीक पता लग सकता है ।'
( ३ ) जो अधिकारी नियमित आय में कमी दिखाता है, वह निश्चय ही राज-धन का अपहरण करता है । यदि उसकी अज्ञानता, प्रमाद एवं आलस्य के कारण हुई है तो उसे अपराध के अनुसार दुगुना, तिगुना दण्ड दिया जाना चाहिये ।
( ४ ) जो अधिकारी नियमित आय से दुगुनी आय दिखाता है, वह निश्चय ही प्रजा को पीड़ित कर इतना धन वसूल करता है । यदि वह उस दुगुनी आमदनी को राजकोष के लिए भेज देता है तो उसे इतना ही दण्ड देना चाहिए, जिससे कि आगे ऐसा अनुचित कार्य न कर सके । यदि वह उस अधिक धन को राजकोष के लिए न भेज कर स्वयं ही खा लेता है तो उसे अपराध के अनुसार कठोर दण्ड दिया जाना चाहिए ।
( ५ ) जो अधिकारी व्ययनिमित्त निर्धारित राशि को खर्च न करके बचा लेता है वह मजदूरों का पेट काटता है । उस अपराधी अधिकारी को, कार्यहानि के मूल्य का तथा मजदूरी के अपहरण का, यथोचित दण्ड दिया जाना चाहिए ।
| ११६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण |
|---|
(१) तस्मादस्य यो यस्मिन्नधिकरणे शासनस्थः स तस्य कर्मणो याथातथ्यमायव्ययौ च व्याससमासाभ्यामाचक्षीत । (२) मूलहरतादात्विककदर्यांश्र्च प्रतिषेधयेत् । यः पितृपैतामहमर्थमन्या-येन भक्षयति स मूलहरः । यो यद्यदुत्पद्यते तत्तद् भक्षयति स तादात्विकः । यो भृत्यात्मपीडाभ्यामुपचिनोत्यर्थं स कदर्यः । सः पक्षवांश्चेदनादेयः । विपर्यये पर्यादातव्यः । (३) यो महत्यर्थसमुदये स्थितः कदर्यः सन्निधत्ते, अवनिधत्ते, अवस्रा-वयति वा—सन्निधत्ते स्ववेश्मनि, अवनिधत्ते पौरजानपदेषु अवस्रावयति परविषये—तस्य सत्री मन्त्रिमित्रभृत्यबन्धुपक्षमार्गतिं गतिं च द्रव्याणा-मुपलभेत । (४) यश्चास्य परविषये सञ्चारं कुर्यात्तमनुप्रविश्य मन्त्रं विद्यात् । सुविदिते शत्रुशासनापदेशेनैनं घातयेत् । (५) तस्मादस्याध्यक्षाः संख्यायकलेखकरूपदर्शकनीवीग्राहकोत्तरा-ध्यक्षसखाः कर्माणि कुर्युः ।
( १ ) इसलिए प्रत्येक राजकीय अधिकारी का कर्तव्य है कि अपने कार्य की यथार्थता और तत्सम्बन्धी आय-व्यय का विवरण वह संक्षेप में तथा विस्तार से राजा के संमुख प्रस्तुत करे ।
( २ ) उसका यह भी कर्तव्य है कि वह मूलहर, तादात्विक तथा कदर्य पुरुषों पर भी अंकुश रखे । अपनी वंशानुगत संपत्ति का उपभोग जो अन्याय से करता है वह मूलहर है । जो पुरुष जितना उत्पन्न करता है उतना ही व्यय भी कर लेता है, वह तादात्विक कहलाता है । जो अपने को और अपने नौकरों को कष्ट देकर धनो-पार्जन करता है । वह कदर्य कहा जाता है । यदि निषेध करने पर भी ये मूलहर आदि अपने कार्यों को न छोड़ें तो ( यदि उनके बंधुबांधव न हों ) उनकी संपत्ति को जब्त कर लिया जाय और बंधु-बांधव हों तो उन्हें पदच्युत कर दिया जाय ।
( ३ ) जो कदर्य ( कंजूस ) पदाधिकारी गहरी आमदनी करता है, धन को भूमि में गाड़ता है, उसको किसी के पास छिपाकर रखता है, शत्रुदेश में भेजकर किसी के पास जमा करता है, उस अधिकारी के परामर्शदाता, मित्र, नौकर, बंधु-बांधव और आय-व्यय आदि का पता गुप्तचर प्राप्त करें ।
( ४ ) गुप्तचर को चाहिए कि वह कदर्य अधिकारी के धन की शत्रुदेश में ले जानेवाले पुरुष से मिलकर अथवा उसका सेवक बनकर, उसके रहस्य का पता लगावे । गुप्तचर द्वारा राजा को जब इस भेद की सही जानकारी प्राप्त हो जाये तो वह शत्रु के आदेश का बहाना बनाकर उस कदर्य अधिकारी को मरवा डाले ।
( ५ ) इसलिए प्रत्येक विभाग के सभी अध्यक्षों को चाहिये कि वे संख्यानक
प्र० २५ : अ० ६ ] उच्चाधिकारियों की परीक्षा ११७
(१) उत्तराध्यक्षा हस्त्यश्वरथारोहाः । तेषामन्तेवासिनः शिल्पशौच-युक्ताः सङ्ख्यायकादीनामपसर्पाः । (२) बहुमुख्यमनित्यं चाधिकरणं स्थापयेत् । (३) यथा ह्यनास्वादयितुं न शक्यं जिह्वातलस्थं मधु वा विषं वा । अर्थस्तथा ह्यर्थचरेण राज्ञः स्वल्पोऽप्यनास्वादयितुं न शक्यः ॥ (४) मत्स्या यथान्तःसलिले चरन्तो ज्ञातुं न शक्याः सलिलं पिबन्तः । युक्तास्तथा कार्यविधौ नियुक्ता ज्ञातुं न शक्या धनमाददानाः ॥ (५) अपि शक्या गतिर्ज्ञातुं पततां खे पतत्त्रिणाम् । न तु प्रच्छन्नभावानां युक्तानां चरतां गतिः ॥ (६) आस्रावयेच्चोपचितान् विपर्यस्येच्च कर्मसु । यथा न भक्षयन्त्यर्थं भक्षितं निर्वमन्ति वा ॥
( गणक ), लेखक ( क्लर्क ), रूपदर्शक ( मुद्राओं तथा मणि-मुक्ताओं का पारखी ), नीवीग्राहक ( बचत रकम को सँभालनेवाला ) और उत्तराध्यक्ष (प्रधान अधिकारी), इन सबके सहयोग से ही कार्य करें ।
( १ ) उत्तराध्यक्ष ( प्रधान अधिकारी ) उनको नियुक्त किया जाय, जो हाथी, घोड़े और रथों की सवारी में निपुण हों । उनके अधीनस्थ ऐसे आज्ञाकारी, कुशल, पवित्र एवं सदाचरणशील कार्यकर्ता हों, जो संख्यानक आदि राजकीय कर्मचारियों की प्रवृत्तियों का पता लगाने में गुप्तचरों का कार्य करें ।
( २ ) प्रत्येक विभाग में अनेक उच्च पदाधिकारियों की नियुक्ति की जानी चाहिए, किन्तु उन्हें एक ही विभाग में रहने दिया जाय ।
