भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० २६ : अ० १० ] शासनाधिकार १२३

(१) यथेश्वरांश्चाधिकृतांश्च राजा रक्षोपकारौ पथिकार्थमाह ।
सर्वत्रगो नाम भवेत् स मार्गे देशे च सर्वत्र च वेदितव्यः ॥
(२) उपायाः सामोपप्रदानभेददण्डाः ।
(३) तत्र साम पञ्चविधं—गुणसंकीर्तनं, सम्बन्धापाख्यानं, परस्परो-
पकारसन्दर्शनं, आमायतिप्रदर्शनं, अमात्मोपनिधानमिति ।
(४) तत्राभिजनशरीरकर्मप्रकृतिश्रुतद्रव्यादीनां गुणागुणग्रहणं प्रशंसा
स्तुतिर्गुणसङ्कीर्तनम् ।
(५) ज्ञातियौनमौखस्रौवकुलहृदयमित्रसंकीर्तनं सम्बन्धोपाख्यानम् ।
(६) स्वपक्षपरपक्षयोरन्योन्योपकारसंकीर्तनं परस्परोपकारसन्दर्शनम्।
(७) अस्मिन्नेवं कृत इदमवायोर्भवतीत्याशाजननमायतिप्रदर्शनम् ।
(८) योऽहं स भवान्, यन्मम द्रव्यं तद्भवता स्वकृत्येषु प्रयुज्यताम्
इत्यात्मोपनिधानमिति ।
(९) उपप्रदानमर्थोपकारः ।
(१०) शङ्काजननं निर्भर्त्सनं च भेदः ।


( १ ) जिस लेखपत्र में राजा राहगीरों की रक्षा और उनके उपकार के लिए अपने अधिकारियों को आदेश देता है वह सर्वत्रग है; क्योंकि वह मार्ग में, देश में तथा राष्ट्र में सब जगहों पर लिखा जाता है ।

( २ ) उपाय चार हैं : १. साम, २. दान, ३. दण्ड और ४. भेद ।

( ३ ) उनमें साम पाँच प्रकार का होता है : १. गुणसंकीर्तन, २. सम्बन्धोपाख्यान, ३. परस्परोपकारसंदर्शन, ४. आयतिप्रदर्शन और ५. आत्मोपनिधान ।

( ४ ) वंश, शरीर; कार्य, स्वभाव, विद्वत्ता; हाथी-घोड़े-रथ आदि के गुणों और अवगुणों को जानकर उनकी प्रशंसा करना ही गुणसंकीर्तन कहलाता है ।

( ५ ) समानकुल, विवाह, गुरु-शिष्य, पुरोहित-यजमान, वंशपरंपरागत, हार्दिक और मैत्रीभाव आदि सात प्रकार के सम्बन्धों में से किसी एक का कथन करना सम्बन्धोपाख्यान है ।

( ६ ) परस्पर एक दूसरे द्वारा किये गये उपकार का कथन करना परस्परोपकारसंदर्शन कहलाता है ।

( ७ ) 'इस कार्य के करने में हम दोनों को ऐसा फल प्राप्त होगा, ऐसी आशा करना आयतिप्रदर्शन है ।

( ८ ) 'जो मैं हूँ वही आप हैं तथा मेरा धन ही आपका धन है, उसे आप इच्छानुसार अपने कार्य में लगा सकते हैं।' इस आत्मसमर्पण की भावना को आत्मोपनिधान कहते हैं ।

( ९ ) धन आदि के द्वारा उपकार करना दान या उपप्रदान है ।

( १० ) शत्रु के हृदय में शंका पैदा कर देना भेद है ।