भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 208

१२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) वधः परिक्लेशोऽर्थहरणं दण्ड इति । (२) अकान्तिर्व्याघातः पुनरुक्तमपशब्दः संप्लव इति लेखदोषाः । (३) तत्र कालपत्रकमचारुविषमविरागाक्षरत्वमकान्तिः । (४) पूर्वेण पश्चिमस्यानुपपत्तिर्व्याघातः । (५) उक्तस्याविशेषेण द्वितीयमुच्चारणं पुनरुक्तम् । (६) लिङ्गवचनकालकारकाणामन्यथाप्रयोगोऽपशब्दः । (७) अवर्गे वर्गकरणं वर्गे चावर्गक्रिया गुणविपर्यासः संप्लव इति । (८) सर्वशास्त्राण्यनुक्रम्य प्रयोगमुपलभ्य च । कौटिल्येन नरेन्द्रार्थे शासनस्य विधिः कृतः ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे शासनाधिकारं नाम दशमोऽध्यायः, आदितः त्रिंशः ।

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(१) उसे मार देना, उसको पीड़ा पहुँचाना या उसके धन का अपहरण करना दण्ड कहलाता है ।

(२) पत्रलेख के पाँच दोष हैं—१. अकान्ति, २. व्याघात, ३. पुनरुक्त ४. अपशब्द और ५. संप्लव ।

(३) स्याही पड़े कागज पर लिखना, मलिन कागज पर लिखना, भद्दे अक्षर लिखना, छोटे-बड़े अक्षर लिखना और फीकी स्याही से लिखना अकान्ति नामक दोष है ।

(४) पहले लेख से पिछले लेख का विरोध हो जाना अथवा पहिले लेख से पिछले लेख की बाधा हो जाना व्याघात दोष है ।

(५) जो बात पहिले कही गई है उसे ही दोहरा देना पुनरुक्त दोष है ।

(६) लिङ्ग, वचन, काल और कारक का विपरीत प्रयोग करना अपशब्द दोष है ।

(७) लेख में विराम आदि चिह्नों की, अर्थक्रम के अनुसार योजना न करना, संप्लव दोष है ।

(८) आचार्य कौटिल्य ने सम्पूर्ण शास्त्रों का विधिवत् अध्ययन करके और उनके प्रयोगों को अच्छी तरह परीक्षा करके ही राजा के लिए इस शासनविधि की रचना की है ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में शासनाधिकार नामक दसवां अध्याय समाप्त ।

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