( ३ ) जैसे जीभ में रखे हुए मधु अथवा विष का स्वाद लिए बिना नहीं रहा जा सकता, उसी प्रकार अर्थाधिकार कार्यों पर नियुक्त पुरुष, अर्थ का थोड़ा भी स्वाद न लें, यह असंभव है ।
( ४ ) जिस प्रकार पानी में रहनेवाली मछलियाँ पानी पीती नहीं दिखाई देती हैं, उसी प्रकार अर्थकार्यों पर नियुक्त कर्मचारी भी धन का अपहरण करते हुए नहीं जाने जा सकते हैं ।
( ५ ) आकाश में उड़नेवाले पक्षियों की गति-विधि का पता लगाया जा सकता है, किन्तु धन का अपहरण करनेवाले कर्मचारियों की गति-विधि से पार पाना कठिन है ।
( ६ ) राजा, जब ऐसे अध्यक्षों का पता लगा ले, तो वह उन धनसंपन्न अधिकारियों की सारी संपत्ति को छीन ले और उन्हें उनके उच्चपदों से गिराकर निम्न
११८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) न भक्षयन्ति ये त्वर्थान् न्यायतो वर्धयन्ति च । नित्याधिकाराः कार्यास्ते राज्ञः प्रियहिते रताः ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे उपयुक्तपरीक्षा नवमोऽध्यायः,
आदितः एकोनत्रिंशः ॥
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पदों पर नियुक्त कर दे, जिससे भविष्य में गबन न कर सकें एवं अपने गबन को स्वयं ही उगल दें।
( १ ) जो अध्यक्ष राज्यधन का अपहरण नहीं करते, वरन्, न्यायपरायण होकर राजा की समृद्धि में यत्नशील रहते हैं और प्रिय समझकर राजा का हित करते रहते हैं, ऐसे सच्चरित्र अध्यक्षों को सदा सम्मानपूर्वक उच्चपद पर बनाये रखना चाहिए।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में उपयुक्तपरीक्षा नामक नौवां अध्याय समाप्त।
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| प्रकरण २६ | # शासनाधिकारः |
|---|---|
| अध्याय १० |
(१) शासने शासनमित्याचक्षते । शासनप्रधाना हि राजानः, तन्मूलत्वात् । सन्धिविग्रहयोः ।
(२) तस्मादमात्यसम्पदोपेतः सर्वसमयविदाशुग्रन्थश्चार्वक्षरो लेखवाचनसमर्थो लेखकः स्यात् । सोऽव्यग्रमना राज्ञः सन्देशं श्रुत्वा निश्चितार्थं लेखं विदध्याद्, देशैश्वर्यवंशनामधेयोपचारमीश्वरस्य, देशनामधेयोपचारमनीश्वरस्य ।
(३) जातिं कुलं स्थानवयःश्रुतानि कर्माद्धिशीलान्यथ देशकालौ ।
यौनानुबन्धं च समीक्ष्य कार्ये लेखं विदध्यात् पुरुषानुरूपम् ॥(४) अर्थक्रमः, सम्बन्धः, परिपूर्णता, माधुर्यमौदार्यं, स्पष्टत्वम्, इति लेखसम्पत् ।
शासनाधिकार
( १ ) राजा की ओर से पत्र आदि पर लिखित आज्ञा या प्रतिज्ञा का नाम 'शासन' है । राजा लोग शासन ( लिखित बात ) पर ही विश्वास करते हैं, मौखिक बात पर नहीं । संधि, विग्रह आदि षाड्गुण्य संबंधी राजकीय कार्य शासनमूलक ( लिखित ) होने पर ही ठीक समझे जाते हैं ।
( २ ) इसलिए राजकीय शासन को लिखनेवाले लेखक को अमात्य की योग्यताओं वाला, आचार-विचार का ज्ञाता, शीघ्र ही सुंदर वाक्य-योजना में निपुण, सुलेखक और विभिन्न लिपियों को पढ़ने-लिखने वाला होना चाहिए । वह लेखक प्रकृतिस्थ होकर राजा के संदेश को सुने और पूर्वापर प्रसंगों को दृष्टि में रखकर स्पष्ट अभिप्राय प्रकट करनेवाले लेख को लिखे । लेख यदि किसी राजा से संबद्ध हो तो, उसमें देश, ऐश्वर्य, वंश और नाम का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए । यदि उसका संबंध किसी अमात्य से हो तो उसमें केवल उसके देश और नाम का ही उल्लेख किया जाय ।
( ३ ) लेख यदि राजकार्य-संबंधी हो तो उसमें जाति, कुल, स्थान, आयु, योग्यता, कार्य, धन-संपत्ति, सदाचार, देश, काल, वैवाहिक संबंध आदि बातों का भली-भांति विचार करके, प्राप्तकर्ता पुरुषों की श्रेष्ठता, निकृष्टता आदि का भी अवश्य उल्लेख करे ।
( ४ ) उस लेखक में १. अर्थक्रम, २. संबंध, ३. परिपूर्णता, ४. माधुर्य, ५. औदार्य और ६. स्पष्टता आदि छह प्रकार की योग्यताएँ होनी चाहिए ।
१२० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) तत्र यथावदनुपूर्वक्रिया प्रधानस्यार्थस्य पूर्वमभिनिवेश इत्यर्थस्य क्रमः ।
(२) प्रस्तुतस्यार्थस्यानुपरोधादुत्तरस्य विधानमासमाप्तेरिति सम्बन्धः ।
(३) अर्थपदाक्षराणामन्यूनातिरिक्तता हेतूदाहरणदृष्टान्तैरर्थोपवर्णना-श्रान्तपदतेति परिपूर्णता ।
(४) सुखोपनीतचार्वर्थशब्दाभिधानं माधुर्यम् ।
(५) अग्राम्यशब्दाभिधानमौदार्यम् ।
(६) प्रतीतशब्दप्रयोगः स्पष्टत्वमिति ।
(७) अकारादयो वर्णास्त्रिषष्टिः ।
(८) वर्णसङ्घातः पदम् । तच्चतुर्विधं नामाख्यातोपसर्गनिपाताश्चेति । तत्र नाम सत्त्वाभिधायि । अविशिष्टलिङ्गमाख्यातं क्रियावाचि । क्रिया-विशेषकाः प्रादय उपसर्गाः । अव्ययाश्चादयो निपाताः ।
(९) पदसमूहो वाक्यमर्थपरिसमाप्तौ । एकपदावरस्त्रिपदपरः परपदा-र्थानुरोधेन वर्गः कार्यः । लेखपरिसंहरणार्थ इतिशब्दो वाचिकमस्येति च ।
( १ ) प्रधान अर्थ और अप्रधान अर्थ पूर्वापर यथानुक्रम में रखना ही अर्थक्रम कहलाता है ।
( २ ) लेख की समाप्ति पर्यन्त अगला अर्थ, प्रस्तुत अर्थ का बाधक न होनेपर अर्थसम्बन्ध कहलाता है ।
( ३ ) अर्थपद तथा अक्षरों का न्यूनाधिक्य न होना, हेतु उदाहरण तथा दृष्टान्त सहित अर्थ का निरूपण करना और प्रभावहीन शब्दों का प्रयोग न करना परिपूर्णता कहलाता है ।
