कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) अनेन विज्ञापितमेवमाह तद्दीयतां चेद्यदि तत्त्वमस्ति ।
राज्ञः समीपे वरकारमाह प्रज्ञापनैषा विविधोपदिष्टा ॥
(२) भर्तुराज्ञा भवेद् यत्र निग्रहानुग्रहौ प्रति ।
विशेषेण तु भृत्येषु तदाज्ञालेखलक्षणम् ॥
(३) यथार्हगुणसंयुक्ता पूजा यत्रोपलक्ष्यते ।
अप्याधौ परिदाने वा भवतस्तावुपग्रहौ ॥
(४) जातेर्विशेषेषु पुरेषु चैव ग्रामेषु देशेषु च तेषु तेषु ।
अनुग्रहो यो नृपतेर्निदेशात्तज्ज्ञः परीहार इति व्यवस्येत् ॥
(५) निसृष्टिस्थापना कार्यकरणे वचने तथा ।
एष वाचिकलेखः स्याद्भवेन्नैसृष्टिकोऽपि वा ॥
(६) विविधां दैवसंयुक्तां तत्त्वजां चैव मानुषीम् ।
द्विविधां तां व्यवस्यन्ति प्रवृत्तिं शासनं प्रति ॥
(७) दृष्ट्वा लेखं यथातत्त्वं ततः प्रत्यनुभाष्य च ।
प्रतिलेखो भवेत् कार्यो यथा राजवचस्तथा ॥
(१) यदि कोई महामात्र राजकीय धन का संग्रह करके अपने पास रख लेता है और गुप्तचर से उसकी सूचना पाकर राजा जब उस महामात्र से राजकीय धन को राजकोष में जमा करने की आज्ञा देता है और जब महामात्र धन देना स्वीकार कर लेता है तब जो लिखा-पढ़ी होती है, उस लेख-पत्र का नाम ही प्रज्ञापना है ।
(२) जिस लेख-पत्र में राजा की ओर से निग्रह या अनुग्रह की आज्ञा हो और विशेषरूप से जो नौकरों के सम्बन्ध में लिखा जाय उसे आज्ञा कहते हैं ।
(३) जिस लेख-पत्र में समुचित गुणों से सत्कार का भाव प्रकट किया जाता है उसे परिदान कहते हैं । यह दो प्रकार से लिखा जाता है । १. जब नौकरों का कोई आत्मीय मर जाता है जिसके कारण वे व्यथित हैं; २. जब राजा उनकी रक्षा के लिए दयाभाव प्रकट करता है ।
(४) विशेष जातियों नगरों, ग्रामों और देशों पर राजा की आज्ञा के अनुसार जो अनुग्रह किया जाता है, विशेषज्ञ लोग उसी को परीहार कहते हैं ।
(५) किसी कार्य के करने तथा कहने में किसी आत्मवचन का प्रमाण देना ही निसृष्टि है, उसके वाचिक और नैसृष्टिक दो भेद होते हैं ।
(६) अनेक प्रकार की दैवी, पारमार्थिक और मानुषी आपत्तियों की सूचना को प्रवृत्तिक कहते हैं । वह शुभ और अशुभ दो प्रकार का होता है ।
(७) दूसरे के भेजे हुए लेख को भली-भांति देखने और पड़ने के अनन्तर, फिर राजा के सामने पढ़कर, राजा की आज्ञा के अनुसार उसका जो उत्तर लिखा जाय उसको प्रतिलेख कहते हैं ।