( ४ ) सरल सुबोध शब्द का प्रयोग करना माधुर्य है ।
( ५ ) शिष्ट शब्दों का प्रयोग करना औदार्य कहलाता है ।
( ६ ) सुप्रसिद्ध शब्दों का प्रयोग करना ही स्पष्टता है ।
( ७ ) अकार आदि त्रेसठ वर्ण होते हैं ।
( ८ ) वर्णों के समूह को पद कहते हैं । पद चार प्रकार का होता है : १. नाम, २. आख्यात, ३. उपसर्ग और ४. निपात । जाति, गुण और द्रव्य को बताने वाला पद नाम कहलाता है । स्त्री-पुरुष आदि विशेष लिङ्गों से रहित क्रियावाचक पद को आख्यात कहते हैं । क्रियाओं के विशेष अर्थों का द्योतन करने वाले उनके आरंभ में लगे हुए प्र, परा, आदि पद उपसर्ग कहलाते हैं । च आदि अव्ययों को निपात कहते हैं ।
( ९ ) सम्पूर्ण अर्थ को कहने वाले पदसमूह का नाम वाक्य है । कम-से-कम एक पद पर और अधिक-से-अधिक तीन पद पर मुख्य पद के अनुसार विराम करना चाहिये । लेख की समाप्ति को बताने के लिए अन्त में इति शब्द लिख देना चाहिये,
प्र० २६ : अ० १० ] शासनाधिकार १२१
(१) निन्दा प्रशंसा पृच्छा च तथाख्यानमथार्थना । प्रत्याख्यानमुपालम्भः प्रतिषेधोऽथ चोदना ॥ सान्त्वमभ्यवपत्तिश्च भर्त्सनानुनयौ तथा । एतेष्वर्थाः प्रवर्तन्ते त्रयोदशसु लेखजाः ॥
(२) तत्राभिजनशरीरकर्मणां दोषवचनं निन्दा। गुणवचनमेतेषामेव प्रशंसा। कथमेतदिति पृच्छा। एवम् इत्याख्यानम्। देहीत्यर्थना। न प्रयच्छामीति प्रत्याख्यानम्। अननुरूपं भवत इत्युपालम्भः। मा कार्षीः इति प्रतिषेधः। इदं क्रियतामिति चोदना। योऽहं स भवान्, मम यद् द्रव्यं तद्भवतः इत्युपग्रहः सान्त्वम्। व्यसनसाहाय्यमभ्यवपत्तिः। सदोषमायति-प्रदर्शनमभिभर्त्सनम्।
(३) अनुनयस्त्रिविधोऽर्थकृतावतिक्रमे पुरुषादिव्यसने चेति।
(४) प्रज्ञापनाज्ञापरिदानलेखास्तथा परीहारनिसृष्टिलेखौ। प्रवृत्तिकश्च प्रतिलेख एव सर्वत्रगश्चेति हि शासनानि ॥
यदि लेख में पूरी बातें न लिखी गई हों तो अन्त में वाचिकमस्य (शेष अंश पत्र-वाहक के मुँह से सुन लीजिए), इस प्रकार लिख देना चाहिए।
(१) निन्दा, प्रशंसा, पृच्छा, आख्यान, अर्थना, प्रत्याख्यान, उपालम्भ, प्रतिषेध, चोदना, सान्त्वना, अभ्यवपत्ति, भर्त्सना और अनुनय इन्हीं तेरह बातों में से ही किसी बात को प्रकट किया जाता है।
(२) किसी के वंश, शरीर और कार्य में दोषारोपण करना निन्दा है। उन्हीं बातों के सम्बन्ध में गुणगान करना प्रशंसा है। 'यह कैसा हुआ?' इस प्रकार पूछना ही पृच्छा है। 'इसको इस प्रकार करना चाहिये' ऐसा कहना आख्यान है। 'दीजिए' इस प्रकार माँगना अर्थना है। 'नहीं देता हूँ' इस प्रकार निषेध करना ही प्रत्याख्यान है। 'यह कार्य आपने अपने अनुरूप नहीं किया' इस प्रकार का वचन उपालम्भ है। 'ऐसा मत करो' यह प्रतिषेध है। 'ऐसा करना चाहिये' इस प्रकार की प्रेरणा चोदना है। 'जो मैं हूँ वही आप हैं, जो मेरा धन है वही आपका भी है' इस प्रकार की तसल्ली देना सान्त्वना है। आपत्ति के समय सहायता करना अभ्युपपत्ति है। दोष देकर धमकी देना भर्त्सना है।
(३) अनुनय तीन प्रकार का होता है : १. अर्थकरणनिमित्तक, २. अतिक्रमणनिमित्तक और ३. पुरुषादिव्यसननिमित्तक। किसी आवश्यक कार्य को करने के लिए अनुनय किया जाना ही अर्थकरणनिमित्तक है, किसी कुपित पुरुष को शान्त करने के लिए अनुनय करना अतिक्रमणनिमित्तक है, और किसी आत्मीय की मृत्यु के कारण आई हुई विपत्ति में अनुनय करना पुरुषाधिव्यसननिमित्तक है। अनुनय कहते हैं अनुग्रह को।
(४) १. प्रज्ञापना, २. आज्ञा, ३. परिदान, ४. परीहार, ५. निसृष्टि ६. प्रवृत्तिक ७. प्रतिलेख और ८. सर्वत्रग, लेख के ये आठ भेद और हैं।
१२२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) अनेन विज्ञापितमेवमाह तद्दीयतां चेद्यदि तत्त्वमस्ति ।
राज्ञः समीपे वरकारमाह प्रज्ञापनैषा विविधोपदिष्टा ॥
(२) भर्तुराज्ञा भवेद् यत्र निग्रहानुग्रहौ प्रति ।
विशेषेण तु भृत्येषु तदाज्ञालेखलक्षणम् ॥
(३) यथार्हगुणसंयुक्ता पूजा यत्रोपलक्ष्यते ।
अप्याधौ परिदाने वा भवतस्तावुपग्रहौ ॥
(४) जातेर्विशेषेषु पुरेषु चैव ग्रामेषु देशेषु च तेषु तेषु ।
अनुग्रहो यो नृपतेर्निदेशात्तज्ज्ञः परीहार इति व्यवस्येत् ॥
(५) निसृष्टिस्थापना कार्यकरणे वचने तथा ।
एष वाचिकलेखः स्याद्भवेन्नैसृष्टिकोऽपि वा ॥
(६) विविधां दैवसंयुक्तां तत्त्वजां चैव मानुषीम् ।
द्विविधां तां व्यवस्यन्ति प्रवृत्तिं शासनं प्रति ॥
(७) दृष्ट्वा लेखं यथातत्त्वं ततः प्रत्यनुभाष्य च ।
प्रतिलेखो भवेत् कार्यो यथा राजवचस्तथा ॥
(१) यदि कोई महामात्र राजकीय धन का संग्रह करके अपने पास रख लेता है और गुप्तचर से उसकी सूचना पाकर राजा जब उस महामात्र से राजकीय धन को राजकोष में जमा करने की आज्ञा देता है और जब महामात्र धन देना स्वीकार कर लेता है तब जो लिखा-पढ़ी होती है, उस लेख-पत्र का नाम ही प्रज्ञापना है ।
(२) जिस लेख-पत्र में राजा की ओर से निग्रह या अनुग्रह की आज्ञा हो और विशेषरूप से जो नौकरों के सम्बन्ध में लिखा जाय उसे आज्ञा कहते हैं ।
(३) जिस लेख-पत्र में समुचित गुणों से सत्कार का भाव प्रकट किया जाता है उसे परिदान कहते हैं । यह दो प्रकार से लिखा जाता है । १. जब नौकरों का कोई आत्मीय मर जाता है जिसके कारण वे व्यथित हैं; २. जब राजा उनकी रक्षा के लिए दयाभाव प्रकट करता है ।
(४) विशेष जातियों नगरों, ग्रामों और देशों पर राजा की आज्ञा के अनुसार जो अनुग्रह किया जाता है, विशेषज्ञ लोग उसी को परीहार कहते हैं ।
(५) किसी कार्य के करने तथा कहने में किसी आत्मवचन का प्रमाण देना ही निसृष्टि है, उसके वाचिक और नैसृष्टिक दो भेद होते हैं ।
(६) अनेक प्रकार की दैवी, पारमार्थिक और मानुषी आपत्तियों की सूचना को प्रवृत्तिक कहते हैं । वह शुभ और अशुभ दो प्रकार का होता है ।
(७) दूसरे के भेजे हुए लेख को भली-भांति देखने और पड़ने के अनन्तर, फिर राजा के सामने पढ़कर, राजा की आज्ञा के अनुसार उसका जो उत्तर लिखा जाय उसको प्रतिलेख कहते हैं ।
प्र० २६ : अ० १० ] शासनाधिकार १२३
(१) यथेश्वरांश्चाधिकृतांश्च राजा रक्षोपकारौ पथिकार्थमाह ।
सर्वत्रगो नाम भवेत् स मार्गे देशे च सर्वत्र च वेदितव्यः ॥
(२) उपायाः सामोपप्रदानभेददण्डाः ।
(३) तत्र साम पञ्चविधं—गुणसंकीर्तनं, सम्बन्धापाख्यानं, परस्परो-
पकारसन्दर्शनं, आमायतिप्रदर्शनं, अमात्मोपनिधानमिति ।
(४) तत्राभिजनशरीरकर्मप्रकृतिश्रुतद्रव्यादीनां गुणागुणग्रहणं प्रशंसा
स्तुतिर्गुणसङ्कीर्तनम् ।
(५) ज्ञातियौनमौखस्रौवकुलहृदयमित्रसंकीर्तनं सम्बन्धोपाख्यानम् ।
(६) स्वपक्षपरपक्षयोरन्योन्योपकारसंकीर्तनं परस्परोपकारसन्दर्शनम्।
(७) अस्मिन्नेवं कृत इदमवायोर्भवतीत्याशाजननमायतिप्रदर्शनम् ।
(८) योऽहं स भवान्, यन्मम द्रव्यं तद्भवता स्वकृत्येषु प्रयुज्यताम्
इत्यात्मोपनिधानमिति ।
(९) उपप्रदानमर्थोपकारः ।
(१०) शङ्काजननं निर्भर्त्सनं च भेदः ।
( १ ) जिस लेखपत्र में राजा राहगीरों की रक्षा और उनके उपकार के लिए अपने अधिकारियों को आदेश देता है वह सर्वत्रग है; क्योंकि वह मार्ग में, देश में तथा राष्ट्र में सब जगहों पर लिखा जाता है ।
( २ ) उपाय चार हैं : १. साम, २. दान, ३. दण्ड और ४. भेद ।
( ३ ) उनमें साम पाँच प्रकार का होता है : १. गुणसंकीर्तन, २. सम्बन्धोपाख्यान, ३. परस्परोपकारसंदर्शन, ४. आयतिप्रदर्शन और ५. आत्मोपनिधान ।
( ४ ) वंश, शरीर; कार्य, स्वभाव, विद्वत्ता; हाथी-घोड़े-रथ आदि के गुणों और अवगुणों को जानकर उनकी प्रशंसा करना ही गुणसंकीर्तन कहलाता है ।
( ५ ) समानकुल, विवाह, गुरु-शिष्य, पुरोहित-यजमान, वंशपरंपरागत, हार्दिक और मैत्रीभाव आदि सात प्रकार के सम्बन्धों में से किसी एक का कथन करना सम्बन्धोपाख्यान है ।
( ६ ) परस्पर एक दूसरे द्वारा किये गये उपकार का कथन करना परस्परोपकारसंदर्शन कहलाता है ।
( ७ ) 'इस कार्य के करने में हम दोनों को ऐसा फल प्राप्त होगा, ऐसी आशा करना आयतिप्रदर्शन है ।
( ८ ) 'जो मैं हूँ वही आप हैं तथा मेरा धन ही आपका धन है, उसे आप इच्छानुसार अपने कार्य में लगा सकते हैं।' इस आत्मसमर्पण की भावना को आत्मोपनिधान कहते हैं ।
( ९ ) धन आदि के द्वारा उपकार करना दान या उपप्रदान है ।
( १० ) शत्रु के हृदय में शंका पैदा कर देना भेद है ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में शासनाधिकार नामक दसवां अध्याय समाप्त ।
१२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) वधः परिक्लेशोऽर्थहरणं दण्ड इति । (२) अकान्तिर्व्याघातः पुनरुक्तमपशब्दः संप्लव इति लेखदोषाः । (३) तत्र कालपत्रकमचारुविषमविरागाक्षरत्वमकान्तिः । (४) पूर्वेण पश्चिमस्यानुपपत्तिर्व्याघातः । (५) उक्तस्याविशेषेण द्वितीयमुच्चारणं पुनरुक्तम् । (६) लिङ्गवचनकालकारकाणामन्यथाप्रयोगोऽपशब्दः । (७) अवर्गे वर्गकरणं वर्गे चावर्गक्रिया गुणविपर्यासः संप्लव इति । (८) सर्वशास्त्राण्यनुक्रम्य प्रयोगमुपलभ्य च । कौटिल्येन नरेन्द्रार्थे शासनस्य विधिः कृतः ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे शासनाधिकारं नाम दशमोऽध्यायः, आदितः त्रिंशः ।
—: ० :—
(१) उसे मार देना, उसको पीड़ा पहुँचाना या उसके धन का अपहरण करना दण्ड कहलाता है ।
(२) पत्रलेख के पाँच दोष हैं—१. अकान्ति, २. व्याघात, ३. पुनरुक्त ४. अपशब्द और ५. संप्लव ।
(३) स्याही पड़े कागज पर लिखना, मलिन कागज पर लिखना, भद्दे अक्षर लिखना, छोटे-बड़े अक्षर लिखना और फीकी स्याही से लिखना अकान्ति नामक दोष है ।
(४) पहले लेख से पिछले लेख का विरोध हो जाना अथवा पहिले लेख से पिछले लेख की बाधा हो जाना व्याघात दोष है ।
(५) जो बात पहिले कही गई है उसे ही दोहरा देना पुनरुक्त दोष है ।
(६) लिङ्ग, वचन, काल और कारक का विपरीत प्रयोग करना अपशब्द दोष है ।
(७) लेख में विराम आदि चिह्नों की, अर्थक्रम के अनुसार योजना न करना, संप्लव दोष है ।
(८) आचार्य कौटिल्य ने सम्पूर्ण शास्त्रों का विधिवत् अध्ययन करके और उनके प्रयोगों को अच्छी तरह परीक्षा करके ही राजा के लिए इस शासनविधि की रचना की है ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में शासनाधिकार नामक दसवां अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण २७ | # कोषप्रवेश्यरत्नपरीक्षा |
|---|---|
| अध्याय ११ |
(१) कोषाध्यक्षः कोषप्रवेश्यं रत्नं सारं फल्गु कुप्यं वा तज्जातकरणाधिष्ठितः प्रतिगृह्णीयात् । (२) ताम्रपर्णिकं, पाण्ड्यकवाटकं, पाशिक्यं, कौलेयं, चौर्णेयं, माहेन्द्रं कार्दमिकं स्रोतसीयं, ह्रादीयं, हैमवतं, च मौक्तिकम् । (३) शङ्खः शुक्तिः प्रकीर्णकं च योनयः । (४) मसूरकं त्रिपुटकं कूर्मकमर्धचन्द्रं कञ्चुकितं यमकं कर्तकं खरकं सिक्थकं कामण्डुलुकं श्यावं नीलं दुर्विद्धं चाप्रशस्तम् ।
कोष में रखने योग्य रत्नों की परीक्षा
( १ ) कोषाध्यक्ष को चाहिए कि वह विशेषज्ञों की सहमति से ही रत्न, सार, फल्गु और कुप्य आदि मूल्यवान् द्रव्यों को राजकोष के लिए लेना स्वीकार करे ।
( २ ) मोतियों के दस उत्पत्ति स्थान हैं : १. ताम्रपर्णिक ( पाण्ड्यदेश की ताम्रपर्णी नदी के संगम पर उत्पन्न ), २. पाण्ड्यकवाटक ( मलयकोटि नामक पर्वत पर उत्पन्न ), ३. पाशिक्य ( पाटलिपुत्र के समीप पाशिका नामक नदी में उत्पन्न ), ४. कौलेय ( सिंहलद्वीप की कुला नामक नदी में उत्पन्न ), ५. चौर्णेय ( केरल की चूर्णी नामक नदी में उत्पन्न ), ६. माहेन्द्र ( महेंद्रगिरि के निकटवर्ती समुद्रतल में उत्पन्न ); ७. कार्दमिक ( फारस की कर्दमा नामक नदी में उत्पन्न ), ८. स्रोतसीय ( बर्बर के समीप स्रोतसी नामक नदी में उत्पन्न ); ९. ह्रादीय ( बर्बर के समीप समुद्रतटवर्ती श्रीषण्ड नामक झील में उत्पन्न ) और १०. हैमवत ( हिमालय पर्वत पर उत्पन्न )।
( ३ ) मोतियों की उत्पत्ति के तीन कारण हैं : शुक्ति, शंख और प्रकीर्णक ( गजमुक्ता तथा सर्पमणि )।
( ४ ) दूषित मोतियों के तेरह प्रकार होते हैं । १. मसूरक ( मसूर की तरह का ), २. त्रिपुटक ( तीन खूंट वाला ), ३. कूर्मक ( कछुये के समान ), ४. अर्धचन्द्रक ( अर्धचन्द्र की भाँति ), ५. कंचुकित ( मोटे छिलके वाला ), ६. यमक ( जुडा हुआ ), ७. कर्तक ( कटा हुआ ), ८. खरक ( खुरदुरा ), ९. सिक्थक ( दागवाला ), १०. कामण्डलुक ( कमण्डलु के समान ), ११. श्याव ( भूरे रङ्ग का ), १२. नील ( नीले रङ्ग का ) और १३. दुर्विद्ध ( अस्थान विंधा मोती )।
| १२६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण |
|---|
(१) स्थूलं वृत्तं निस्तलं भ्राजिष्णु श्वेतं गुरु स्निग्धं देशविद्धं च प्रशस्तम् । (२) शीर्षकमुपशीर्षकं प्रकाण्डकमवघाटकं तरलप्रतिबन्धं चेति यष्टिप्रभेदाः । (३) यष्टीनामष्टसहस्रमिन्द्रच्छन्दः । ततोऽर्धं विजयच्छन्दः । शतं देवच्छन्दः । चतुष्षष्टिरर्धहारः । चतुष्पञ्चाशद्रश्मिकलापः । द्वात्रिंशद्-गुच्छः । सप्तविंशतिर्नक्षत्रमाला । चतुर्विंशतिरर्धगुच्छः । विंशतिर्माण-वकः । ततोऽर्धमर्धमाणवकः । एत एव मणिमध्यास्तन्माणवका भवन्ति । एकशीर्षकः शुद्धो हारः । तद्वच्छेषाः । मणिमध्योऽर्धमाणवकस्त्रिफलकः फलकहारः पञ्चफलको वा । सूत्रमेकावली शुद्धा । सैव मणिमध्या यष्टिः ।
(१) मोटा, गोल, तलरहित, दीप्तिमान, श्वेत, वजनी, चिकना और स्थान पर विधा मोती उत्तम कोटि का है ।
(२) यष्टि अर्थात् मोतियों की माला के कई नाम हैं, शीर्षक (जिसमें दो छोटे मोतियों के बीच में एक बड़ा मोती पिरोया गया हो), उपशीर्षक (जिसमें दो छोटे मोतियों के बाद एक बड़ा मोती हो), प्रकाण्डक (जिसमें चार छोटे मोतियों के बाद एक बड़ा मोती हो), अवघाटक (जिस माला के बीच में एक बड़ा मोती और उसके दोनों ओर उत्तरोत्तर छोटे-छोटे मोती हों) और तरलप्रतिबन्ध (जिसमें सभी मोती एक समान लगे हों) ।
(३) एक हजार आठ लड़ों की माला को इन्द्रच्छन्द, उससे आधी पांच सौ चार लड़ों की माला को विजयच्छन्द, सौ लड़ों की माला को देवच्छन्द, चौंसठ लड़ों की माला को अर्धहार, चौवन लड़ों की माला को रश्मिकलाप, बत्तीस लड़ों की माला को गुच्छ, सत्ताईस लड़ों की माला को नक्षत्रमाला, चौबीस लड़ों की माला को अर्धगुच्छ, बीस लड़ों की माला को माणवक, और उससे आधा दस लड़ों की माला को अर्धमाणवक कहा जाता है । इन्हीं मालाओं के बीच में यदि मणि पिरो दी जाय तो उनके नाम के आगे माणवक शब्द जुड़ जाता है । यदि इन्द्रच्छन्द आदि मालाओं में सभी मोती शीर्षक के समान पिरोये जाते हैं तो उनका नाम इन्द्रच्छन्दशीर्षक शुद्धहार, विजयच्छन्दशीर्षक शुद्धहार कहा जाता है । इसी प्रकार यदि इन्द्रच्छन्द आदि में सभी मोती उपशीर्षक के समान पिरोये गए हों तो उसे इन्द्रच्छन्दोपशीर्षकशुद्धहार कहा जाता है । यदि इन शुद्धहारों के बीच में मणि पिरो दी जाय तो, बजाय शुद्धहार के वे अर्धमाणवक कहलाते हैं और तब उनका पूरा नामकरण होता है इन्द्रच्छन्दशीर्षकार्धमाणवक । इसी प्रकार उपशीर्षक आदि के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए । दस लड़ियों की माला में यदि सोने के तीन या पाँच दाने पिरो दिए गए हों तो उसे फलकहार कहा जाता है । एक ही लड़ी की मोती की माला का नाम सूत्र है । यदि उसके बीच में मणि पिरो दी जाय तो उसे ही
प्र० २७ : अ० ११ ] रत्नों की परीक्षा १२७
हेममणिचित्रा रत्नावली । हेममणिमुक्तान्तरोऽपवर्तकः । सुवर्णसूत्रान्तरं सोपानकम् । मणिमध्यं वा मणिसोपानकम् ।
(१) तेन शिरोहस्तपादकटीकलापजालकविकल्पा व्याख्याताः ।
(२) मणिः कौटो मालेयकः पारसमुद्रकश्च ।
(३) सौगन्धिकः पद्मरागः अनवद्यरागः पारिजातपुष्पकः बालसूर्य्यकः ।
(४) वैदूर्य्यः—उत्पलवर्णः शिरीषपुष्पक उदकवर्णो वंशरागः, शुकपत्रवर्णः पुष्यरागो गोमूत्रको गोमेदकः ।
(५) नीलावल्रीय इन्द्रनीलः कलायपुष्पको महानीलो जाम्बवाभो जीमूतप्रभो नन्दकः स्रवन्मध्यः ।
यष्टि कहा जाता है। सोने के दाने और मणियों से पिरोई गई मोती की माला रत्नावली कहलाती है। यदि किसी माला में सोने के दाने, मणि और मोती क्रमशः पिरो दिये गये हैं तो उस माला को अपवर्तक कहते हैं। यदि अपवर्तक माला में मणि न लगी हो तो उसका नाम सोपानक है। यदि बीच में मणि लगा दी जाय तो उसे मणिसोपानक कहते हैं।
(१) इसी प्रकार शिर, हाथ, पैर और कमर की भिन्न-भिन्न मालाओं के सम्बन्ध में भी समझ लेना चाहिए।
(२) मणियों के तीन उत्पत्ति-स्थान हैं : १. कौट (मलयसागर के समीप कोटि नामक स्थान में उत्पन्न) २. मालेयक (मलय देश के कर्णीवन नामक पर्वत में उत्पन्न) और ३. पारसमुद्रक (समुद्र पार सिंहल आदि स्थानों में उत्पन्न)।
(३) मणियों में पाँच प्रकार के मणिक्य होते हैं : १. सौगन्धिक (सायंकाल खिलने वाले सौगन्धिक नामक नीलवर्णयुक्त कमल के समान), २. पद्मराग (पद्म नामक कमल के समान), ३. अनवद्यराग (केशर के समान); ४. पारिजात पुष्पक (हरसिंगार पुष्प के समान) और ५. बालसूर्य्यक (उदय होते सूर्य के समान)।
(४) वैदूर्य मणि आठ प्रकार की होती है : १. उत्पलवर्ण (लाल कमल के समान) २. शिरीषपुष्पक (शिरीष पुष्प की भाँति), ३. उदकवर्ण (जल के समान), ४. वंशराग (बाँस के पत्ते के समान), ५. शुकपत्रवर्ण (तोते के पंख की तरह), ६. पुष्यराग (हल्दी के समान), ७. गोमूत्रक (गोमूत्र के समान) और ८. गोमेदक (गोरोचन के समान)।
(५) इन्द्रनीलमणि भी आठ प्रकार की होती है : १. नीलाबलीय (नीली धारियों वाली), २. इन्द्रनील (मोरपंख के समान), ३. कलायपुष्पक (मटर पुष्प के समान), ४. महानील (गहरे काले रंग की), ५. जाम्बवाभ (जामुन के समान), ६. जीमूतप्रभ (मेघ के समान), ७. नन्दक (भीतर से श्वेत तथा बाहर से नीली) और ८. स्रवन्मध्य (जलप्रवाह के समान तरलित किरणों वाली)।
| १२८ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण |
|---|
(१) शुद्धस्फटिकः मूलाटवर्णः शीतवृष्टिः सूर्यकान्तश्चेति मणयः । (२) षडश्रश्चतुरश्रो वृत्तो वा, तीव्ररागः संस्थानवानच्छः स्निग्धो गुरुरर्चिष्मानन्तर्गतप्रभः प्रभानुलेपी चेति मणिगुणाः । (३) मन्दरागप्रभः सशर्करः पुष्पच्छिद्रः खण्डो दुर्विद्धो लेखाकीर्ण इति दोषाः । (४) विमलकः सस्यकोऽञ्जनमूलकः पित्तकः सुलभको लोहिताक्षो मृगाश्मको ज्योतीरसको मैलेयक आहिच्छत्रकः कूर्पः प्रतिकूर्पः सुगन्धि-कूर्पः क्षीरपकः शुक्तिचूर्णकः शिलाप्रवालकः पुलकः शुक्रपुलक इत्यन्तर-जातयः । (५) शेषाः काचमणयः ।
( १ ) स्फटिक मणि चार प्रकार की होती है : १. शुद्धस्फटिक (स्वच्छ, श्वेत) २. मूलाटवर्ण ( मक्खन निकाले हुए मट्ठे की भाँति ), ३. शीतवृष्टि ( चन्द्रमा के किरणों से पिघलने वाली ) और ४. सूर्यकान्त ( सूर्य किरणों का स्पर्श पाकर आग उगलने वाली ) ।
( २ ) मणियों में ग्यारह प्रकार के गुण होते हैं : १. षड्ज ( छह कोनों वाली ) २. चतुरस्र ( चार कोनों वाली ), ३. वृत्त ( गोलाकार ); ४. गहरे रंगवाली चमकदार, ५. आभूषण में लगाने योग्य, ६. निर्मल, ७. चिकनी, ८. भारी, ९. दीप्तियुक्त, १०. चञ्चलकान्तियुक्त और ११. अपनी कांति से पास की वस्तु को प्रकाशित कर देने वाली ( प्रभानुलेपी ) ।
( ३ ) मणियों में सात प्रकार के दोष पाये जाते हैं : १. हलके रंग वाली, २. हलकी प्रभावानी, ३. खुरदरी, ४. छोटे छिद्र वाली, ५. कटी हुई, ९. उपयुक्त स्थान पर न वेधी हुई और ७. विभिन्न रेखाओं वाली ।
( ४ ) मणियों की अठारह प्रकार की उपजातियाँ हैं—१. विमलक ( श्वेत-हरित वर्णों से मिश्रित ), २. सस्यक ( नीली ), ३. अंजनमूलक ( नील-श्याम वर्ण-मिश्रित ), ४. पित्तक ( गाय के पित्त के समान ), ५. सुलभक ( श्वेत ), ६. लोहिताक्ष ( किनारों पर लाल और केन्द्र में श्याम ), ७ मृगाश्मक ( श्वेत-अरुण-मिश्रित ), ८. ज्योतीरसक ( श्वेत-अरुण-मिश्रित ), ६. मैलेयक ( शिंगरफ की भाँति) १० आहिच्छत्रक ( फीके रंग वाली ), ११. कूर्प ( खुरदरी ), १२. प्रतिकूर्प ( दागी ) १३. सुगन्धिकूर्प ( मूंग-वर्णी ), १४. क्षीरपक ( दुग्ध धवल ), १५. शुक्ति चूर्णक ( अनेक रंगों वाली ), १६. शिलाप्रवालक ( मूंगे के समान ), १७. पुलक ( केंद्र में काली ) और १८. शुक्रपुलक ( केन्द्र में श्वेत ) ।
( ५ ) इनके अतिरिक्त जो मणियाँ हों वे काँच के समान निम्न कोटि की होती है ।
प्र० २७ : अ० ११ ] रत्नों की परीक्षा १२९
(१) सभाराष्ट्रकं मध्यमराष्ट्रकं कास्तीरराष्ट्रकं श्रीकटनकं मणिमन्त-
कमिन्द्रवानकं च वज्रम् ।
(२) खनिः स्रोतः प्रकीर्णकं च योनयः ।
(३) मार्जाराक्षकं च शिरीषपुष्पकं गोमूत्रकं गामेदकं शुद्धस्फटिकं मूलाटीपुष्पकवर्णं मणिवर्णानामन्यतमवर्णमिति वज्रवर्णाः ।
(४) स्थूलं स्निग्धं गुरु प्रहारसहं समकोटिकं भाजनलेखि तर्कुभ्रामि भ्राजिष्णु च प्रशस्तम् ।
(५) नष्टकोणं निरश्रिपाश्र्वापवृत्तं च अप्रशस्तम् ।
(६) प्रबालकं आलकन्दकं वैवर्णिकं च रक्तं पद्मरागं च करटगर्भिणि-
कावर्जमिति ।
(७) चन्दनम्—सातनं रक्तं भूमिगन्धि । गोशीर्षकं कालताम्रं मत्स्य-
(१) हीरा के छह उत्पत्ति स्थान है : १. सभाराष्ट्रक (बरार, बम्बई प्रदेश में उत्पन्न), २. मध्यमराष्ट्रक (कोशल देश में उत्पन्न), ३. कास्तीरराष्ट्रक (कास्तीर देश में उत्पन्न), ४. श्रीकटनक (श्रीकटन पर्वत पर उत्पन्न) : ५. मणिमंतक (उत्तरस्थ मणिमंत पर्वत में उत्पन्न) और ६. इन्द्रवानक (कलिंग देश में उत्पन्न)।
(२) इनके अतिरिक्त खदान, विशेष जलप्रवाह और हाथी दाँत की जड़ आदि भी हीरा के उत्पत्तिस्थान हैं। खान और जलप्रवाह आदि के अन्य स्थानों में उत्पन्न हीरा को प्रकीर्णक रहते हैं।
(३) हीरा के अनेक आकार-प्रकार हैं : बिलाव की आँख के समान, शिरीष पुष्प की आकृति का, गोमूत्र के समान, गोरोचन की भाँति, सर्वथा स्वच्छ, श्वेत, मुलहटी के फूल जैसा, और मणियों की आकृति का।
(४) मोटा; वजनी, घन की चोट सहने वाला, समकोण पानी से भरे पीतल के बर्तन में उसको हिलाने से लकीरें डाल देने वाला, चर्खे में लगे तकुवे के तरह घूमने वाला और चमकदार हीरा उत्तम कोटि का है।
(५) नष्टकोण, नुकीले कोनों से रहित और छोटे-बड़े कोनों वाला हीरा दूषित समझा जाता है।
(६) प्रवाल (मूंगा) के दो उत्पत्ति स्थान हैं—१. आलकन्दक (अलकन्द नामक स्थान से उत्पन्न) और २. वैवर्णिक (यूनान के समीपवर्ती विवर्ण नामक समुद्रतल में उत्पन्न)। प्रवाह के दो रंग होते हैं : १. रक्त और २. कमल। वह कीड़े का खाया हुआ तथा बीच में मोटा या उठा हुआ नहीं होना चाहिए।
(७) चन्दन के सोलह उत्पत्ति स्थान, नौ रंग, छह गन्ध और ग्यारह गुण होते हैं। उत्पत्तिस्थान—१. सातन देश में उत्पन्न चन्दन लाल रंग का होता है और
९ कौ०
१३० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
गन्धि । हरिचन्दनं शुकपत्रवर्णमाम्रगन्धि । तार्णसं च । ग्रामेरुकं रक्तं रक्त- कालं वा वस्तमूत्रगन्धि । दैवसभेयं रक्तं पद्मगन्धि । जावकं च । जोङ्गकं रक्तं रक्तकालं वा स्निग्धम् । तौरूपं च । मालेयकं पाण्डुरक्तम् । कुचन्दनं कालवर्णकं गोमूत्रगन्धि । कालपर्वतकं रूक्षमगुरुकालं रक्तं रक्तकालं वा । कोशकारपर्वतकं कालं कालचित्रं वा । शीतोदकीयं पद्माभं कालस्निग्धं वा । नागपर्वतकं रूक्षं शैलवर्णं वा । शाकलं कपिलमिति ।
(१) लघु स्निग्धमश्यानं सर्पिः स्नेहलेपि गन्धसुखं त्वगनुसार्यनुल्बण- मविराग्युष्णसहं दाहग्राहि सुखस्पर्शनमिति चन्दनगुणाः ।
उसमें धरती की सोंध होती है, २. गोशीर्ष देश में उत्पन्न चन्दन कालिमा एवं लाली लिए होता है और उसमें मछली की जैसी गन्ध होती है, ३. हरि नामक देश में उत्पन्न चन्दन तोते के पंख के समान हरे रंग का और उसमें आम की जैसी महक होती है, ४. तृणसा नामक नदी के किनारे उत्पन्न होने वाला चन्दन भी हरिचन्दन के ही समान होता है, ५. ग्रामेरु प्रदेश में उत्पन्न चन्दन या तो लाल रंग का अथवा लाल-काले मिले हुए रंग का होता है और उसमें बकरे की पेशाब जैसी गन्ध होती है, ६. देवसभा नामक स्थान में उत्पन्न चन्दन लाल रंग का और पद्म के समान सुगन्धि वाला होता है, ७. जाबक देश का चन्दन भी देवसभा चन्दन की भाँति होता है, ८. जोंग देश में उत्पन्न चन्दन या तो लाल रंग का अथवा लाल-काला रंग का चिकना होता है और वह भी पद्म के समान सुगन्धित होता है, ६. तुरूप देश का चन्दन भी जोंगरु की भाँति होता है, १०. माल देश में उत्पन्न चन्दन का रंग लाल-पीला होता है, उसमें पद्म के समान सुगन्ध होती है, ११. कुचन्दन काले रंग का तथा गोमूत्र के समान गन्ध वाला होता है, १२. काल पर्वत पर उत्पन्न चन्दन खुर-दुरा, अगर के समान काला या लाल या लाल-काला होता है और उसमें भी गोमूत्र जैसी गन्ध होती है, १३. कोशकार पर्वत पर उत्पन्न चन्दन काला अथवा चितकबरा होता है, १४. शीतोदक देश में उत्पन्न चन्दन पत्र के रंग का या काला अथवा स्निग्ध होता है, १५. नाग पर्वत पर उत्पन्न चन्दन रूखा और सेवार के रंग जैसा होता है, १६. शाकल देश में उत्पन्न चन्दन पीला-लाल ( कपिल ) वर्ण का होता है ।
( १ ) चन्दन में ग्यारह गुण होते हैं—१. लघु २. स्निग्ध ३. बहुत दिनों में सूखने वाला, ४. शरीर में घी के समान लगने वाला, ५. सुगन्धित, ६. त्वचा के भीतर ठंडक पहुँचाने वाला, ७. बिना फटा, ८. स्थायी वर्ण एवं गन्ध वाला, ९. गर्मी शांत करने वाला, १०. सन्ताप को दूर करने वाला और ११. सुखकर स्पर्श वाला ।
प्र० २७ : अ० ११ ] रत्नों की परीक्षा १३१
(१) अगुरु—जोङ्गकं कालं कालचित्रं मण्डलचित्रं वा । श्यामं दोङ्ग- कम् । पारसमुद्रकं चित्ररूपम् । उशीरगन्धि नवमालिकागन्धि वेति । (२) गुरु स्निग्धं पेशलगन्धि निर्हारि अग्निसहमसंप्लुतधूमं समगन्धं विमर्दसहम् इत्यगुरुगुणाः । (३) तैलपर्णिकम्—अशोकग्रामिकं मांसवर्णं पद्मगन्धि । जोङ्गकं रक्तपीतकमुत्पलगन्धि गोमूत्रगन्धि वा ग्रामेरुकं स्निग्धं गोमूत्रगन्धि । सौवर्णकुड्यकं रक्तपीतं मातुलुङ्गगन्धि । पूर्णकद्वीपकं पद्मगन्धि नवनीत- गन्धि वेति । (४) भद्रश्रीयम्—पारलौहित्यकं जातीवर्णम् । आन्तरवत्यमुशीर- वर्णम् । उभयं कुष्ठगन्धि चेति । (५) कालेयकः—स्वर्णभूमिजः स्निग्धपीतकः । औत्तरपर्वतको रक्त- पीतकः इति साराः ।
( १ ) अगर का निरूपण इस प्रकार है—जौंगल नामक अगर तीन तरह का होता है : काला, चितकबरा और काले-सफेद दागों वाला । दोंगक नामक अगर काला होता है, जोंगक और दोंगक दोनों आसाम में पैदा होते हैं । समुद्र पार पैदा होने वाला अगर, चित्र रूप का होता है, जिसकी गन्ध खश और चमेली जैसी होती है ।
( २ ) भारी, स्निग्ध, सुगन्धित, दूर तक सुगन्ध फेंकने वाला, अग्नि को सहन करने वाला, जिसका धुआँ व्याकुल न कर दे, जलते समय एक जैसी गन्ध देने वाला और वस्त्र आदि पर पोंछ देने से गन्ध बनी रहना; ये अगर के गुण हैं ।
( ३ ) असम में पैदा होने वाला तैलपर्णिक चन्दन मांस के रङ्ग का और पद्म के समान गन्ध वाला होता है । असम में ही पैदा होने वाला दूसरा तैलपर्णिक चन्दन लाल-पीले रङ्ग का और कमल अथवा गोमूत्र की गन्ध का होता है । ग्रामेरू प्रदेश में पैदा होने वाला चन्दन चिकना और गोमूत्र की गन्ध का होता है । असम के सुवर्णकुड्य नामक स्थान में पैदा होने वाला चन्दन लाल-पीला और नीबू की गन्ध का होता है । पूर्णक द्वीप में उत्पन्न चन्दन पद्म अथवा मक्खन की गन्ध का होता है ।
( ४ ) भद्रश्रीय नामक चन्दन दो प्रकार का होता है : १. पारलौहित्य और २. आन्तरवत्य । पारलौहित्य असम में पैदा होता है और उसका रङ्ग चमेलीपुष्प जैसा होता है, आन्तरवत्य चन्दन भी असम में ही पैदा होता है, उसका रङ्ग खस की भांति होता है । इन दोनों की गन्ध कूट औषधि की तरह होती है ।
( ५ ) कालेयक नामक चन्दन स्वर्णभूमि में पैदा होता है और वह स्निग्ध एवं पीले रङ्ग का होता है । हिमालय पर पैदा होने वाला कालेयक लाल-पीले रङ्ग का होता है । यहाँ तक सार वस्तुओं का विवरण प्रस्तुत किया गया है ।
| १३२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण |
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(१) पिण्डक्वाथधूमसहमविरागि योगानुविधायि च। चन्दनागरुवच्च तेषां गुणाः। (२) कान्तनावकं प्रैयकं चोत्तरपर्वतकं चर्म। कान्तनावकं मयूर-ग्रीवाभम्। प्रैयकं नीलं पीतं श्वेतं लेखाविन्दुचित्रम्। तदुभयमष्टाङ्गुला-यामम्। (३) बिसी महाबिसी च द्वादशग्रामीये। अव्यक्तरूपा दुहिलिका चित्र वा बिसी। परुषा श्वेतप्राया महाबिसी। द्वादशाङ्गुलायाममुभयम्। (४) श्यामिका कालिका कदली चन्द्रोत्तरा शाकुला चारोहजाः। कपिला बिन्दुचित्रा वा श्यामिका। कालिका कपिला कपोतवर्णा वा। तदुभयमष्टाङ्गुलायाम। परुषा कदली हस्तायता। सैव चन्द्रचित्रा चन्द्रो-त्तरा। कदलीत्रिभागा शाकुला कोठमण्डलचित्रा कृतकर्णिकाजिनचित्रा चेति।
(१) तैलपर्णिक, भद्रश्रीय और कालेयक, इन तीनों में पीसने पर, पकाने पर, आग में जलाने पर किसी प्रकार का विकार पैदा न होना, दूसरी वस्तु के साथ मिलाने पर तथा देर तक रखे रहने पर उनकी गन्ध में किसी प्रकार का फर्क न आना, ये गुण पाये जाते हैं। पूर्वोक्त चन्दनों में जो गुण बताये गए हैं, वे भी इन तीनों में पाये जाते हैं।
(२) फल्गु पदार्थों में पहिला स्थान चमड़े का है, जिसकी लगभग पन्द्रह जातियाँ होती है, १. कान्तनावक और २. प्रैयक दोनों का चमड़ा हिमालय में पैदा होता है। उनमें कान्तनावक मयूरग्रीवा का कान्ति वाला और प्रैयक नीले-पीले तथा सफेद रेखाओं अथवा दागों से युक्त होता है। इन दोनों का विस्तार आठ अंगुल होता है।
(३) हिमालय में स्थित म्लेच्छों के बारह गावों में ३. बिसी और ४. महा-बिसी नामक चमड़ा पैदा होता है। बिसी बहुरङ्ग, बालों वाला एवं चितकबरा, और महाबिसी कठोर तथा श्वेत होता है। इन दोनों का विस्तार बारह-बारह अंगुल होता है।
(४) हिमालय के आरोह नामक स्थान में पैदा होने वाला चमड़ा पाँच प्रकार का होता है : ५. श्यामिका, ६. कालिका ७, कदली ८ चन्दोत्तरा और ९. शाकुला। कपिल और चितकबरे रङ्ग का चमड़ा श्यामिका है। कपिल अथवा कबूतरी रङ्ग का चमड़ा कालिका कहलाता है। इन दोनों का विस्तार आठ-आठ अंगुल होता है। कदली नामक चमड़ा कठोर तथा खुरदुरा होता है, जिसकी लम्बाई एक हाथ मानी गई है। कदली नामक चमड़े पर यदि चन्द्रबिन्दु अंकित हों तो वह चन्द्रोत्तरा कह-लाता है। रङ्ग में ये दोनों कालिका के समान होते हैं। कदली से तीन गुणा बढ़ा